झारखंड के औद्योगिक शहर जमशेदपुर में जब भी कोई सायरन बजता है, तो वह केवल एक कारखाने की शिफ्ट बदलने का संकेत नहीं होता. बल्कि वह हिंदुस्तान की औद्योगिक धड़कन का भी अहसास कराता है. 1945 में जिस कंपनी की नींव हिंदुस्तानीय रेलवे के भाप के इंजन यानी लोकोमोटिव बनाने के लिए रखी गई थी, आज वह दुनिया की दिग्गज ऑटोमोबाइल कंपनियों को टक्कर दे रही है. हम बात कर रहे हैं Tata Motors की. वो कंपनी, जिसके ट्रक दशकों से हिंदुस्तान की वित्तीय स्थिति का भार उठा रहे हैं और जिसकी पैसेंजर कारें आज लोगों के बीच ‘5-स्टार सेफ्टी’ और ‘इलेक्ट्रिक व्हीकल’ का पर्याय बन चुकी हैं.
Tata Group के संस्थापक जमशेदजी नुसरवानजी टाटा जिन्हें जमशेदजी टाटा के नाम से भी जाना जाता है, के नाम पर जमशेदपुर का नाम पड़ा. इससे पहले यह इलाका ‘साकची’ के नाम से जाना जाता था. 1919 में लॉर्ड चेम्सफोर्ड ने जमशेदजी टाटा के सम्मान में इसका नाम साकची से बदलकर ‘जमशेदपुर’ किया था. इसी इलाके के रेलवे स्टेशन का नाम पहले ‘कालीमाटी’ था, जिसे आज ‘टाटानगर’ कहा जाता है. उन्होंने ही इस शहर की नींव रखी और यहां ‘Tata Steel’ प्लांट की परिकल्पना की.
लॉजिस्टिक्स की रीढ़ माने जाने वाले टाटा के ट्रकों से लेकर, हिंदुस्तान की पहली स्वदेशी कार ‘Indica’ और आज की एडवांस ‘Nexon EV’ तक का सफर किसी हॉलीवुड थ्रिलर से कम नहीं है. नया विचार के इस स्पेशल ऑटोमोबाइल सीरीज ‘सफरनामा’ में, आज हम पढ़ेंगे ‘Tata Motors’ की कहानी. इस सफरनामे में हम कंपनी के संघर्ष, अपमान और प्रयोगों की भट्टी में तपकर खुद को एक ग्लोबल लीडर बनाने की यात्रा को इस लेख के जरिए महसूस करेंगे.
जमशेदजी का वो सपना, जिस पर दौड़ी टाटा की गाड़ियां
भले ही टाटा मोटर्स की आधिकारिक शुरुआत 1945 में हुई, लेकिन इसके बीज बहुत पहले बोए जा चुके थे. टाटा समूह के संस्थापक जमशेदजी नुसीरवानजी टाटा ने जब हिंदुस्तान के पहले औद्योगिक शहर (जिसे आज हम जमशेदपुर कहते हैं) का सपना देखा था, तब उनका विजन केवल स्टील (TISCO) बनाने तक सीमित नहीं था; वे एक ऐसा ‘आत्मनिर्भर हिंदुस्तान’ चाहते थे जो सुई से लेकर भारी मशीनरी तक खुद बनाए.
1904 में जमशेदजी के निधन के बाद, उनके इसी औद्योगिक सपने को साकार करने और हिंदुस्तान को ‘पहिए’ देने की जिम्मेदारी उनके वंशज जेआरडी टाटा ने उठाई. जमशेदजी की दूरदृष्टि और जेआरडी टाटा के एग्जीक्यूशन का ही नतीजा था कि जमशेदपुर की जमीन से ‘टेल्को’ (TELCO) का जन्म हुआ
‘सिएरा’ का दौर और स्वदेशी ‘इंडीका’ का जन्म (1991-1998)
1991 में रतन टाटा ने कमान संभाली. उदारीकरण के उस दौर में उन्होंने भांप लिया था कि कंपनी सिर्फ कमर्शियल गाड़ियां बनाकर भविष्य में सर्वाइव नहीं कर सकती.
1991 में ही टाटा ने हिंदुस्तान की पहली स्वदेशी एसयूवी टाटा सिएरा (Tata Sierra) उतारी. इसके बाद एस्टेट (Estate) और सूमो (Sumo) ने बाजार में दस्तक दी. लेकिन असली भूचाल 1998 के नई दिल्ली ऑटो एक्सपो (Auto Expo) में आया. रतन टाटा ने हिंदुस्तान की पहली पूरी तरह से स्वदेशी रूप से निर्मित कार टाटा इंडीका (Tata Indica) पेश की. इसका नारा था- “More car per car”. यह कार रातों-रात हिट हुई और पहली बार हिंदुस्तानीय कार बाजार में मारुति सुजुकी के वर्चस्व को सीधी चुनौती मिली.
नैनो का सपना: इंजीनियरिंग में हिट, पर मार्केटिंग में फ्लॉप
2008 में ही टाटा मोटर्स ने 1 लाख रुपये की टाटा नैनो (Nano) पेश की. विचार शानदार था- बारिश में भीगने वाले दोपहिया वाहन के परिवारों को एक सुरक्षित, किफायती कार देना.
इंजीनियरिंग के नजरिए से नैनो एक चमत्कार थी, लेकिन यह एक बड़ी मार्केटिंग फेलियर साबित हुई. सिंगूर विवाद के कारण प्लांट शिफ्ट करना पड़ा, लेकिन सबसे बड़ा नुकसान इसकी ब्रांडिंग से हुआ. कंपनी ने इसे “दुनिया की सबसे सस्ती कार” (Cheapest Car) कहकर प्रमोट किया. हिंदुस्तान में कार खरीदना एक ‘स्टेटस सिंबल’ होता है और कोई भी व्यक्ति अपने पड़ोसियों को यह नहीं दिखाना चाहता था कि उसने देश की सबसे ‘सस्ती’ कार खरीदी है. नतीजतन, यह शानदार प्रयोग बाजार में फ्लॉप हो गया.
सेफ्टी फर्स्ट: माइलेज के दीवाने देश को क्रैश टेस्ट सिखाना
दशकों तक हिंदुस्तानीय कार बाजार सिर्फ एक सवाल के इर्द-गिर्द घूमता था- “माइलेज कितना देती है?”
टाटा ने इस नैरेटिव को जड़ से बदल दिया. 2018 में, टाटा नेक्सन (Tata Nexon) ग्लोबल NCAP क्रैश टेस्ट में 5-स्टार रेटिंग हासिल करने वाली हिंदुस्तान की पहली कार बनी. टाटा ने ग्राहकों को सिखाया कि कार में सबसे महत्वपूर्ण चीज टचस्क्रीन नहीं, बल्कि परिवार की सुरक्षा है. आज जब हिंदुस्तान प्रशासन ने अपना खुद का ‘हिंदुस्तान NCAP (B-NCAP)’ लागू किया है, तो उसमें भी टाटा की गाड़ियां लगातार 5-स्टार हासिल कर रही हैं.
2025 का ऐतिहासिक बंटवारा: दो हिस्सों में क्यों बंटी कंपनी?
टाटा मोटर्स के 80 साल के इतिहास में सबसे बड़ा फैसला हाल ही में लागू हुआ है. अक्टूबर-नवंबर 2025 में टाटा मोटर्स का आधिकारिक रूप से डिमर्जर (Demerger) पूरा हो गया. अब टाटा मोटर्स एक नहीं, बल्कि शेयर बाजार में दो अलग-अलग कंपनियां बन चुकी है:
- Tata Motors Limited (TMCV): यह कंपनी सिर्फ कमर्शियल गाड़ियां (ट्रक, बस, पिकअप) बनाएगी.
- Tata Motors Passenger Vehicles Limited (TMPV): यह कंपनी सिर्फ कारें, ईवी और जगुआर लैंड रोवर (JLR) का बिजनेस देखेगी.
ऐसा क्यों किया गया? ट्रक बिजनेस वित्तीय स्थिति और इंफ्रास्ट्रक्चर पर निर्भर करता है, जबकि कार बिजनेस लोगों की लाइफस्टाइल और पसंद पर. दोनों को अलग करने से अब मैनेजमेंट अपने-अपने सेक्टर पर बेहतर फोकस कर पाएगा.
एक नजर में: टाटा मोटर्स के ऐतिहासिक माइलस्टोन (Timeline)
1945: जमशेदपुर में जेआरडी टाटा द्वारा TELCO की स्थापना.
1954: मर्सिडीज बेंज (Daimler) के सहयोग से हिंदुस्तान का पहला कमर्शियल ट्रक (TMB 312) लॉन्च.
1991: हिंदुस्तान की पहली स्वदेशी SUV ‘टाटा सिएरा’ (Sierra) की एंट्री.
1998: ‘टाटा इंडीका’ (Indica) लॉन्च, जो पूर्ण रूप से हिंदुस्तानीय पैसेंजर कार थी.
2008: ‘टाटा नैनो’ का पेश हुई और जगुआर-लैंड रोवर (JLR) का ऐतिहासिक अधिग्रहण.
2018: ‘नेक्सन’ (Nexon) ने हिंदुस्तान की पहली 5-स्टार G-NCAP सेफ्टी रेटिंग हासिल की और सुरक्षा की नई बहस छेड़ी.
2020+: नेक्सन ईवी (Nexon EV) के साथ हिंदुस्तान में इलेक्ट्रिक क्रांति का आगाज.
2025: कमर्शियल (CV) और पैसेंजर व्हीकल (PV) बिजनेस का ऐतिहासिक डिमर्जर (बंटवारा) लागू.
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