Strait of Hormuz Oil Crisis: मिडिल ईस्ट में ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ती सैन्य तकरार ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है. ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मृत्यु के बाद उपजे तनाव से कच्चे तेल (Brent Crude) की कीमतों में 10% का जोरदार उछाल आया है. फिलहाल तेल की कीमतें 78.52 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं. मार्केट एक्सपर्ट अजय बग्गा के अनुसार, यह सिर्फ दो देशों की लड़ाई नहीं है, बल्कि ग्लोबल इकोनॉमी के लिए एक बड़ा खतरा है.
क्या तेल की कीमतें 150 डॉलर पार कर जाएंगी?
ANI की रिपोर्ट के अनुसार, एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर यह तनाव सीमित रहता है, तो कच्चा तेल 100-115 डॉलर तक जा सकता है. लेकिन अगर समुद्र के जरिए होने वाली सप्लाई रुकी, तो यह 140 डॉलर और यहां तक कि 150 डॉलर के पार भी पहुंच सकता है. सबसे बड़ी चिंता स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (Strait of Hormuz) को लेकर है, जहां से दुनिया का 20% तेल गुजरता है. अगर यह रास्ता बंद हुआ, तो दुनिया भर में तेल का अकाल पड़ सकता है.
हिंदुस्तान की वित्तीय स्थिति पर क्या असर पड़ेगा?
हिंदुस्तान अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल बाहर से खरीदता है. अजय बग्गा के मुताबिक, तेल की कीमत में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी हिंदुस्तान के व्यापार घाटे को बढ़ाती है और महंगाई में 0.30% से 0.40% तक का इजाफा करती है. इससे न केवल पेट्रोल-डीजल महंगा होगा, बल्कि माल ढुलाई महंगी होने से खाने-पीने की चीजें भी महंगी हो सकती हैं.
कौन से सेक्टर को होगा नुकसान और किसे फायदा?
तेल महंगा होने से एविएशन (हवाई जहाज), पेंट, केमिकल और ऑटो सेक्टर पर बुरा असर पड़ेगा क्योंकि इनकी लागत बढ़ जाएगी. दूसरी ओर, तेल निकालने वाली कंपनियों, डिफेंस (रक्षा क्षेत्र) और आईटी सेक्टर को इससे कुछ हद तक फायदा मिल सकता है.
निवेशकों को अब क्या करना चाहिए?
2026 में बदलती जियोपॉलिटिक्स को देखते हुए एक्सपर्ट्स की सलाह है कि निवेशक अपने पोर्टफोलियो को स्ट्रेस-टेस्ट करें. यानी यह मानकर चलें कि तेल 120 डॉलर तक जा सकता है. ऐसे में गोल्ड और रियल एसेट में निवेश करना एक सुरक्षित ऑप्शन हो सकता है.
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