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गोल्ड मेडल विजेता को झारखंड में मिल रही सिपाही और ट्रैफिक पुलिस की नौकरी, इधर बिहार में मिल रहा DSP का पद

Jharkhand Players: झारखंड के कई ऐसे प्रतिभावान खिलाड़ी है, जिन्होंने अपनी मेहनत के दम पर देश और राज्य के लिए कई मेडल्स जीते. लेकिन इन खिलाड़ियों का दुर्भाग्य देखिये राज्य प्रशासन इन्हें प्रतिष्ठित पद पर एक नौकरी नहीं दिला पा रही है. मेडल्स जीतने वाले कई खिलाडियों को तो राज्य में सिपाही बनाकर खानापूर्ति की जा रही है. इनसे प्रशासन सिपाही और ट्रैफिक पुलिस के रूप में सेवा ले रही है. एक ओर जहां झारखंड में मेडल लाने वाले खिलाड़ियों को सिपाही बनाया जा रहा है तो वहीं पड़ोसी राज्य बिहार में खिलाड़ियों को सब इंस्पेक्टर और डीएसपी के अलावा जिला स्तर की नौकरियां दी जा रही है.

स्वर्ण पदक विजेता को बनाया गया सिपाही

कॉमनवेल्थ गेम्स के लॉन बॉल में देश के लिए स्वर्ण पदक जीतने वाली लवली चौबे, रजत पदक विजेता दिनेश कुमार और सरिता तिर्की को राज्य में सिपाही बनाया गया है. झारखंड के लॉन बॉल के खिलाड़ी चंदन कुमार ने वर्ष 2022 में झारखंड के लिए स्पोर्ट्सा और कई मेडल्स भी जीतें. लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि राज्य प्रशासन की ओर से अब तक चंदन को कोई नौकरी नहीं मिली है. वह फिलहाल बिहार में प्रखंड पंचायती राज पदाधिकारी (4200 ग्रेड पे) के पद पर कार्यरत है.

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25 सालों में केवल 50 खिलाड़ियों को मिली नौकरी

आंकड़ों की बात करें तो बीते 25 सालों में झारखंड प्रशासन केवल 50 खिलाड़ियों को ही नौकरी दे सकी है. झारखंड बनने के बाद से अब तक राज्य प्रशासन की ओर से सीधी नियुक्ति का फायदा केवल 44 खिलाड़ियों को ही मिला है. इसके विपरीत पड़ोसी राज्य बिहार में वर्ष 2010 से खिलाड़ियों को नौकरी देने की शुरूआत हुई. बिहार में केवल 15 सालों के भीतर 271 खिलाड़ियों को नौकरियां मिल चुकी है. इनमें से अधिकतर खिलाड़ी प्रतिष्ठित पदों पर कार्यरत हैं.

खिलाड़ियों के लिए 2 प्रतिशत आरक्षण

झारखंड में खिलाड़ियों को सभी विभागों में नियुक्ति और 2 प्रतिशत क्षैतिज आरक्षण देने का प्रावधान है. पुलिस विभाग में पहली बार खिलाड़ियों को वर्ष 2003-04 में नौकरी मिली थी. वर्ष 2019 में 39 खिलाड़ियों को नौकरी मिली. इस तरह प्रावधान के अनुसार अब तक केवल 2 बार ही खिलाड़ियों को नौकरी मिली है. इसके अलावा पड़ोसी राज्य की बात करें तो बिहार में खिलाड़ियों को राज्य सेवा के बराबर का दर्जा मिलता है. मैडल जीतने वाले खिलाड़ियों को नौकरी में प्राथमिकता भी दी जाती है.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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