asha bhosle :हिंदुस्तानीय सिनेमा की दिग्गज गायिका आशा भोसले का निधन बीते रविवार को हो गया. वह 92 साल की थी.संगीतकार उत्तम सिंह और आशा भोसले का साथ दशकों पुराना है.आशा भोसले के साथ अपने जुड़ाव और पुरानी यादों को उन्होंने उर्मिला कोरी के साथ साझा किया. बातचीत के प्रमुख अंश
90 की उम्र में भी प्लेबैक सिंगिंग करना चाहती थी
पंजाबी की एक लोकप्रिय फिल्म है। नानक नाम जहाज़ है. 1969 में वह फिल्म रिलीज हुई थी. उसमें उन्होंने पंजाबी शबद गाये थे। मैंने उसमें वायलिन बजाया था. उस फिल्म से हमारी पहचान शुरू हुई जो जल्द ही पारिवारिक बन गयी। वह समय के साथ म्यूजिक की आइकॉन बन गयी लेकिन मेरे साथ हमेशा उनका रिश्ता बहुत घरेलू रहा. हमेशा वह मेरे काम के लिए मौजूद रहती थी. काम को लेकर वह बहुत जुनूनी थी. गानों को लेकर उनके नाम पर ना जाने कितने रिकॉर्ड हैं लेकिन वह 90 की उम्र में भी गाना चाहती थी. मैं जब कभी उनको फ़ोन करता कि दीदी कैसी हैं तो वह जवाब में कहती कि हाल तो ठीक है उत्तम लेकिन बहुत टाइम से कोई रिकॉर्डिंग वगैरह नहीं हुई.वह इस उम्र में भी काम करना चाहती थी.
आखिरी मुलाक़ात
आठ महीने पहले मैं उनसे अपनी एक मराठी फिल्म में गाने के लिए मिलने गया था। भले गाने को लेकर बात नहीं बनी लेकिन उन्होंने कहा कि घर में कबाब बने हैं। खाकर जाना है.मैं उनके घर गया हूँ और बिना खाये आऊं। ऐसा 50 सालों में कभी नहीं हुआ था. आशाजी बहुत ही केयरिंग थी. मुझे याद है बहुत साल पहले एक बार रात को दो बजे हमलोग उनके घर से निकल रहे थे. हेमंत भोंसले के साथ म्यूजिक सीटिंग करके. मेरे असिस्टेंट राम जी भी मेरे साथ थे. जैसे दरवाजा खोला सामने से वो आ रही थी. वों एक रिकॉर्डिंग से लौटी थी. उन्होने कहा अरे तुमलोग अभी भी यही हो. मैंने बोला हां काम कर रहे थे. उन्होने पूछा कि खाना खाया. मैंने बोला घर जाकर खा लेंगे उन्होने बोला नहीं रुको. बस बीस मिनट दो. मैं बताना चाहूंगा कि उतनी रात को बिना किसी नौकर को जगाये उन्होंने खुद ही चिकन और पुलाव बीस मिनट में गरमागरम बनाकर ले आयी. उन्होने अपने हाथों से हमें परोसा और जब तक हम खाकर अपने घर के लिए निकले नहीं. वे हमारे पास ही बैठी रही थी.
एक घंटे में दिल ले गयी रिकॉर्ड कर दिया था
आशाजी के करियर के सुपरहिट गीतों में मेरे द्वारा कंपोज़ किया गया फिल्म दिल तो पागल है का गीत दिल ले गयी.. ले गयी भी शामिल है. यह मेरी खुशकिस्मती है कि यह गाना इतना बड़ा हिट बन गया कि आशाजी का कोई भी कॉन्सर्ट इस गाने के बिना पूरा नहीं होता था. इस गाने से जुड़ी रिकॉर्डिंग के अनुभव को याद करुं, तो यश जी कैम्प की सबसे अच्छी बात ये थी कि उनके संगीतकार को जो चाहिए, वों उसे करने की पूरी आजादी देते थे. जब मैंने दिल ले गयी.. ले गयी कंपोज़ किया तो मैंने कहा ये गाना आशाजी का गाना है. आशाजी को बुलाया गया. मैंने उन्हें गाना बताया. गाना था दिल ले गयी.. ले गयी.. लेकिन जब गाया गया तो वों ऐसे गाया गया दिल ले गयी.. ले गयी.या या या , जो लास्ट में एक अलग अंदाज में या या या शब्दों को उन्होंने खींचा है. वो उनका ही आईडिया था. उन्होंने कहा कि उत्तम में ऐसा करुं. मैंने कहा कि आप कीजिये. उन्होने एक घंटे में इस गाने को रिकॉर्ड कर दिया था.
रिहर्सल में भी परफेक्शन के साथ गाती थी
आशाजी को संगीत में लीजेंड उनकी मेहनत और समर्पण ने बनाया है. रिहर्सल को भी वह बहुत महत्व देती थी . मुझे याद है हमने जब साल 77 का म्यूजिकल टूर शुरू किया, तो उसकी तैयारी 76 से रिहर्सल करना शुरू कर दिया था. एक साल पहले से. लाइव शो करने से पहले हम उसी स्टेज पर पूरी रिहर्सल करते थे चार से पांच घंटे. वों पूरा दिन हमारी बहुत मेहनत का दिन होता था. रिहर्सल में भी वे सारे गाने पूरे परफेक्शन के साथ गाती थी. जो उन्होने में गाया है वैसा ही स्टेज शो ही नहीं बल्कि कार्बन कॉपी गाती थी. एक भी सुर इधर से उधर नहीं होता था.
रो रही थी और कैबरे गा रही थी
इंडस्ट्री में यह बात प्रसिद्ध है कि आशाजी गाने के मूड को ध्यान में रखकर गाती थी.ख़ुशी वाले गानों को मुस्कुराते हुए जाती थी, लेकिन मैंने उन्हें आँखों में आंसू लेकर कैबरे गाने हुए देखा है.मुझे अभी वो गाना याद नहीं आ रहा है लेकिन कैबरे सांग था. ये अच्छे से याद है. मैं अरेंजर उस वक़्त हुआ करता था. देखा दीदी आयी हैं, लेकिन उनकी आँखों में आंसू हैं. मैंने पूछा क्या हुआ आपको. उन्होंने कहा कि बाद में बताती हूँ. पहले काम करते हैं. उसके बाद उन्होंने कैबरे सांग गाया. पूरे शरारत और मस्ती के अंदाज में गाय था कोई बोल ही नहीं सकता था कि ये लेडी पीछे से कुछ तकलीफ में आयी है. आँखों में आंसू है.ऐसे कमाल के कलाकार अब ऊपर वाला नहीं बनाएगा. ये ढांचे बनना बंद हो गए है. एक युग में ऐसे लोग आते हैं.
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