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Law of Karma: मन, वचन और कर्म, यहीं से तय होता है जीवन का भविष्य

– रामबालक राय ‘प्रहरी’

Law of Karma:  मन, वचन और कर्म के द्वारा मनुष्य अपने जीवन में कार्य करता रहता है. यह कार्य शुभ और अशुभ दोनों तरह के होते हैं. जो सजग नहीं हैं, वे दोनों प्रकार के किये जाने वाले कर्म और उसके कर्मफल से अनजान बने रहते हैं.

वाणी का संयम और वाचा कर्म

बहुतेरे मनुष्य यही समझते हैं कि हाथ-पैर से किये जाने वाले किसी काम को कर्म कहते हैं, परंतु ऐसी बात नहीं है. मनुष्य जब भी कुछ बोलता है, वह भी वाचा कर्म, अर्थात् वचन से किया कर्म होता है. क्या बोलना है, क्या नहीं बोलना है, यह जानना बहुत जरूरी है, क्योंकि बोली गयी हर बात कर्म फल बनाता है.

मानसिक कर्म और मन की गति

 इसी से महापुरुषों ने ‘वाणी संयम’ का महत्व बताया है. बोलकर या शरीर से जब हम कोई कर्म नहीं करते हैं, तब भी मन कर्म करता है. मन की गति बहुत तेज होती है. जाग्रत और सुश्रुप्ता अवस्था में भी मन कार्य करता है. यह चिंतन मन द्वारा शुभ-अशुभ दोनों स्तर पर होता है. यह भी मानसिक कर्म कहलाता है, इसलिए इसका भी कर्म फल बनता  रहता है. मनुष्य भले अनजान बना रहे, परंतु कर्म फल तो अवश्य ही  बनता है.

कर्मफल और वैज्ञानिक दृष्टिकोण

वैज्ञानिक न्यूटन ने इसे गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत से प्रमाणित किया है. उन्होंने कहा है- ‘प्रत्येक क्रिया के विपरीत एवं समानांतर एक प्रतिक्रिया भी होती है.’ यह प्रतिक्रिया ही कर्मफल को जन्म देती है. जब कर्मफल बनेगा तब उसका भोग भी अवश्य ही करना पड़ेगा. इसीलिए हमारे मनीषियों ने वेदवाणी में कहा है – ‘अवश्यमेव भोग्यतव्यम् कृत कर्म शुभाशुभ्।’ अर्थात्- किये हुए शुभ और अशुभ कर्मों के फलभोग अवश्य ही करना पड़ता है.’ फल भोग से राम-रहीम कोई नहीं बचे हैं. सभी से ही किये जाने वाले कर्मों से सावधान रहने को कहा गया है.

कर्म प्रधानता और संस्कार

कर्म प्रधानता मानी गयी है. मानस में संत तुलसीदास ने कहा है – ‘कर्म प्रधान विश्व करी राखा।जो जस कर हीं सो तस फल चाखा।’ कर्म ही भाग्य का निर्माण करता है. अच्छे संस्कार और बुरे संस्कार कर्म से ही बनता है. यह बना हुआ संस्कार फल भोग के लिए कई जन्मों तक पीछा करता है. बाली ने राम से बदला द्वापर में कृष्ण से शिकारी बन कर लिया था. पूर्व जन्म में भीष्म पितामह ने सांप को अधमरा कर कंटीले बबूल पेड़ पर फेंका था, जिससे शरीर में अनेकों तीर गड़े गये थे. उसका फल भोग महाहिंदुस्तान युद्ध में अर्जुन के माध्यम से शर-शैय्या पर मिला था.

मनुष्य और अन्य जीवों में भेद

मनुष्य को छोड़कर अच्छे-बुरे का ज्ञान अन्य किसी भी जीव को नहीं है. विवेक बुद्धि के कारण ही मनुष्य, पशु से अलग होता है, अन्यथा मनुष्य और पशु भी आहार, निद्रा, भय और मैथुन में एक सामान होता है. ‘आहार, निद्रा, भय, मैथुनचंः समानऐतन पशुभि समानः। धर्मों हि तेसो विशेषो अधिकों, धर्मेन हीनः पशुभिनरानाम्।’ (उपनिषद्)

मनसा, वाचा और कर्मणा सजगता

अतः मनुष्य को मनसा, वाचा और कर्मणा तीनों से किये जाने वाले कर्म से सदा सजग होकर करना चाहिए.तीनों प्रकार से किये जाने वाले शुभ-अशुभ कर्मों पर नित्यप्रति शयनकाल के समय उसकी समीक्षा करनी चाहिए. अशुभ कर्मों को हमारे ऋषियों ने ध्यान, योग के माध्यम से ‘प्रत्याहार’ के द्वारा खत्म करने की बात कही है.

अशुभ कर्मों का निवारण

अशुभ भावनाओं को ध्यान में अपना आहार बनाकर खत्म करते रहना चाहिए. इससे कर्मफल बनने और भोगने से हम बचेंगे. अन्य उपाय उतने कारगर नहीं. वाणी संयम नहीं रहने से कई अशुभ कर्म होते हैं और मनुष्य नुकसान में रहते हैं. शुभ-अशुभ कर्म पर ध्यान देने से हमारा लोक-परलोक दोनों सुंदर बनता है. इसका हमें सदा ख्याल रखना चाहिए. (सुमन सागर)

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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