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RJD की 20 साल की सियासी कहानी: 2005 की हार से 2020 की वापसी और 2025 के झटके तक, कहां चूकी पार्टी?

RJD Political Journey: बिहार की नेतृत्व में राष्ट्रीय जनता दल (RJD) का इतिहास केवल चुनावी जीत-हार का इतिहास नहीं है. यह सामाजिक न्याय की नेतृत्व, मंडल के बाद बदले सामाजिक समीकरण, सुशासन और विकास की मांग, गठबंधन की नेतृत्व और नेतृत्व परिवर्तन की कहानी भी है. 1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव ने जिस नेतृत्वक आधार को तैयार किया, उसने लंबे समय तक बिहार की सत्ता को प्रभावित किया. लेकिन 2005 के बाद परिस्थितियां बदलने लगीं.

यह कहना सही नहीं होगा कि 2005 के बाद RJD लगातार कमजोर ही होती गई. पार्टी को 2010 में बड़ा झटका लगा, 2015 में उसने शानदार वापसी की और 2020 में विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनी. इसके बावजूद वह सत्ता से दूर रही और 2025 के विधानसभा चुनाव में उसकी सीटों में फिर बड़ी गिरावट आई.

ऐसे में सवाल है कि RJD की कमजोरी की वजह क्या रही? लालू यादव की नेतृत्व में कहां सीमाएं दिखाई दीं? तेजस्वी यादव ने पार्टी को कितना बदला और BJP-JDU ने RJD की चुनौती का मुकाबला किस तरह किया?

बिहार विधानसभा चुनाव 2010 में लालू यादव की पार्टी का प्रदर्शन बेहद खराब रहा

2010: RJD को सबसे बड़ा चुनावी झटका

2010 का विधानसभा चुनाव RJD के लिए बेहद खराब रहा. पार्टी केवल 22 सीटों पर सिमट गई. दूसरी ओर JDU और BJP गठबंधन ने बड़ी जीत हासिल की. इस चुनाव ने बता दिया कि बिहार की नेतृत्व में RJD का पुराना चुनावी मॉडल अब मुकाबला जीतने के लिए पर्याप्त नहीं रह गया है.

नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली प्रशासन ने सड़क, पुल, शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासन और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को नेतृत्वक उपलब्धि के रूप में पेश किया. BJP ने भी संगठन और अपने पारंपरिक सामाजिक आधार के साथ गठबंधन को मजबूती दी.

RJD के सामने इस समय सबसे बड़ी समस्या केवल चुनावी हार नहीं थी. पार्टी के पास लालू यादव की लोकप्रियता तो थी, लेकिन उनके बाद के नेतृत्व और संगठनात्मक विस्तार का सवाल भी सामने आने लगा था.

2015: RJD की वापसी

2015 में बिहार की नेतृत्व ने फिर करवट ली. BJP से अलग होने के बाद नीतीश कुमार ने RJD और कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाया.

लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार, जो लंबे समय तक एक-दूसरे के नेतृत्वक प्रतिद्वंद्वी रहे थे, इस बार एक मंच पर थे. इस गठबंधन ने BJP के सामने एक बड़ा सामाजिक और नेतृत्वक गठजोड़ खड़ा कर दिया.

नतीजे RJD के पक्ष में रहे. पार्टी 80 सीटों के साथ विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनी. JDU को 71 और कांग्रेस को 27 सीटें मिलीं.

यह RJD की बड़ी वापसी थी. लेकिन इस चुनाव की एक दिलचस्प बात यह रही कि सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद मुख्यमंत्री पद RJD के पास नहीं गया. नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने और तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री.

2015 के परिणाम ने यह भी बताया कि बिहार में गठबंधन सामाजिक समीकरणों को किस तरह बदल सकता है.

चुनाव प्रचार के दौरान तेजस्वी यादव

तेजस्वी यादव का उभार

2015 के बाद तेजस्वी यादव को RJD के भविष्य के चेहरे के रूप में देखा जाने लगा. उनके सामने दोहरी चुनौती थी. पहली, लालू यादव के मजबूत सामाजिक आधार को बनाए रखना. दूसरी, नई पीढ़ी का विश्वास जीतना और नया आधार बनाना.

तेजस्वी ने धीरे-धीरे रोजगार, शिक्षा और युवाओं से जुड़े मुद्दों को अपनी नेतृत्व के केंद्र में रखा. यह बदलाव महत्वपूर्ण था क्योंकि RJD पर लंबे समय से जातीय नेतृत्व पर अधिक निर्भर रहने का आरोप लगता रहा था.

तेजस्वी की नेतृत्व ने पार्टी को एक नया चेहरा जरूर दिया, लेकिन पुरानी छवि पूरी तरह समाप्त नहीं हुई. यही उनकी नेतृत्वक चुनौती बनी रही.

2017: महागठबंधन का टूटना

2017 में बिहार की नेतृत्व फिर बदल गई. नीतीश कुमार ने महागठबंधन से अलग होकर BJP के साथ प्रशासन बना ली. इसके बाद RJD विपक्ष में चली गई और तेजस्वी यादव को विपक्ष के नेता के रूप में अपनी नेतृत्वक पहचान बनाने का अवसर मिला.

यहीं से तेजस्वी की नेतृत्व का नया दौर शुरू हुआ. उन्होंने प्रशासन पर बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास को लेकर सवाल उठाने शुरू किए. धीरे-धीरे वह RJD के प्रमुख चुनावी चेहरे के रूप में स्थापित हुए.

2020: तेजस्वी ने RJD को फिर सबसे बड़ी पार्टी बनाया

2020 का विधानसभा चुनाव तेजस्वी यादव के लिए महत्वपूर्ण रहा. 75 सीटें जीतकर राजद विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी बनी. इस चुनाव में रोजगार बड़ा मुद्दा बना. तेजस्वी ने प्रशासनी नौकरियों और बेरोजगारी के मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया. युवा मतदाताओं के बीच उनकी पकड़ बढ़ी.

लेकिन NDA ने भी प्रभावी रणनीति अपनाई. BJP का संगठन, नरेंद्र मोदी की मास अपील, नीतीश कुमार की प्रशासन की योजनाएं और सामाजिक गठबंधन NDA के पक्ष में रहे. नतीजा यह हुआ कि RJD सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद प्रशासन नहीं बना सकी.

यह RJD के लिए बड़ा सबक था. प्रशासन बनाने के लिए सिर्फ मजबूत कोर वोट बैंक पर्याप्त नहीं है. उसे अतिरिक्त सामाजिक समूहों में भी समर्थन बढ़ाना होगा.

BJP और JDU ने RJD को कैसे चुनौती दी?

RJD के सामने BJP और JDU की रणनीति अलग-अलग लेकिन कई मामलों में एक-दूसरे की पूरक रही. JDU ने अत्यंत पिछड़े वर्गों, स्त्रीओं और गैर-यादव पिछड़े समूहों में अपना आधार बनाया. नीतीश कुमार ने विकास और सुशासन को अपनी नेतृत्वक पहचान से जोड़ा.

BJP ने अपने मजबूत संगठन और राष्ट्रीय नेतृत्व के साथ सामाजिक विस्तार किया. समय के साथ BJP ने पिछड़े, अति पिछड़े और दलित समुदायों में भी अपनी पहुंच बढ़ाई. दोनों दलों ने RJD के सामने एक ऐसा गठबंधन खड़ा किया जिसमें सामाजिक समीकरण के साथ विकास, कल्याणकारी योजनाएं, स्त्री मतदाता और राष्ट्रीय नेतृत्व जैसे मुद्दे शामिल थे. यही RJD के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी.

2025 ने फिर उठाए गंभीर सवाल

2025 के विधानसभा चुनाव ने RJD की रणनीति पर फिर सवाल खड़े किए. पार्टी को करीब 23 प्रतिशत वोट मिले, लेकिन उसकी सीटों की संख्या 25 रह गई. यह आंकड़ा महत्वपूर्ण है. इसका मतलब है कि RJD का मूल मतदाता आधार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है.

कई सीटों पर पार्टी मजबूत रही, लेकिन जीत के लिए जरूरी अतिरिक्त सामाजिक समर्थन हासिल नहीं कर सकी. दूसरी ओर NDA ने अपने वोट को सीटों में ज्यादा प्रभावी ढंग से बदलने में सफलता हासिल की. इससे यह सवाल फिर सामने आया कि क्या RJD अपने पारंपरिक यादव-मुस्लिम आधार से बाहर पर्याप्त विस्तार कर पा रही है?

इसके अलावा, तेजस्वी के सामने एक और बड़ी चुनौती परिवार को एक रखने की है. उनके बड़े भाई तेज प्रताप यादव को पार्टी से निकाल दिया गया और उन्होंने अलग पार्टी बना ली. बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के रिजल्ट के बाद परिवार के लोगों में जमकर बयानबाजी हुई थी.

तेजस्वी के सामने अब असली चुनौती

तेजस्वी यादव के सामने चुनौती केवल BJP या JDU को हराने की नहीं है. उन्हें RJD की नेतृत्वक छवि को भी बदलना होगा. पार्टी को यह साबित करना होगा कि वह केवल एक सामाजिक समूहों के गठबंधन की पार्टी नहीं, बल्कि शासन चलाने का व्यापक विकल्प है.

इसके लिए तीन मोर्चों पर काम करना होगा.

  1. यादव और मुस्लिम आधार को मजबूत रखते हुए गैर-यादव पिछड़े, अत्यंत पिछड़े, दलित और स्त्री मतदाताओं में विस्तार.
  2. रोजगार और सामाजिक न्याय के साथ विकास, निवेश, शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों पर कार्यक्रम.
  3. बूथ स्तर तक मजबूत संगठन और स्थानीय नेतृत्व का विकास.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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