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“बताओ तुम किसके साथ बैठते हो, हम बता देंगे तुम कहां पहुंचोगे”, चाणक्य की ये सीख पढ़ लें वरना करियर तबाह

Chanakya Niti: कहा जाता है कि व्यक्ति अपने विचारों और व्यवहार का प्रतिबिंब उसके परिवेश में ही देखने को मिलता है. आपने बड़े बुजुर्गों के मुंह से हमेशा सुना होगा कि तुम किसके साथ बैठते हो, यही तय करता है कि तुम कहां पहुँचोगे”. वहीं, इस बारे में चाणक्य का भी सपष्ट कहना था कि व्यक्ति अकेला नहीं बनता, वह अपनी संगति से बनता है. यही चीज आज की आधुनिक लाइफस्टाइल, सोशल मीडिया, कॉलेज लाइफ, कॉरपोरेट और रोजमर्रा की जिंदगी में पहले से कहीं ज्यादा प्रासंगिक है.

संगति तय करती है सोच और भविष्य

चाणक्य ने अपने श्लोक में लिखा है कि सज्जन संगति किम न करोति पुंसाम, दोषग्रहं हीनकथा कथानाम. इसका मतलब है कि सज्जनों की संगति मनुष्य के जीवन को बदल देती है, लेकिन बुरे लोगों की बातचीत और आदतें भी उतनी ही जल्दी व्यक्ति को अपने रंग में रंग देती हैं. उनका मानना था कि संगति वह है जो व्यक्ति के विचारों, व्यवहार, समय और सपनों की दिशा बदल देती है. अगर दोस्त प्रेरणा देने वाले हों, तो सपने बड़े और लक्ष्य स्पष्ट होते हैं. अगर दोस्त टालमटोल करने वाले हों, तो समय व्यर्थ और निर्णय कमजोर होते जाते हैं. आज के समय में फ्रेंड सर्कल कैरियर, रिलेशनशिप और निर्णय क्षमता तक को प्रभावित करने वाला बड़ा फैक्टर बन चुका है.

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आपके दोस्त आपकी चर्चा और दिशा दोनों तय करते हैं

चाणक्य नीति में लिखे गये श्लोक कहा गया है “यादृशी भूतिभिः संगतिः तादृशी भवति धृति.” इसका मतलब है ”जैसी संगति होती है, वैसी ही बुद्धि, वैसा ही स्वभाव और भविष्य बनता है. आपने अक्सर अपने जीवन में देखा है कि जो लोग सफलता, अनुशासन और सकारात्मकता की बात करते हैं, उन्हीं की जिंदगी उसी दिशा में बढ़ती है. जबकि जो समय की कद्र न करने वाले दोस्तों के साथ रहता है वह व्यक्ति भी धीरे-धीरे उसी आदत का हिस्सा बन जाता है. यहां तक कि हमारी आदतें, हमारी भाषा, हमारा खर्च और हमारा नजरिया भी आसपास के लोगों से बनता-बिगड़ता है.

सोशल मीडिया पर बनी संगति का भी होता है साइड इफेक्ट

चाणक्य के समय में सोशल मीडिया नहीं था, लेकिन उनकी नीति यहां भी फिट बैठती है. आज इंस्टाग्राम और व्हाट्सऐप पर समाज बनता है, राय बनती है, और तुलना बढ़ती है. जिसे हम फॉलो करते हैं, उससे हमारे विचार तय होते हैं. इसलिए कह सकते हैं वर्चुअल संगति भी असल जिंदगी के सपनों और आत्मविश्वास पर असर छोड़ती है.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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