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सोमनाथ हमारी सभ्यता का अटूट संकल्प है, पढ़ें पीएम मोदी का लेख

Somnath Temple : वर्ष 2026 की शुरुआत में मुझे सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में सम्मिलित होने का सौभाग्य मिला. यह सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले आक्रमण के एक हजार वर्ष बाद भी मंदिर के शाश्वत और अविनाशी होने का पर्व था. अब 11 मई को मुझे फिर सोमनाथ जाने का सुअवसर प्राप्त हो रहा है. इस बार यह यात्रा पुनर्निर्मित सोमनाथ मंदिर के लोकार्पण की 75वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में है. मैं उस क्षण को फिर जीने जा रहा हूं, जब देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद जी ने मंदिर का लोकार्पण किया था. उस दिन, सोमनाथ में विध्वंस से सृजन तक की यात्रा फिर से जीवंत होगी. छह महीनों के भीतर सोमनाथ के इतिहास से जुड़े इन दो अत्यंत महत्वपूर्ण पड़ावों का साक्षी बनना मेरे लिए बहुत सौभाग्य की बात है.

सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, हमारी सभ्यता का अटूट संकल्प है. इसके सामने लहराता विशाल समुद्र अनंत काल की अनूभूति कराता है. इसकी लहरें हमें सिखाती हैं कि तूफान चाहे कितने भी विकराल क्यों न हों, मनुष्य का साहस और आत्मबल हर बार फिर से उठ खड़ा होने में सक्षम है. तट से टकराती लहरें सदियों से यह उद्घोष कर रही हैं कि मानवीय चेतना को लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता. हमारे प्राचीन शास्त्रों में लिखा है : ‘प्रभासं च परिक्रम्य पृथिवीक्रमसंभवम्’. अर्थात दिव्य प्रभास (सोमनाथ) की परिक्रमा पूरी पृथ्वी की परिक्रमा के समान है! जब लोग यहां दर्शन-पूजन के लिए आते हैं, तब उन्हें उस सभ्यता की अद्भुत निरंतरता का भी अनुभव होता है, जिसकी ज्योति कभी बुझायी नहीं जा सकी. कई साम्राज्य आये और गये, समय बदला और इतिहास ने ढेरों उतार-चढ़ाव देखे, फिर भी सोमनाथ हमारे हृदय में हमेशा बना रहा. यह समय उन असंख्य महान विभूतियों के स्मरण का भी है, जो क्रूर आक्रांताओं के सम्मुख अडिग रहे.

लकुलीश और सोम शर्मा जैसे मनीषियों ने प्रभास को शैव दर्शन का महान केंद्र बनाया. चक्रवर्ती महाराज धारसेन चतुर्थ ने सदियों पहले वहां दूसरा मंदिर बनवाया था. समय की कठिन परीक्षा के बीच भीम प्रथम, जयपाल और आनंदपाल जैसे शासकों ने आक्रमणों के विरुद्ध अपनी सभ्यता की ढाल बनकर मंदिर की रक्षा की थी. ऐसा माना जाता है कि महान राजा भोज ने भी इस पावन स्थल के पुनर्निर्माण में अपना अमूल्य योगदान दिया था. कर्णदेव सोलंकी और जयसिंह सिद्धराज ने गुजरात की नेतृत्वक और सांस्कृतिक शक्ति को पुनर्स्थापित करने में अहम भूमिका निभायी. भाव बृहस्पति, कुमारपाल सोलंकी और पाशुपताचार्यों ने इस तीर्थ को आराधना और ज्ञान के केंद्र के रूप में स्थापित करने में अमूल्य योगदान दिया. विशालदेव वाघेला और त्रिपुरांतक ने इसकी बौद्धिक और आध्यात्मिक परंपराओं की रक्षा की.

महिपाल चूड़ासमा और राव खंगार चूड़ासमा ने विध्वंस के बाद पूजा-पाठ की परंपरा को पुनर्जीवित किया. पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर ने, जिनकी 300वीं जयंती मनायी जा रही है, सबसे चुनौतीपूर्ण समय में भी भक्ति की परंपरा को जीवंत रखा. बड़ौदा के गायकवाड़ों ने तीर्थयात्रियों के अधिकारों की रक्षा की. इसके साथ ही, हमारी यह धरती वीर हमीरजी गोहिल, वीर वेगड़ाजी भील जैसे पराक्रमियों से धन्य हुई है. उनके साहस और बलिदान को आज भी याद किया जाता है.

पूरे हिंदुस्तान में 1940 के दशक में स्वतंत्रता की भावना फैल रही थी. सरदार पटेल जैसे महान नेताओं के नेतृत्व में स्वतंत्र हिंदुस्तान की नींव रखी जा रही थी. ऐसे में एक बात जो उन्हें बहुत व्यथित करती थी, वह थी- सोमनाथ की दुर्दशा. तेरह नवंबर, 1947 को दिवाली के समय उन्होंने सोमनाथ के जर्जर अवशेषों के सामने खड़े होकर, समुद्र का जल हाथ में लेकर संकल्प लिया, ‘इस (गुजराती) नववर्ष पर हमारा निश्चय है कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण होगा. सौराष्ट्र के लोगों को इसके लिए हर तरह से अपना योगदान देना होगा. यह एक पावन कार्य है, जिसमें हर किसी को भागीदारी निभानी होगी.’ उनके इस आह्वान ने सिर्फ गुजरात ही नहीं, बल्कि संपूर्ण हिंदुस्तानवर्ष को नये उत्साह से भर दिया. दुर्भाग्यवश, सरदार पटेल अपने उस सपने को साकार होते नहीं देख सके, जिसके लिए उन्होंने स्वयं को समर्पित कर दिया था. इससे पहले कि जीर्णोद्धार के बाद सोमनाथ मंदिर भक्तों के लिए खुलता, उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. इसके बावजूद प्रभास पाटन की पावन धरती पर उनका प्रभाव निरंतर महसूस किया जाता रहा है. उनके विजन को केएम मुंशी ने आगे बढ़ाया, जिन्हें नवानगर के जामसाहेब का समर्थन मिला. वर्ष 1951 में मंदिर का पुनर्निर्माण पूरा होने पर राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद को उद्घाटन के लिए आमंत्रित किया गया. तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू के विरोध के बावजूद, डॉ प्रसाद ने समारोह में हिस्सा लेकर उसे ऐतिहासिक बना दिया.

मुझे अक्तूबर, 2001 का वह समय आज भी अच्छे से याद है, जब मैंने मुख्यमंत्री के रूप में दायित्व संभाला था. सरदार पटेल की जयंती के अवसर पर 31 अक्तूबर, 2001 को गुजरात प्रशासन ने सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की 50वीं वर्षगांठ का भव्य आयोजन किया. उसी समय सरदार पटेल की 125वीं जयंती भी मनायी जा रही थी. उस कार्यक्रम में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जी और तत्कालीन गृहमंत्री श्री लालकृष्ण आडवाणी जी की मौजूदगी ने उसे और भी गरिमापूर्ण बना दिया. डॉ राजेंद्र प्रसाद ने 11 मई, 1951 को अपने भाषण में कहा था कि सोमनाथ मंदिर दुनिया को यह संदेश देता है कि अद्वितीय श्रद्धा और विश्वास को कभी नष्ट नहीं किया जा सकता. उन्होंने आशा व्यक्त की थी कि यह मंदिर सदैव लोगों के हृदय में बसा रहेगा.

उन्होंने यह भी कहा था कि मंदिर के पुनर्निर्माण से सरदार पटेल का सपना साकार हुआ है. उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि सरदार पटेल की भावनाओं के अनुरूप लोगों के जीवन में समृद्धि भी लानी होगी. इसको लेकर उनके संदेश अत्यंत प्रेरणादायी रहे हैं. पिछले एक दशक से हम इसी मार्ग पर चल रहे हैं. ‘विकास भी, विरासत भी’ के मंत्र से प्रेरित होकर सोमनाथ से काशी, कामाख्या से केदारनाथ, अयोध्या से उज्जैन और त्रयंबकेश्वर से श्रीशैलम तक हमने अपने आध्यात्मिक केंद्रों को आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित किया है. इसके साथ ही उनकी पारंपरिक पहचान भी बनाये रखी है. आज बेहतर कनेक्टिविटी से ज्यादा से ज्यादा लोग यहां आ पा रहे हैं. इससे स्थानीय वित्तीय स्थिति को बल मिल रहा है, आजीविका सुरक्षित हो रही है, साथ ही ‘एक हिंदुस्तान, श्रेष्ठ हिंदुस्तान’ की भावना और सशक्त हो रही है.

सोमनाथ की रक्षा और इसके पुनर्निर्माण के लिए जिन्होंने अपना सर्वस्व बलिदान किया, उनका संघर्ष हम कभी नहीं भुला सकते. हिंदुस्तान के विभिन्न हिस्सों से आये लोगों ने इसकी भव्यता और दिव्यता को लौटाने में अपना अद्भुत योगदान दिया. उनकी ऐसी ही आस्था पूरे हिंदुस्तानवर्ष को लेकर भी थी. वे एकता की ऐसी अद्भुत डोर से बंधे थे, जिसे जमीनी सीमाओं में नहीं बांटा जा सकता. आज की विभाजित दुनिया में सोमनाथ से मिलने वाली एकता की यह सीख पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक है. सोमनाथ अपनी गौरवशाली परंपरा के साथ हमेशा खड़ा रहेगा, क्योंकि यह हमारी साझा सभ्यता का प्रतीक है.

इसी गौरव को नमन करते हुए बलिदान देने वाले वीरों की स्मृति में और दानवीरों की उदारता को याद करते हुए अगले एक हजार दिनों तक यहां विशेष पूजा आयोजित की जायेगी. यह देखकर बहुत प्रसन्नता हो रही है कि बड़ी संख्या में लोग इस पुनीत कार्य में अपना योगदान दे रहे हैं. सोमनाथ हमें याद दिलाता है कि जब कोई समाज अपनी आस्था, अपनी संस्कृति और अपनी एकता से जुड़ा रहता है, तब उसे लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता. आज भी हमारी सबसे बड़ी शक्ति यही साझा चेतना है, यही एकात्म भाव है. यही भावना हमें विभाजन से ऊपर उठकर राष्ट्रहित में साथ चलने की प्रेरणा देती है.

मैं सभी देशवासियों से आग्रह करता हूं कि इस पावन अवसर पर पवित्र सोमनाथ धाम की यात्रा करें और इसकी भव्यता के साक्षात दर्शन करें. जब आप सोमनाथ के तट पर खड़े होंगे, तब इसकी प्राचीन प्रतिध्वनियों को अपने भीतर महसूस करेंगे. वहां आपको केवल भक्ति का अनुभव नहीं होगा, बल्कि उस सभ्यतागत चेतना की सशक्त धड़कन भी सुनाई देगी, जो कभी रुकी नहीं, जिसकी तीव्रता कभी कम नहीं हुई. वहां आप हिंदुस्तान की उस अपराजित आत्मा का अनुभव करेंगे, जिसने हर आघात के बावजूद अपनी पहचान और अपनी संस्कृति को अक्षुण्ण बनाये रखा. आप समझ पायेंगे कि इतने प्रयासों के बाद भी क्यों हमारी सभ्यता मिट नहीं सकी. वहां आपको चिर विजय के उस दर्शन का अनुभव होगा, जो सदियों से हिंदुस्तान की शक्ति बना हुआ है. मुझे पूरा विश्वास है कि आपके लिए यह एक अविस्मरणीय अनुभव होगा.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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