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Dhanbad News: 10 शेल कंपनियों का 3.80 करोड़ रुपये का आइटीसी ब्लॉक

राज्य-कर विभाग ने शेल कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी है. विभाग ने ई-वे बिल (परमिट) के माध्यम से 330.54 करोड़ रुपये के कोयला, लोहा और सीमेंट की अवैध बिक्री के मामले में 10 शेल कंपनियों का 3.80 करोड़ रुपये का इनपुट टैक्स क्रेडिट (आइटीसी) ब्लॉक कर दिया है. अब ये कंपनियां आइटीसी का उपयोग नहीं कर सकेंगी. राज्य-कर विभाग ने इन शेल कंपनियों द्वारा जिन-जिन कंपनियों को माल बेचा गया है, उन्हें अलर्ट नोटिस जारी किया है. संबंधित कंपनियों से टैक्स की वसूली की जायेगी. इन सभी शेल कंपनियों का जीएसटी रजिस्ट्रेशन रद्द करने की प्रक्रिया भी शुरू हो गयी है. राज्य-कर के मुताबिक, जांच में पता चला है कि इन 10 शेल कंपनियों के नाम पर ई-वे बिल (परमिट) निकालकर 330.54 करोड़ रुपये का अवैध कोयला, लोहा और सीमेंट बेचा गया. इस कारोबार पर प्रशासन को मिलने वाले 61.89 करोड़ रुपये के टैक्स को जीएसटीआर-1 के माध्यम से एडजस्ट दिखाया गया. साथ ही, 3.80 करोड़ रुपये के इनपुट टैक्स क्रेडिट को भी पास ऑन करने की तैयारी थी. हालांकि इससे पहले ही राज्य-कर अन्वेषण ब्यूरो ने आइटीसी ब्लॉक कर दिया.

कैसे पकड़ में आया मामला

शेल कंपनियों ने ई-वे बिल जनरेट कर अवैध कोयला, लोहा और सीमेंट दूसरे राज्यों में भेजा. हर माह की 10 तारीख तक जीएसटीआर-1 दाखिल करना होता है. शेल कंपनियों द्वारा जीएसटीआर-1 दाखिल करते हुए आइटीसी को एडजस्ट कर पास ऑन कर दिया जाता था. वहीं, माह की 20 तारीख को जीएसटीआर-3 बी रिटर्न फाइल करन होता है. इन शेल कंपनियों ने जीएसटीआर-1 तो भरा लेकिन जीएसटीआर-3 बी रिटर्न दाखिल नहीं किया. ऐसे में विभाग ने जब मामले की जांच शुरू की तो एक के बाद एक शेल कंपनियों का खुलासा होता गया.

आइटीसी ब्लॉक होने से पास ऑन पर रोक : इनपुट टैक्स क्रेडिट ब्लॉक होने के बाद शेल कंपनियां अब आगे किसी भी कंपनी को आइटीसी पास ऑन नहीं कर सकेंगी. इससे फर्जी टैक्स एडजस्टमेंट की पूरी चेन टूट गयी है.

ई-वे बिल निकालने की कोई सीमा नहीं

एक जुलाई 2017 को जीएसटी लागू हुआ था. इसमें ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की सुविधा का दुरुपयोग कर फर्जी कंपनियां बनाकर जीएसटी में निबंधन लिया गया. ई-वे बिल जनरेट करने की कोई तय सीमा नहीं होने के कारण फर्जी कंपनियां करोड़ों रुपये का परमिट निकालकर अवैध रूप से दो नंबर का कोयला, लोहा और सीमेंट बेच रही हैं. नियम के अनुसार, बिक्री के बाद जीएसटीआर-3बी रिटर्न दाखिल करना अनिवार्य है, जबकि ये कंपनियां रिटर्न दाखिल नहीं कर रहीं थीं.

क्या है ई-वे बिल

किसी भी उत्पाद को राज्य के भीतर या राज्य के बाहर ले जाने के लिए ई-वे बिल अनिवार्य होता है. यदि ढुलाई की जा रही वस्तु की कीमत टैक्स सहित 50 हजार रुपये से अधिक है, तो उसके परिवहन के लिए ई-वे बिल जनरेट करना जरूरी है.

कैसे होता है स्पोर्ट्स

दो नंबर का कारोबार करने वाले अपने अधीनस्थ कर्मचारियों, नौकरों या अन्य व्यक्तियों के नाम पर फर्जी रेंट एग्रीमेंट व पैन नंबर का इस्तेमाल कर ऑनलाइन फर्जी कंपनियां रजिस्टर करा लेते हैं. इसके बाद घर बैठे करोड़ों रुपये के ई-वे बिल जनरेट कर अवैध कोयला, लोहा और सीमेंट दूसरे राज्यों में भेज देते हैं. जब कंपनियां रिटर्न फाइल नहीं करतीं, तब जांच में यह फर्जीवाड़ा सामने आता है.

क्या है इनपुट टैक्स क्रेडिट

इनपुट टैक्स क्रेडिट वह टैक्स होता है, जो कोई रजिस्टर्ड कंपनी माल खरीदते समय चुकाती है. इस खरीदे गये माल पर दिये गये टैक्स को कंपनी बाद में अपनी बिक्री पर देय टैक्स से घटाती है. इसी टैक्स लाभ को इनपुट टैक्स क्रेडिट कहा जाता है. उदाहरण के तौर पर यदि किसी कंपनी ने माल खरीदते समय एक लाख रुपये का टैक्स दिया और बिक्री पर 1.20 लाख रुपये टैक्स देना है, तो कंपनी एक लाख रुपये का आइटीसी एडजस्ट कर केवल 20 हजार रुपये ही प्रशासन को देगी.

ठेला व चाउमिन वाले के नाम से जीएसटी रजिस्ट्रेशन

फर्जी कंपनियों के जो मामले सामने आये हैं, उनमें ज्यादातर में गरीब लोगों के नाम से रजिस्ट्रेशन होता है. ठेला-चाउमिन वाले के नाम से कंपनी बनाकर जीएसटी रजिस्ट्रेशन लिया गया है. उनके नाम पर बिजली बिल, रेंट एग्रीमेंट, पैन कार्ड व आधार कार्ड बनाये जाते हैं. ओटीपी के माध्यम से आधार व पैन का वेरिफिकेशन होने के बाद रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया शुरू होती है. इसमें किंग पिन अपने करीबी का नंबर इंट्री कराता है. जब भी सिस्टम से ई-वे बिल जनरेट होगा, जीएसटी रजिस्ट्रेशन वाले मोबाइल नंबर पर ओटीपी आता है. ओटीपी डालने के बाद ही ई-वे बिल जनरेट होता है. दो माह के अंदर किंग पिन करोड़ों का ई-वे बिल निकाल लेता है. जांच होती है तो ठेला व चाउमिन वाले फंसते हैं.

गवर्नेंस आधारित विस्तृत वेरिफिकेशन जरूरी

अनिल मुकीम, चार्टर्ड अकाउंटेंट : जीएसटी में शेल कंपनियों के जरिए कर चोरी सिस्टम की कमजोरी है. जीएसटी व्यवस्था लागू होने के बाद फर्जी शेल कंपनियों के माध्यम से फेक बिलिंग और इनपुट टैक्स क्रेडिट (आइटीसी) पास ऑन व रिफंड के जरिए करोड़ों रुपये की कर चोरी अब आम समस्या बन चुकी है. यह केवल किसी एक राज्य या क्षेत्र की समस्या नहीं, बल्कि पूरे देश के रेवेन्यू सिस्टम के लिए गंभीर चुनौती है. शेल कंपनियों की पूंजी बहुत कम होती है. इसके डायरेक्टर ड्राइवर, मजदूर, छात्र, कुली या आर्थिक रूप से कमजोर लोग होते हैं, जिनका वास्तविक व्यापार से कोई लेना-देना नहीं होता. कार्यालय किराये के मकान में दिखाया जाता है. कई कंपनियों में एक ही मोबाइल नंबर और ई-मेल आइडी का उपयोग होता है. ऐसी कंपनियां प्रायः समय पर जीएसटी रिटर्न दाखिल नहीं करतीं. विभाग को इस पूरे फर्जीवाड़े की जानकारी तब मिलती है, जब लगातार कई माह तक रिटर्न फाइल नहीं किया जाता. जीएसटी रजिस्ट्रेशन के समय कड़े सत्यापन, ई-वे बिल जनरेट करते समय टोल डेटा से मिलान, प्रोफेशनल के माध्यम से वास्तविक स्टॉक सर्टिफिकेट, बैंक स्टेटमेंट के जरिए वास्तविक वित्तीय स्थिति की जांच जैसे प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करना चाहिए. इसके साथ ही आयकर विभाग और रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज के साथ समन्वय कर गवर्नेंस आधारित विस्तृत वेरिफिकेशन की आवश्यकता है.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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