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Women’s Day 2026: कोयले के काले गुबार और भारी मशीनों के बीच ‘ब्लैक डायमंड’ तराश रही हैं ये 4 महिलाएं

Women’s Day 2026, बोकारो (राकेश वर्मा): बोकारो स्थित सेंट्रल कोलफील्ड्स लिमिटेड (सीसीएल) के ढोरी एरिया अंतर्गत कोल इंडिया की मेगा परियोजना कोल इंडिया लिमिटेड की एएओडीसीएम परियोजना के अमलो रेलवे साइडिंग में स्त्रीएं साहस और मेहनत की नई मिसाल पेश कर रही हैं. यहां फीडर ब्रेकर जैसी भारी-भरकम मशीनों को चार स्त्रीएं निर्भीक होकर संचालित कर रही हैं. दोपहर करीब एक बजे रेलवे साइडिंग परिसर में बने छह फीडर ब्रेकर मशीनों में से चार मशीनों को स्त्रीएं ऑपरेट करती नजर आयीं. चारों ओर कोयले की धूल की परत और हवा में उड़ते कणों के बीच लोहे की ऊंची सीढ़ियों के सहारे स्त्रीएं मशीन तक पहुंचती हैं और कोयले के बड़े-बड़े टुकड़ों को क्रश कर उत्पादन कार्य में जुटी रहती हैं.

कोयले की धूल और ऊंचाई के बीच रोज मशीन ऑपरेट करती हैं स्त्रीएं

जानकारी के अनुसार, परियोजना के फेस से आने वाले कोयले को इन फीडर ब्रेकर मशीनों में क्रश किया जाता है. इसके बाद क्रश कोयले को रेलवे साइडिंग में वैगनों में लोड कर देश के विभिन्न पावर प्लांटों तक भेजा जाता है. यहां प्रतिदिन औसतन चार से पांच हजार टन कोयला क्रश किया जाता है. सुबह छह बजे से दोपहर दो बजे तक जनरल शिफ्ट में ये स्त्रीएं मशीनों का संचालन करती हैं. छह नंबर फीडर ब्रेकर मशीन इतनी ऊंचाई पर है कि किसी भी व्यक्ति को कोयले से ढकी लोहे की सीढ़ियां चढ़ने में डर लग सकता है, लेकिन ये स्त्रीएं रोज इसी रास्ते से चढ़कर अपना काम करती हैं.

चरकी, कुन्नी, गंगा और तुलसी के साहस को सलाम

अमलो साइडिंग में काम कर रहीं कुन्नी कुमारी पिछले आठ वर्षों से फीडर ब्रेकर मशीन चला रही हैं. इससे पहले वह अमलो साइडिंग में पीउन के पद पर कार्यरत थीं. वर्ष 2016 में ढोरी के तत्कालीन जीएम कोटेश्वर राव की प्रेरणा से उन्होंने मशीन चलाना शुरू किया. शुरुआत में हिचकिचाहट हुई, लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने मशीन चलाना सीख लिया. अब स्थिति यह है कि मशीन में तकनीकी खराबी आने पर वह उसे ठीक भी कर लेती हैं.

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2014 से चरकी कुमारी चला रही हैं फीडर ब्रेकर मशीन

चरकी कुमारी वर्ष 2014 से फीडर ब्रेकर मशीन चला रही हैं. इससे पहले वह भी अमलो परियोजना में पीउन के रूप में कार्यरत थीं. पहली बार मशीन ऑपरेट करने की जिम्मेदारी मिलने पर वह काफी डरी हुई थीं, लेकिन सीखने की ललक ने उन्हें इस काम में दक्ष बना दिया. पिता के निधन के बाद उन्हें यह नौकरी मिली थी.

1996 में मां के निधन के बाद मिली नौकरी, आज आठ वर्षों से चला रही क्रशर मशीन

तुलसी कुमारी भी पिछले आठ वर्षों से क्रशर मशीन चला रही हैं. इससे पहले वह अमलो परियोजना के 12 नंबर क्षेत्र में पीउन के रूप में काम करती थीं. पहली बार मशीन ऑपरेट करने की जिम्मेदारी मिलने पर उन्हें डर लगा, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और साथी कामगारों से प्रेरणा लेकर इस काम में दक्षता हासिल की. वर्ष 1996 में उनकी मां सोनी देवी के निधन के बाद उन्हें नौकरी मिली थी. वहीं, गंगा देवी वर्ष 2017 से मशीन ऑपरेट कर रही हैं. पहले वह भी पीउन के रूप में काम करती थीं. पति के निधन के बाद उन्हें सीसीएल में नौकरी मिली और आज वह पूरी आत्मविश्वास के साथ भारी मशीन का संचालन कर रही हैं.

स्त्रीओं ने कहा देश के विकास से जुड़ने पर गर्व

स्त्री ऑपरेटरों ने बातचीत में कहा कि स्त्रीएं अब किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से पीछे नहीं हैं. उन्होंने कहा कि कोयले से पूरे देश को बिजली मिलती है और इस प्रक्रिया से जुड़कर उन्हें गर्व महसूस होता है. कुन्नी कुमारी ने बताया कि तत्कालीन जीएम की प्रेरणा से उन्होंने मशीन चलाना शुरू किया और अब उन्हें किसी प्रकार का डर नहीं लगता. उन्होंने कहा कि वह करीब 30 वर्षों से सेवा में हैं. गंगा देवी ने बताया कि अमलो के तत्कालीन पीओ श्री यादव की प्रेरणा से उन्होंने मशीन ऑपरेट करना शुरू किया. आज वह बिना किसी भय के इस हैवी मशीन को चलाती हैं.

आठ वर्षों से नहीं मिला प्रमोशन, अधिकारियों से ध्यान देने की मांग

स्त्रीओं ने यह भी कहा कि उन्हें पिछले आठ वर्षों से प्रमोशन नहीं मिला है, जिस पर अधिकारियों को ध्यान देने की जरूरत है. वहीं, चरकी देवी ने कहा कि वह पहले बारूद से होने वाली ब्लास्टिंग के काम में जाना चाहती थीं, लेकिन बाद में इस मशीन पर काम शुरू किया और आज आत्मविश्वास के साथ इसे संचालित कर रही हैं.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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