Mutual Fund: क्या आप म्यूचुअल फंड के जरिए मार्केट में पैसा लगाते हैं? अगर आप ऐसा करते हैं, तो आपके लिए एक जरूरी समाचार है. वह यह है कि आपको अपने पोर्टफोलियो को लंबे समय तक वैसे ही नहीं छोड़ देना है, बल्कि समय-समय पर उसे रिबैलेंस भी करना है. बाजार के उतार-चढ़ाव की तरह म्यूचुअल फंड पोर्टफोलियो भी हमेशा स्थिर नहीं रहते. उनमें भी उतार-चढ़ाव आता है. अगर पोर्टफोलियो को रिबैलेंस नहीं किया गया, तो अच्छी तरह से योजनाबद्ध पोर्टफोलियो भी निवेशक के लक्ष्यों और जोखिम उठाने की क्षमता से दूर हो सकते हैं. रिबैलेंस अपने पोर्टफोलियो को उसके इच्छित असेट्स मिक्स में वापस एडजस्ट करने और ट्रैक पर बने रहने के लिए महत्वपूर्ण है.
म्यूचुअल फंड पोर्टफोलियो क्यों होता है अनबैलेंस्ड
बाजार की तेजी-गिरावट और समय के साथ जीवन के वित्तीय लक्ष्यों में बदलाव म्यूचुअल फंड पोर्टफोलियो में असंतुलन पैदा कर सकते हैं. यहां तक कि एक अच्छे से प्लान किए गए पोर्टफोलियो को भी समय-समय पर दोबारा जांचना जरूरी होता है.
रीबैलेंसिंग कब करें?
फिनवेसिया के एमडी सर्वजीत सिंह विर्क के अनुसार, “पोर्टफोलियो रीबैलेंसिंग केवल मार्केट ट्रेंड पर निर्भर नहीं होती. यह आपके बदलते जीवन लक्ष्यों और वित्तीय स्थिति के अनुसार होनी चाहिए.”
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इन 6 परिस्थितियों में पोर्टफोलियो की करें रीबैलेंसिंग
- बाजार की अस्थिरता से बदला अलोकेशन: बाजार में उतार-चढ़ाव से इक्विटी, डेब्ट और कमोडिटी में असंतुलन हो सकता है. रीबैलेंसिंग से सही अनुपात बहाल होता है.
- जीवन में बड़ा बदलाव या अप्रत्याशित लाभ: नौकरी बदलना, शिशु की पढ़ाई या अचानक कोई वित्तीय लाभ, ये सभी आपकी जोखिम क्षमता को बदलते हैं.
- कर या नियामकीय बदलाव: कर नीति में बदलाव या नए टैक्स-फ्रेंडली प्रोडक्ट पोर्टफोलियो में बदलाव की मांग कर सकते हैं.
- नियमित वार्षिक समीक्षा जरूरी: सालाना पोर्टफोलियो चेक-अप से अलोकेशन अनुशासित रहता है और आप अपने लक्ष्यों से नहीं भटकते.
- सेक्टर में अवसर दिखे तो करें सैटेलाइट पोर्टफोलियो में बदलाव: किसी विशेष सेक्टर में उभरती संभावनाओं के अनुसार सैटेलाइट पोर्टफोलियो में निवेश बढ़ाना फायदेमंद हो सकता है.
- जब सेक्टर कमजोर हो तो निकास की रणनीति अपनाएं: किसी सेक्टर का आउटलुक नेगेटिव हो, तो वहां से बाहर निकलना और कोर होल्डिंग्स को मजबूत करना समझदारी है.
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