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Deep Narayan Singh: वो नेता जो सिर्फ 17 दिनों के लिए बिहार के CM रहें

Deep Narayan Singh: मुजफ्फरपुर के एक छोटे से गांव का नौजवान जो नौकरी छोड़कर आजादी के आंदोलन में उतरा जेल गया. कांग्रेस की पहली पंक्ति का नेता बना और श्रीकृष्ण सिंह का सबसे विश्वसनीय चेहरा बना. पहले बिजली फिर सिंचाई मंत्री और उसके बाद वित्त मंत्री. 1961 में कार्यवाहक CM की शपथ और लगभग डेढ़ दशक बाद, 1975 में किस्मत ने उन्हें एक बार फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी के बेहद करीब ला दिया था.

25 नवंबर 1894. मुजफ्फरपुर जिले के पुरनटांड गांव में जन्मे दीप नारायण नौकरी में थे, भविष्य सुरक्षित था. गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन ने दिशा बदल दी. नौकरी छोड़ी, आंदोलन में उतर गए, जेल गए. कांग्रेस में सक्रिय हुए. 1952 में पहली विधानसभा बनी, तो महनार सीट से विधायक बने. श्रीकृष्ण सिंह ने अपनी कैबिनेट में जगह दी और बिजली–सिंचाई का मंत्रालय सौंपा. कांग्रेस पार्टी के टिकट पर संविधान सभा के लिए भी चुने गए थे.

श्रीकृष्ण सिंह का भरोसा—रात में खाट पर सोता हुआ पूरा प्रशासन

दीप नारायण पर श्रीकृष्ण सिंह का भरोसा कितना गहरा था. इसकी मिसाल उनके गांव के पुराने लोग आज भी सुनाते हैं. एक बार कार्यक्रम से लौटते हुए श्रीबाबू ने अचानक तय किया कि वे दीप नारायण के गांव जाएंगे और उनकी माताजी का आशीर्वाद लेंगे.
अंधेरा था, गांव छोटा, घर और भी छोटा. पूरा प्रशासनी अमला, डीएम, एसपी, डीआईजी सब उनके घर पर ही रुक गए. खाटें पड़ोसियों से मंगाई गईं, जगह न मिलने पर अफसर जमीन पर सोए. अगले दिन यह समाचार राज्य भर में चली मुख्यमंत्री गांव में रात भर खाट पर सोए.

31 जनवरी 1961—पहली बार देश में मुख्यमंत्री की कुर्सी खाली हुई

श्रीकृष्ण सिंह का देहांत हुआ. संविधान में यह स्थिति स्पष्ट नहीं थी. राज्यपाल डॉ. जाकिर हुसैन के सामने बड़ा सवाल था—अब कौन?

सबसे सीनियर मंत्री दीप नारायण सिंह को कार्यवाहक मुख्यमंत्री की शपथ दिलाई गई. 1 फरवरी से 17 फरवरी 1961—सिर्फ 17 दिनों तक वो बिहार के मुख्यमंत्री रहे. फिर विनोदानंद झा विधायक दल के नेता बने और नए मुख्यमंत्री.

67 की लहर, टूटती कांग्रेस, नई गोलबंदियां और दीप नारायण की नई राह

1967 से 1972 बिहार की नेतृत्व का तूफानी समय था. प्रशासनें बनती-गिरती रहीं. दीप नारायण ने अपनी सीट बदली, हाजीपुर से चुनाव लड़ा और लगातार जीतते रहे.

जब विनोदानंद झा ने कांग्रेस में बगावत की, दीप नारायण भी उनके साथ गए. इस गुट को नाम मिला—लोकतांत्रिक कांग्रेस. इसी टूट-फूट ने बिहार को पहला दलित मुख्यमंत्री दिया, भोला पासवान शास्त्री.

इंदिरा गांधी और संगठन कांग्रेस का संघर्ष शुरू हुआ तो दीप नारायण वही नेता बने, जिन्हें दिल्ली अपनी बातचीत का चेहरा बनाना चाहती थी. लेकिन वह किसी के आगे जी हजूरी की नेतृत्व नहीं करते थे. इंदिरा चाहती हैं कि प्रस्ताव सामने वाला रखे और फिर वो उसे मंजूरी दें, दीप नारायण नहीं माने.

2 जनवरी 1975… समस्तीपुर स्टेशन पर बम फट गया

जिस दिन बदलाव की शुरुआत होनी थी, उसी दिन ललित नारायण मिश्र समस्तीपुर पहुंचे, रेल लाइन उद्घाटन कार्यक्रम में. वही बम धमाका हुआ. वो बुरी तरह घायल हुए.

उस धमाके ने सिर्फ ललित नारायण मिश्र की जान नहीं ली, बिहार का पूरा नेतृत्वक समीकरण बदल दिया. नेतृत्व परिवर्तन टल गया, इमरजेंसी की छाया घनी हो गई और जब परिवर्तन हुआ भी, तब नाम आया—जगन्नाथ मिश्र का.

दीप नारायण सिंह की मुख्यमंत्री बनने की संभावना यहीं खत्म हो गई. दीप नारायण 1977 का चुनाव नहीं लड़े. उसी साल 7 दिसंबर को हाजीपुर में उनका निधन हो गया.

संदर्भ

रामनाथ ठाकुर, कर्पूरी कुंज, सप्तक्रांति के संवाहक, जननायक कर्पूरी कुंज भाग-2

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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