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तदर्थ न्यायाधीश: समाधान की तलाश या व्यर्थ न्यायिक प्रयोग?

जयानंदन सिंह (भूतपूर्व न्यायधीश, पटना हाई कोर्ट)

Ad Hoc Judges: देश की न्यायपालिका आज एक गंभीर संकट से गुजर रही है. उच्च न्यायालयों में मामलों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है, जबकि न्यायाधीशों के पद बड़ी संख्या में खाली पड़े हैं. इस स्थिति में आम आदमी को समय पर न्याय मिलना कठिन होता जा रहा है. इसी पृष्ठभूमि में सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ वर्ष पहले संविधान के अनुच्छेद 224A के तहत तदर्थ न्यायाधीशों की नियुक्ति की संभावना पर विचार किया था. यह प्रयास देखने में सकारात्मक लगा, लेकिन व्यवहार में अब तक इसका कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया है. लोक प्रहरी बनाम हिंदुस्तान संघ मामले में 20 अप्रैल 2021 को दिए गए निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि वह संविधान के एक ऐसे प्रावधान को प्रयोग के रूप में सक्रिय करना चाहता है, जो अब तक शायद ही कभी इस्तेमाल हुआ हो.

अदालत का उद्देश्य यह था कि सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को तदर्थ रूप से नियुक्त कर उच्च न्यायालयों में बढ़ते लंबित मामलों को कम किया जा सके. इसके लिए अदालत ने प्रत्येक उच्च न्यायालय के लिए यह प्रस्ताव दिया था कि वह अपने स्तर पर एक विस्तृत योजना तैयार करे और आवश्यकता पड़ने पर तदर्थ न्यायाधीशों की सिफारिश करे. लेकिन चार वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है. देश के किसी भी उच्च न्यायालय में आज तक एक भी तदर्थ न्यायाधीश की नियुक्ति नहीं हुई है. न ही किसी उच्च न्यायालय ने ऐसी कोई ठोस सिफारिश भेजी है, जिसके आधार पर इस योजना को लागू किया जा सके. ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब किसी योजना से कोई परिणाम ही नहीं निकल रहा, तो उसे वर्षों तक जीवित रखने का क्या औचित्य है?

न्यायिक इतिहास पर नजर डालें, तो यह समस्या नई नहीं है. दशकों पहले विधि आयोग ने 1958 और फिर 1979 में चेतावनी दी थी कि न्यायालयों के काम का दायरा बढ़ने से मामलों की संख्या भी बढ़ेगी. आयोग ने यह भी साफ कहा था कि रिक्तियों को भरने की प्रक्रिया 6 महीने पहले शुरू हो जानी चाहिए . आयोग ने कहा था कि यदि न्यायाधीशों के रिक्त पद समय पर नहीं भरे गए, तो बकाया मामलों का ढेर लगना तय है. इसके बावजूद, आज भी नियुक्ति प्रक्रिया में देरी एक सामान्य बात बनी हुई है. वास्तविकता यह है कि तदर्थ न्यायाधीशों की व्यवस्था कभी भी स्थायी समाधान के रूप में नहीं सोची गई थी. यह एक असाधारण प्रावधान है, जिसे केवल विशेष परिस्थितियों में अभी तक सिर्फ 3 बार विशेष प्रयोजन केलिए इस्तेमाल किया गया है . लेकिन जब न्यायिक प्रणाली स्वयं लंबे समय से संरचनात्मक समस्याओं से जूझ रही हो, तब ऐसे अस्थायी उपाय से बड़े संकट का समाधान संभव नहीं है. यह मान लेना भी व्यावहारिक नहीं है कि प्रत्येक उच्च न्यायालय में यदि दो या चार तदर्थ न्यायाधीश नियुक्त कर दिए जाएं, तो इससे हजारों-लाखों लंबित मामलों पर कोई बड़ा असर पड़ेगा. कई उच्च न्यायालयों में हर वर्ष नए मामलों की संख्या इतनी अधिक हो जाती है और जितनी तेजी से मामले दर्ज होते हैं, उससे कहीं कम गति से उनका निपटारा हो पाता है. ऐसे में तदर्थ न्यायाधीश केवल प्रतीकात्मक राहत बनकर रह जाते हैं.

दूसरी ओर, वर्षों से न्यायिक सुधारों को लेकर अनेक नीतियां और दिशा-निर्देश तैयार किए गए हैं. न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया, प्रशासनों की मुकदमेबाजी नीति और न्यायालयों के प्रशासनिक सुधारों पर कई दस्तावेज मौजूद हैं. लेकिन इन सबका प्रभाव ज़मीनी स्तर पर बहुत सीमित रहा है. इसका मुख्य कारण है — इच्छाशक्ति की कमी और जिम्मेदारी तय न होना. अब समय आ गया है कि सर्वोच्च न्यायालय स्वयं इस सच्चाई को स्वीकार करे कि केवल तदर्थ न्यायाधीशों के प्रयोग से समस्या का समाधान नहीं होगा. किसी मामले को वर्षों तक लंबित रखकर, बार-बार आदेशों को संशोधित करना और उन्हें स्पष्ट करते रहना, न्यायिक ऊर्जा का सही उपयोग नहीं कहा जा सकता. इस संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय के कॉलेजियम की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है. कॉलेजियम को चाहिए कि वह न्यायाधीशों की नियुक्ति को केवल एक आंतरिक प्रक्रिया मानकर सीमित न रखे, बल्कि न्यायिक व्यवस्था से जुड़े अन्य हितधारकों से भी संवाद करे. उच्च न्यायालयों, वकीलों, विधि विशेषज्ञों और प्रशासनिक अधिकारियों के साथ खुले मन से विचार-विमर्श होना चाहिए.

न्यायपालिका की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि वह आम जनता को समय पर और प्रभावी न्याय दे सके. इसके लिए साहसिक और दीर्घकालिक फैसलों की आवश्यकता है. आधे-अधूरे प्रयोगों और अस्थायी उपायों से अब आगे बढ़ने का समय आ गया है. यदि न्यायिक सुधारों को गंभीरता से नहीं अपनाया गया, तो तदर्थ न्यायाधीशों का यह पूरा प्रयास भी इतिहास में एक ऐसे प्रयोग के रूप में दर्ज होगा, जिससे बहुत अपेक्षाएँ थीं, लेकिन कोई ठोस परिणाम नहीं निकला. अब आवश्यकता है ईमानदार आत्ममंथन की और ऐसी ठोस व्यवस्था बनाने की, जिससे हिंदुस्तानीय न्यायपालिका वास्तव में इस लंबे समय से चली आ रही बीमारी से बाहर निकल सके.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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