Bihar Elections 2025: बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तैयारियों के बीच नेतृत्वक दलों की सक्रियता तेज हो गई है. इस बीच ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने तीसरा मोर्चा (थर्ड फ्रंट) बनाने की पहल शुरू की थी, लेकिन इस प्रयास को बहुजन समाज पार्टी (BSP) सुप्रीमो मायावती ने बड़ा झटका दिया है. सोमवार को मायावती ने साफ किया है कि उनकी पार्टी बिहार में अकेले सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और किसी से गठबंधन नहीं करेगी.
2020 का अनुभव, 2025 में बदल गया समीकरण
2020 के विधानसभा चुनाव में मायावती की बीएसपी ने ओवैसी की एआईएमआईएम और अन्य छोटे दलों के साथ मिलकर “ग्रैंड डेमोक्रेटिक सेक्युलर फ्रंट” (GDSF) के बैनर तले चुनाव लड़ा था. इस फ्रंट में उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी (अब राष्ट्रीय लोक मोर्चा), वेंद्र प्रसाद यादव की एसजेडीडी, ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा और संजय चौहान की जनवादी पार्टी शामिल थीं. हालांकि नतीजे निराशाजनक रहे. ओवैसी की पार्टी को जहां 5 सीटें मिलीं, वहीं बीएसपी महज एक सीट पर सिमट गई. अन्य दल खाता तक नहीं खोल पाए.
चुनाव के बाद भी ओवैसी को लगा था झटका
चुनाव बाद समीकरण और कमजोर हो गए. ओवैसी की पार्टी के 5 में से 4 विधायक राजद में शामिल हो गए, जबकि बीएसपी के एकमात्र विधायक जमा खान ने जदयू का दामन थाम लिया. आज की स्थिति में एआईएमआईएम के पास सिर्फ एक विधायक अख्तरूल ईमान बचे हैं, जो पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं.
ओवैसी की कोशिशें और आरजेडी का रुख
2025 चुनाव से पहले ओवैसी ने महागठबंधन (INDIA गठबंधन) में शामिल होने की भरपूर कोशिश की. उन्होंने राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव को चिट्ठी लिखी और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरूल ईमान ने गठबंधन में शामिल होने की पेशकश की, लेकिन कोई सकारात्मक जवाब नहीं मिला. राजद की ओर से साफ संदेश दिया गया कि यदि ओवैसी एनडीए को हराने में सहयोग करना चाहते हैं, तो चुनाव ही न लड़ें. पार्टी के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने कहा, “कभी-कभी चुनाव न लड़कर भी बड़ा योगदान दिया जा सकता है. ओवैसी का जनाधार हैदराबाद में है. बिहार में चुनाव न लड़ना महागठबंधन की मदद होगी.”
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तीसरे मोर्चे की कवायद, लेकिन बिना बीएसपी के
महागठबंधन से दूरी मिलने के बाद ओवैसी ने फिर से तीसरे मोर्चे की रणनीति शुरू की है. हाल ही में उनकी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरूल ईमान ने इंडियन इंकलाब पार्टी के अध्यक्ष आईपी गुप्ता से लंबी मुलाकात की. इससे संकेत मिला कि ओवैसी छोटे दलों को एक साथ लाकर तीसरे मोर्चे को फिर से खड़ा करना चाहते हैं. लेकिन मायावती के साफ इनकार के बाद यह प्रयास शुरू होने से पहले ही कमजोर होता नजर आ रहा है.
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