डंडा प्रखंड बचाओ संघर्ष समिति ने किया धरना-प्रदर्श प्रतिनिधि, गढ़वा डंडा. प्रखंड के अस्तित्व को बचाने के लिए शुक्रवार को सड़कों पर जनसैलाब उमड़ पड़ा. डंडा प्रखंड बचाओ संघर्ष समिति के बैनर तले आयोजित धरना-प्रदर्शन में बड़ी संख्या में स्त्री-पुरुष शामिल हुए. कार्यक्रम को संबोधित करते हुए संघर्ष समिति के नेताओं ने स्पष्ट कहा कि लंबे संघर्ष और जनआंदोलन के बाद डंडा प्रखंड का गठन हुआ है, इसलिए इसे किसी भी कीमत पर समाप्त नहीं होने दिया जायेगा. उन्होंने कहा कि प्रखंड की रक्षा के लिए जनता हर प्रकार की कुर्बानी देने को तैयार है. सभा को संबोधित करते हुए भाकपा माले जिला सचिव सह संघर्ष समिति के अध्यक्ष कालीचरण मेहता ने कहा कि डंडा की जनता को सभी भेदभाव भुलाकर एकजुट रहना होगा. उन्होंने गढ़वा उपायुक्त द्वारा प्रखंड हटाने की अनुशंसा को जनता की आकांक्षाओं पर सीधा हमला बताते हुए इसे पूरी तरह अस्वीकार्य करार दिया. उन्होंने कहा कि जो भी डंडा के अधिकारों पर हमला करेगा, उसे जनता एकजुट होकर जवाब देगी. पूर्व जिला परिषद अध्यक्ष सुषमा मेहता ने प्रशासनिक और वित्तीय मापदंड का हवाला देकर प्रखंड एवं अंचल की मान्यता रद्द करने की अनुशंसा को हास्यास्पद बताया. उन्होंने कहा कि विकास योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए विकेंद्रीकरण आवश्यक है और छोटे प्रखंड बनने से जनता को समय व धन दोनों की बचत होती है. छपरदगा पंचायत समिति की पूर्व सदस्य रहीना बीबी ने कहा कि प्रखंड हटने से आम लोगों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ेगा. वहीं भीखही पंचायत के मुखिया वीरेंद्र चौधरी ने कहा कि यदि किसी मापदंड की कमी है तो उसका विस्तार किया जा सकता है, लेकिन प्रखंड हटाने की अनुशंसा दुर्भाग्यपूर्ण है. संघर्ष समिति के उपाध्यक्ष सह झामुमो प्रखंड अध्यक्ष कामेश्वर चौधरी ने बताया कि 4 अक्टूबर 2008 को तत्कालीन मुख्यमंत्री शिबू सोरेन ने डंडा प्रखंड का उद्घाटन किया था. करीब 20 वर्षों से प्रखंड संचालित है और करोड़ों रुपये की लागत से भवन निर्माण किया गया है. जनता और जनप्रतिनिधियों की राय के बिना लिया गया निर्णय नौकरशाही मानसिकता को दर्शाता है. वर्तमान जिला परिषद सदस्य अजय चौधरी और पलामू भाकपा माले जिला सचिव रविंद्र भुइंया ने भी इस आंदोलन को पूर्ण समर्थन देने की घोषणा की. धरना-प्रदर्शन को डंडा मुखिया रूपा देवी सहित कई जनप्रतिनिधियों ने संबोधित किया. कार्यक्रम की अध्यक्षता कालीचरण मेहता ने की, संचालन तौकीर आलम ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन जवाहर चौधरी ने दिया.
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