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सुंदरबन में बाघ से जंग जारी : 5 साल में 21 मौतें, आंकड़े घटे लेकिन खतरा बरकरार

Sundarbans Tiger Attack Deaths: पश्चिम बंगाल के सुंदरबन क्षेत्र में मानव और बाघ के बीच संघर्ष थमने का नाम नहीं ले रहा है. पिछले 5 वर्षों में बाघ के हमलों में 21 लोगों की जान जा चुकी है. हालांकि, हाल के वर्षों में मौत के आंकड़ों में थोड़ी कमी आयी है, लेकिन खतरा बरकरार है.

2022 में हुई सबसे ज्यादा मौतें

वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021 से 2025 के बीच बाघ के हमलों में 21 लोगों की मौत हुई है. वर्ष 2022 में सबसे ज्यादा मौतें हुईं. इसके बाद 2023 और 2024 में मामलों में कुछ गिरावट आयी, लेकिन बाघ के हमले पूरी तरह से बंद नहीं हुए हैं.

रोजी-रोटी के लिए जोखिम उठाते हैं लोग

सुंदरबन के कई लोग आज भी जंगल और नदी पर निर्भर हैं. मछली पकड़ना, शहद इकट्ठा करना और लकड़ी लाना यहां के लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन है. यही वजह है कि जोखिम जानते हुए भी लोग जंगल में जाते हैं और कई बार बाघ का शिकार बन जाते हैं.

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क्यों बढ़ता है संघर्ष?

विशेषज्ञों का कहना है कि प्राकृतिक आपदाओं, चक्रवात और पर्यावरणीय बदलावों के कारण बाघों का प्राकृतिक आवास प्रभावित हुआ है. इससे वे अक्सर गांवों की ओर रुख करते हैं. वहीं, जंगल पर बढ़ती लोगों की निर्भरता भी संघर्ष का बड़ा कारण है.

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क्या कह रहे हैं विशेषज्ञ?

वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि मानव-बाघ संघर्ष को कम करने के लिए बेहतर निगरानी, जागरूकता अभियान और वैकल्पिक आजीविका के साधन उपलब्ध कराना जरूरी है. साथ ही, जंगल में प्रवेश करने वालों के लिए सख्त नियमों का पालन और सुरक्षा उपाय अनिवार्य होने चाहिए.

खत्म नहीं हुआ है खतरा

पिछले 2 वर्षों में मौतों की संख्या कुछ कम हुई है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इसे स्थायी सुधार नहीं माना जा सकता. सुंदरबन का संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र अभी भी मानव-बाघ संघर्ष की चुनौती से जूझ रहा है.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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