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Who are Indian Muslims : कौन हैं भारतीय मुसलमान? इतिहास के पन्नों में झांककर देखें

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Who are Indian Muslims : हिंदुस्तान की कुल आबादी 2025 में 140 करोड़ से ज्यादा हो गई है और हिंदुस्तान दुनिया का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है. इस आबादी में विभिन्न धर्म और जाति के लोग शामिल हैं, सबसे बड़ी आबादी हिंदुओं की है, जबकि दूसरे स्थान पर मुसलमान हैं. 2011 की जनगणना में इनकी आबादी 17 करोड़ से ज्यादा थी, अब जबकि 2025 में देश की आबादी 140 करोड़ हो गई है, तो निश्चित तौर पर इनकी आबादी में भी वृद्धि हुई होगी और यह संख्या 20 करोड़ से ज्यादा तो हो ही गई होगी.

हिंदुस्तान में जितने भी धर्म हैं, उनमें जिनकी संख्या सबसे अधिक है वे हिंदू, मुसलमान, सिख और ईसाई हैं. हिंदू और सिख ये दो धर्म ऐसे हैं, जिनके लिए हिंदुस्तान की धरती शुरुआत से ही परिचित थी. मुसलमान हिंदुस्तान में अब से करीब 1313 साल पहले आए. जो मुसलमान हिंदुस्तान आए थे, वे आक्रांता थे और उन्होंने यहां लूटमार की, हत्या की और अत्याचार किया. उनके अत्याचार का एक़ असर यह हुआ कि हिंदुस्तान में इस्लाम का प्रवेश हुआ और हिंदुस्तान के कुछ लोग मुसलमान बन गए.

कौन हैं हिंदुस्तानीय मुसलमान?

हिंदुस्तान में इस्लाम का प्रवेश कैसे हुआ और किस तरह इसने यहां विस्तार किया, इसे लेकर बहुत सटीक और विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है. शुरुआत निश्चिततौर पर व्यापारियों से हुई जो अरब से यहां व्यापार करने आते थे. लेकिन 712 ईस्वी में जब मुहम्मद बिन कासिम ने यहां हमला किया, तो उसके अत्याचार ने हिंदुस्तान को मुसलमानों से परिचित कराया. उसने ना सिर्फ यहां अपना आतंक फैलाया और यहां की संपत्ति को लूटा बल्कि उसने हारे हुए लोगों की संस्कृति पर भी हमला किया.

हिंदुस्तानीय इतिहास के विद्वान सर एचएम इलियट और जॉन डाउसन ने अपनी किताब, जो मूलत: मुस्लिम इतिहासकारों और लेखकों की कहानियों का अनुवाद है -The History of India as Told by Its Own Historians में लिखा है कि हिंदू औरतों को दास बाजारों में बेचा गया या फिर उन्हें हरम में रखा गया. जिन स्त्रीओं ने इस्लाम कबूल कर लिया उन्हें जीवनदान मिला और कुछ सम्मान भी. इस किताब में बताया गया है कि मुस्लिम शासकों ने इन युद्ध को धार्मिक विजय के तौर पर पेश किया है.

कहने का आशय यह है कि हिंदुस्तान में इस्लाम का प्रवेश शुरुआती दौर में डर की वजह से ही हुआ. जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के प्रोफेसर रहे एम मुजीब ने अपनी किताब THE INDIAN MUSLIMS में लिखा है कि हिंदुस्तान में रहने वाले जितने भी मुसलमान हैं, वे अधिकतर यहीं के लोग हैं, जो विभिन्न कारणों से धर्म बदलकर मुसलमान हो गए.

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मध्य युग में कैसे हिंदुस्तान में बढ़ी मुसलमानों की संख्या?

Indian-Muslims
हिंदुस्तानीय मुसलमान, एआई इमेज

मध्य युग में जब हिंदुस्तान में मुसलमान आए, तो उन्होंने जबरन या भय दिखाकर लोगों को मुसलमान बनाया. धीरे-धीरे यहां मुस्लिम प्रभाव बढ़ने लगा और 1206 में दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई. उसके बाद लगभग 500 वर्षों तक देश पर मुसलमानों का राज और प्रभाव कायम रहा. लेकिन दिल्ली सल्तनत की स्थापना से पहले का जो समय था, उस दौर में देश में मुसलमान आक्रमणकारी आ तो रहे थे, लेकिन वे यहां जमकर नहीं बैठे थे. मुहम्मद बिन कासिम जो एक अरब सेनापति था, उसने सिंध और मुल्तान पर कब्जा किया था. उसके आगे वह नहीं बढ़ पाया था. इस लिहाज से यह सही प्रतीत होता है कि हिंदुस्तान में मुसलमानों की आबादी तब बढ़ी जब दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई और मुसलमानों का शासन देश में विस्तृत होता गया.

इस्लाम के प्रति कैसे बढ़ा लोगों का आकर्षण

प्रोफेसर एम मुजीब (THE INDIAN MUSLIMS) और इतिहासकार किशोरी शरण लाल (Growth Of Muslim Population In Medieval India) दोनों ही अपनी-अपनी किताब में इस बात का जिक्र करते हैं कि हिंदुस्तान में मुसलमान सिर्फ वही लोग नहीं हुए जिनपर अत्याचार हुआ था. अत्याचार की वजह से देश में धर्मांतरण तो हुआ, लेकिन उनकी संख्या बहुत सीमित थी. बाद में जब दिल्ली सल्तनत की स्थापना हुई, तो कई अन्य वजहों से भी हिंदुस्तान के लोगों ने इस्लाम कबूल किया और इसमें कोई जबरदस्ती नहीं थी. ये प्रमुख कारण हैं-

  • जाति व्यवस्था से मुक्ति
  • सेना या प्रशासन में नौकरी का लालच
  • सूफी संतों का प्रभाव
  • समाज में सम्मान और अवसर पाने की चाह

धर्मांतरण के बाद भी हिंदुस्तानीय मुसलमान करते थे देवी-देवताओं की पूजा

प्रोफेसर एम मुजीब अपनी किताब में लिखते हैं कि अगर जनगणना की मानें, तो, जो भी खुद को मुसलमान मानता है और हिंदुस्तानीय है, वह मुसलमान है. लेकिन हिंदुस्तानीय मुसलमान को इस तरह परिभाषित करना उनका सरलीकरण करना है. असल में हिंदुस्तानीय मुसलमान की पहचान बहुत जटिल है. इसकी वजह यह है कि उनके रीति-रिवाज, मान्यताएं और जीवन-शैली अलग-अलग क्षेत्रों की वजह से अलग-अलग है. हिंदुस्तानीय मुसलमानों पर अगर गौर करें, तो उन्हें दो हिस्सों में बांटा जा सकता है एक शहरी मुसलमान और दूसरा ग्रामीण मुसलमान. शिक्षित मुसलमान अक्सर खुद को शहरी सभ्यता से जोड़ते हैं और वे इस्लामिक कायदों में ज्यादा बंधे हैं, जबकि ग्रामीण मुसलमानों की परंपराएं हिंदू समाज से बहुत मिलती-जुलती थीं. जैसे देवी-देवताओं की पूजा, टोने-टोटकों और संतों में विश्वास.

पंजाब, राजस्थान, गुजरात, सिंध, बिहार, बंगाल आदि में मुसलमानों की स्थानीय प्रथाएं अलग-अलग थीं. कई समुदाय (जैसे मीना, कोली, भील) मुस्लिम तो हो गए लेकिन उनके रीति-रिवाज हिंदू समाज से मिले-जुले रहे. सिंध में नदियों, पेड़ों और संतों की पूजा होती रही. बिहार-बंगाल में काली, भगवती, नाग-देवी जैसे देवी-देवताओं की आराधना मुसलमान भी करते थे. इस लिहाज से हिंदुस्तानीय मुसलमान एकसमान नहीं हैं—वे विविध परंपराओं और मान्यताओं का संगम हैं, लेकिन इस्लाम में साझा विश्वास ने उन्हें एक पहचान दी. वे कभी पूरी तरह से एक नेतृत्वक राष्ट्र नहीं रहे, बल्कि एक धार्मिक-सामाजिक समुदाय रहे. उन्होंने इस्लाम को स्वीकारा लेकिन रीति-रिवाजों में हिंदुस्तानीय हिंदू से जुड़े रहे.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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