Siddha Laxmi Strotra: धर्म विशेषज्ञ बताते हैं कि सिद्ध लक्ष्मी स्तोत्र अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्रों में से एक माना जाता है. इसका उल्लेख कई पुराणों और तांत्रिक ग्रंथों में मिलता है. माना जाता है कि इसका नियमित पाठ करने से व्यक्ति के जीवन में धन से जुड़ी बाधाएं दूर होती हैं और सौभाग्य का प्रवाह बढ़ता है. यह स्तोत्र मन की शक्तियों को जाग्रत करके कठिन परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता भी बढ़ाता है.
सिद्ध लक्ष्मी स्तोत्र के मुख्य फायदे
आर्थिक संकट दूर करने में मदद करता है
मान्यता है कि स्तोत्र के पाठ से धन की कमी, कर्ज़, और आर्थिक रुकावटें धीरे-धीरे कम होने लगती हैं. कई ज्योतिषाचार्य इसे “वित्तीय स्थिरता का साधन” बताते हैं.
घर में धन लाभ के योग बढ़ते हैं
इस स्तोत्र को पढ़ने से माँ लक्ष्मी की कृपा घर-परिवार में बनी रहती है. व्यापार, नौकरी और नए अवसरों में तेजी आती है.
नकारात्मक ऊर्जा हटाता है
सिद्ध लक्ष्मी स्तोत्र को शक्तिशाली “ऊर्जा शुद्धि” का स्तोत्र भी कहा गया है. इसका उच्चारण घर में पॉजिटिव एनर्जी लाता है और नकारात्मक प्रभावों को दूर करता है.
मन को शांत और स्थिर करता है
पाठ के दौरान होने वाली ध्वनि-वाइब्रेशन मन को शांत करती है. इससे चिंता कम होती है और निर्णय क्षमता बढ़ती है.
किस्मत का साथ बढ़ता है
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, स्तोत्र के नियमित पाठ से व्यक्ति के जीवन में सौभाग्य बढ़ता है और रुके हुए कार्य पूरे होने लगते हैं.
पाठ का सही समय और तरीका
सुबह या संध्या के समय
साफ और शांत स्थान
सामने दीपक या अगरबत्ती जलाकर
मन को शांत करके
रोज़ 5–10 मिनट
शुक्रवार या पूर्णिमा को विशेष लाभकारी
नियम से पढ़ना सबसे बड़ा परिणाम देती है
सिद्ध लक्ष्मी स्तोत्र
॥ श्रीसिद्धिलक्ष्मीस्तोत्रम् ॥
॥ विनियोगः ॥
श्री गणेशाय नमः।
ॐ अस्य श्रीसिद्धिलक्ष्मीस्तोत्रस्य हिरण्यगर्भ ऋषिः,
अनुष्टुप् छन्दः, सिद्धिलक्ष्मीर्देवता, मम समस्त
दुःखक्लेशपीडादारिद्र्यविनाशार्थं
सर्वलक्ष्मीप्रसन्नकरणार्थं
महाकालीमहालक्ष्मीमहासरस्वतीदेवताप्रीत्यर्थं च
सिद्धिलक्ष्मीस्तोत्रजपे विनियोगः।
॥ करन्यासः ॥
ॐ सिद्धिलक्ष्मी अङ्गुष्ठाभ्यां नमः।
ॐ ह्रीं विष्णुहृदये तर्जनीभ्यां नमः।
ॐ क्लीं अमृतानन्दे मध्यमाभ्यां नमः।
ॐ श्रीं दैत्यमालिनी अनामिकाभ्यां नमः।
ॐ तं तेजःप्रकाशिनी कनिष्ठिकाभ्यां नमः।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ब्राह्मी वैष्णवी माहेश्वरी करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
॥ हृदयादिन्यासः ॥
ॐ सिद्धिलक्ष्मी हृदयाय नमः।
ॐ ह्रीं वैष्णवी शिरसे स्वाहा।
ॐ क्लीं अमृतानन्दे शिखायै वौषट्।
ॐ श्रीं दैत्यमालिनी कवचाय हुम्।
ॐ तं तेजःप्रकाशिनी नेत्रद्वयाय वौषट्।
ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं ब्राह्मीं वैष्णवीं फट्।
॥ ध्यानम् ॥
ब्राह्मीं च वैष्णवीं भद्रां षड्भुजां च चतुर्मुखाम्।
त्रिनेत्रां च त्रिशूलां च पद्मचक्रगदाधराम्॥1॥
पीताम्बरधरां देवीं नानालङ्कारभूषिताम्।
तेजःपुञ्जधरां श्रेष्ठां ध्यायेद्बालकुमारिकाम्॥2॥
॥ अथ मूलपाठः ॥
ॐकारलक्ष्मीरूपेण विष्णोर्हृदयमव्ययम्।
विष्णुमानन्दमध्यस्थं ह्रींकारबीजरूपिणी॥3॥
ॐ क्लीं अमृतानन्दभद्रे सद्य आनन्ददायिनी।
ॐ श्रीं दैत्यभक्षरदां शक्तिमालिनी शत्रुमर्दिनी॥4॥
तेजःप्रकाशिनी देवी वरदा शुभकारिणी।
ब्राह्मी च वैष्णवी भद्रा कालिका रक्तशाम्भवी॥5॥
आकारब्रह्मरूपेण ॐकारं विष्णुमव्ययम्।
सिद्धिलक्ष्मि परालक्ष्मि लक्ष्यलक्ष्मि नमोऽस्तुते॥6॥
सूर्यकोटिप्रतीकाशं चन्द्रकोटिसमप्रभम्।
तन्मध्ये निकरे सूक्ष्मं ब्रह्मरूपव्यवस्थितम्॥7॥
ॐकारपरमानन्दं क्रियते सुखसम्पदा।
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके॥8॥
प्रथमे त्र्यम्बका गौरी द्वितीये वैष्णवी तथा।
तृतीये कमला प्रोक्ता चतुर्थे सुरसुन्दरी॥9॥
पञ्चमे विष्णुपत्नी च षष्ठे च वैष्णवी तथा।
सप्तमे च वरारोहा अष्टमे वरदायिनी॥10॥
नवमे खड्गत्रिशूला दशमे देवदेवता।
एकादशे सिद्धिलक्ष्मीर्द्वादशे ललितात्मिका॥11॥
एतत्स्तोत्रं पठन्तस्त्वां स्तुवन्ति भुवि मानवाः।
सर्वोपद्रवमुक्तास्ते नात्र कार्या विचारणा॥12॥
एकमासं द्विमासं वा त्रिमासं च चतुर्थकम्।
पञ्चमासं च षण्मासं त्रिकालं यः पठेन्नरः॥13॥
ब्राह्मणाः क्लेशतो दुःखदरिद्रा भयपीडिताः।
जन्मान्तरसहस्रेषु मुच्यन्ते सर्वक्लेशतः॥14॥
अलक्ष्मीर्लभते लक्ष्मीमपुत्रः पुत्रमुत्तमम्।
धन्यं यशस्यमायुष्यं वह्निचौरभयेषु च॥15॥
शाकिनीभूतवेतालसर्वव्याधिनिपातके।
राजद्वारे महाघोरे सङ्ग्रामे रिपुसङ्कटे॥16॥
सभास्थाने श्मशाने च कारागेहारिबन्धने।
अशेषभयसम्प्राप्तौ सिद्धिलक्ष्मीं जपेन्नरः॥17॥
ईश्वरेण कृतं स्तोत्रं प्राणिनां हितकारणम्।
स्तुवन्ति ब्राह्मणा नित्यं दारिद्र्यं न च वर्धते॥18॥
या श्रीः पद्मवने कदम्बशिखरे राजगृहे कुञ्जरे
श्वेते चाश्वयुते वृषे च युगले यज्ञे च यूपस्थिते।
शङ्खे देवकुले नरेन्द्रभवनी गङ्गातटे गोकुले
सा श्रीस्तिष्ठतु सर्वदा मम गृहे भूयात्सदा निश्चला॥19॥
॥ इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे ईश्वरविष्णुसंवादे
दारिद्र्यनाशनं सिद्धिलक्ष्मीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
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