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कपड़े बुनने से लेकर दुनिया की सबसे बड़ी कार निर्माता तक, जानिए Toyota ने कैसे बुना अनोखा इतिहास

सोचिए, एक ऐसी कंपनी जो आज हर साल करोड़ों वाहनों के कारोबार और दुनिया के सबसे बड़े ऑटो बाजारों में अपनी मौजूदगी के लिए जानी जाती है, उसकी शुरुआत कार से हुई ही नहीं थी. यह कहानी है Toyota की, जिसकी जड़ें जापान की एक कपड़ा मिल और वहां चलने वाली टेक्सटाइल मशीनों से जुड़ी हैं. यही बात इस कार कंपनी को बाकियों से अलग बनाती है. आज Toyota दुनिया की सबसे ज्यादा वाहन बेचने वाली ऑटो कंपनियों में है. 2025 में Toyota Group ने करीब 1.13 करोड़ वाहन बेचे और लगातार छठे साल दुनिया की सबसे ज्यादा बिकने वाली ऑटो कंपनी रही. लेकिन, यहां तक पहुंचने का यह सफर इतना आसान नहीं था. करघे से कार तक कैसे पहुंची Toyota? Toyota की जड़ें उद्योगपति और टोयोटा इंडस्ट्रीज के संस्थापक Sakichi Toyoda के ऑटोमैटिक लूम बिजनेस से जुड़ी हैं. उनके बेटे Kiichiro Toyoda ने 1920 और 1930 के दशक में अमेरिका और यूरोप की ऑटो इंडस्ट्री का अध्ययन किया और एक बड़ा फैसला लिया. 1933: अपनी कपड़े बनाने वाली कंपनी  ‘Toyoda Automatic Loom Works’ के अंदर ऑटोमोबाइल डिपार्टमेंट शुरू किया गया. 1936: कंपनी ने पहले G1 Truck और फिर अपनी पहली प्रोडक्शन पैसेंजर कार Toyoda Model AA पेश की. 28 अगस्त 1937: Toyota Motor Co. की स्थापना हुई. नाम क्यों बदला? एक दिलचस्प बदलाव इसी दौर में हुआ. कंपनी का नाम ‘Toyoda’ से बदलकर ‘Toyota’ कर दिया गया. दरअसल, जापानी भाषा में Toyota को लिखने के लिए आठ स्ट्रोक (8-strokes) लगते हैं, जिसे जापानी संस्कृति में शुभ और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है. यानी नाम बदला और कंपनी की किस्मत भी बदलने लगी. असली गेमचेंजर था ‘टोयोटा प्रोडक्शन सिस्टम’ Toyota की सबसे बड़ी सफलता किसी एक कार से नहीं, बल्कि उसकी फैक्ट्री के अंदर बनी रणनीति से आई. यहीं Toyota Production System (TPS) विकसित हुआ. इसकी मुख्य नींव इन चीजों ने रखीं. Just-in-Time (JIT): जितनी जरूरत है, उतना ही उत्पादन और बिल्कुल सही समय पर. Jidoka: अगर कोई गड़बड़ी दिखे तो उत्पादन वहीं रोककर समस्या को तुरंत ठीक करना. Kaizen: लगातार छोटे-छोटे सुधार करते रहना. इस सिस्टम का मकसद था- बेकार खर्च, अतिरिक्त स्टॉक, समय की बर्बादी और खराब उत्पाद को खत्म करना. इसी ‘लीन मैन्युफैक्चरिंग’ मॉडल के दम पर Toyota ने अमेरिकी प्रतिद्वंद्वियों को पछाड़ा और कम लागत में बेहतर क्वालिटी देना शुरू किया. शुरुआती संकट और Land Cruiser की एंट्री 1950 के दशक की शुरुआत Toyota के लिए बहुत मुश्किल थी. बिक्री और मुनाफे पर भारी दबाव था, कंपनी में बड़ा श्रमिक विवाद हुआ और 1950 में Kiichiro Toyoda को इस्तीफा तक देना पड़ा. लेकिन, संकट से उबरते हुए कंपनी ने बाउंस बैक किया और फिर आया लैंड क्रूजर. 1951 में यह Toyota BJ के रूप में शुरू हुआ. इसकी खासियत थी- Reliability, Durability और Off-road capability. 2023 तक Land Cruiser परिवार की कुल बिक्री करीब 1.13 करोड़ यूनिट तक पहुंच चुकी थी. यह सिर्फ एक SUV नहीं, बल्कि Toyota को ग्लोबल ब्रांड बनाने वाली कार साबित हुई. Corolla ने Toyota को आम लोगों के घर तक पहुंचाया 1966 में लॉन्च हुई Corolla ने Toyota को बड़े पैमाने पर आम कार खरीदारों तक पहुंचाया. इसके बाद कंपनी ने किसी एक सेगमेंट पर निर्भर रहने के बजाय हर जरूरत के लिए अलग उत्पाद तैयार किए: मॉडल (Model) सेगमेंट (Segment) Corolla फैमिली कार Land Cruiser कठिन रास्तों की SUV Camry प्रीमियम फैमिली सेडान RAV4 SUV और लाइफस्टाइल सेगमेंट Hilux पिकअप Lexus लग्जरी कार अमेरिका से मुकाबला और ग्लोबल विस्तार 1980 के दशक तक आते-आते Toyota सिर्फ जापान की कंपनी नहीं रह गई थी. 1984: General Motors के साथ अमेरिका में NUMMI ज्वाइंट वेंचर के जरिए उत्पादन शुरू. 1988: Kentucky में Toyota का पहला पूरी तरह अपना अमेरिकी प्लांट शुरू हुआ. कंपनी ने एक अचूक रणनीति अपनाई- “जहां कार बिकती है, वहीं कार बनाओ.” इससे आयात लागत और करेंसी रिस्क कम हुए. आज Toyota का उत्पादन नेटवर्क जापान के अलावा उत्तरी अमेरिका, लैटिन अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका और एशिया में फैला है. Toyota ने Hybrid पर इतना बड़ा दांव क्यों लगाया? 1990 के दशक में ही Toyota समझ गई थी कि पेट्रोल-डीजल वाली कारों का भविष्य हमेशा सुरक्षित नहीं रहेगा. 1997: Toyota ने Prius लॉन्च की. यह दुनिया की पहली बड़े पैमाने पर उत्पादित हाइब्रिड पैसेंजर कार थी. Prius ने Toyota को पर्यावरण-अनुकूल कारों के बाजार में ऐसी बढ़त दी कि दूसरी कंपनियों को सालों लग गए. यहीं से Toyota की रणनीति Tesla से अलग हो गई. Tesla ने सिर्फ बैटरी ईवी पर फोकस किया, जबकि Toyota ने मल्टी-पॉथवे स्ट्रैटेजी अपनाई- हाइब्रिड, प्लग-इन हाइब्रिड, बैटरी ईवी और हाइड्रोजन फ्यूल सेल, सभी के रास्ते खुले रखे. EV की दौड़ में सवाल और वापसी की तैयारी जब Tesla और BYD जैसी कंपनियां बैटरी ईवी (BEV) पर तेजी से आगे बढ़ीं, तो Toyota की रणनीति पर सवाल उठे. Toyota का तर्क: हर देश में चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, बिजली का स्रोत और ग्राहकों की आय अलग है. इसलिए सिर्फ BEV हर बाजार का समाधान नहीं हो सकता. भविष्य का प्लान: Toyota अब BEV को नजरअंदाज नहीं कर रही है. कंपनी का लक्ष्य 2026 से अगली पीढ़ी की BEV तकनीक को आगे बढ़ाना और 2027-28 तक ऑल-सॉलिड-स्टेट बैटरी (Solid-State Battery) लाने का है. Toyota के लिए सबसे बुरा दौर कौन-सा था? कंपनी ने कई गहरे संकट भी झेले: 2008-09 की मंदी: स्थापना के बाद पहली बार कंपनी को करीब 461 अरब येन का भारी ऑपरेटिंग लॉस हुआ. 2009-10: बड़े पैमाने पर गाड़ियों का रिकॉल विवाद. 2011: जापान का विनाशकारी भूकंप-सुनामी संकट, जिससे सप्लाई चेन टूट गई. हालिया विवाद: Daihatsu और Toyota Industries की सर्टिफिकेशन अनियमितताएं. इन घटनाओं ने साबित किया कि बेहतरीन सिस्टम के बावजूद कॉर्पोरेट गवर्नेंस में गलतियां हो सकती हैं. आज Toyota कितनी बड़ी कंपनी है? 31 मार्च 2026 और FY2026 के आंकड़ों के अनुसार: कर्मचारी: 3.90 लाख से ज्यादा रेवेन्यू (Revenue): करीब 50.68 ट्रिलियन येन ऑपरेटिंग इनकम: करीब 3.77 ट्रिलियन येन मार्केट कैप: करीब 34.2 ट्रिलियन येन (लगभग ₹20 लाख करोड़ से अधिक) हिंदुस्तान में Toyota की कहानी: भरोसे का दूसरा नाम हिंदुस्तान में Toyota ने 1997 में Toyota Kirloskar Motor (TKM) के जरिए कदम रखा. कर्नाटक के बिदाड़ी (Bidadi) में दिसंबर 1999 में उत्पादन शुरू हुआ. हिंदुस्तान में Toyota की सफलता का

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मस्क ने पूछा- क्या अंबानी हैं भारत के असली बॉस? राहुल गांधी के जवाब पर एलन ने कहा थैंक्यू

हिंदुस्तान में स्टारलिंक की सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस की लॉन्चिंग और लाइसेंस को लेकर चल रही बहस के बीच Elon Musk के एक बयान ने नई चर्चा छेड़ दी है. मस्क ने हिंदुस्तान में स्टारलिंक को लाइसेंस मिलने में देरी पर सवाल उठाया और उद्योगपति मुकेश अंबानी को लेकर एक सवाल सोशल मीडिया पर पोस्ट किया. मस्क के बयान पर कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने तंज कसते हुए अपनी प्रतिक्रिया दी. स्टारलिंक के लाइसेंस पर एलन मस्क ने क्या कहा? विवाद की शुरुआत एक सोशल मीडिया पोस्ट से हुई. एक यूजर ने हिंदुस्तान प्रशासन पर आरोप लगाते हुए कहा कि प्रशासन आम नागरिकों के हितों के बजाय कुछ चुनिंदा बड़े कारोबारियों के हितों को ज्यादा महत्व देती है. इस पोस्ट को शेयर करते हुए मस्क ने स्टारलिंक के लाइसेंस का मुद्दा उठाया. उन्होंने कहा कि Starlink को दुनिया के 165 से ज्यादा देशों में लाइसेंस मिल चुका है और कंपनी पिछले पांच वर्षों से हिंदुस्तान प्रशासन के नियमों और कानूनों का पालन करने की कोशिश कर रही है. मस्क ने सवाल किया कि इसके बावजूद हिंदुस्तान में Starlink को अभी तक लाइसेंस क्यों नहीं मिला है.क्या अंबानी हिंदुस्तान के असली बॉस हैं? राहुल गांधी ने क्या प्रतिक्रिया दी मस्क के इस सवाल पर राहुल गांधी ने प्रतिक्रिया दी. उन्होंने तंज करते हुए कहा, हिंदुस्तान में आपका स्वागत है, एलन. तब तक इंतजार करें जब तक आप दूसरे व्यक्ति को नहीं खोज लेते.” इसके बाद मस्क ने राहुल गांधी के पोस्ट का जवाब देते हुए लिखा,“धन्यवाद राहुल, यह वाकई परेशान करने वाला है.” राहुल गांधी की यह टिप्पणी हिंदुस्तान में कारोबार और प्रशासन के रिश्तों को लेकर कांग्रेस की पुरानी आलोचना से जुड़ी हुई मानी जा रही है. प्रशासन पर चुनिंदा कारोबारियों को फायदा देने का आरोप हिंदुस्तान में विपक्षी दल, खासकर कांग्रेस लंबे समय से केंद्र प्रशासन पर देश के कुछ बड़े उद्योगपतियों को फायदा पहुंचाने के आरोप लगाते रहे हैं. हालांकि, इन आरोपों को प्रशासन खारिज करती रही है. प्रशासन का कहना है कि हिंदुस्तान में कारोबार करने वाली कंपनियों के लिए नियम और कानून तय हैं और सभी कंपनियों को उन्हीं नियमों का पालन करना होता है. ये भी पढ़ें: इंडिया ब्लॉक के सांसदों का राजघाट पर मौन विरोध प्रदर्शन, तस्वीरों में देखिए क्या-क्या हुआ Starlink के लिए क्यों महत्वपूर्ण है हिंदुस्तान? हिंदुस्तान दुनिया के सबसे बड़े टेलीकॉम बाजारों में से एक है. देश के कई ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में तेज इंटरनेट की पहुंच अभी भी एक चुनौती है. Starlink जैसी सैटेलाइट इंटरनेट सर्विस का दावा है कि वह उन इलाकों में भी इंटरनेट कनेक्टिविटी उपलब्ध करा सकती है, जहां पारंपरिक फाइबर या मोबाइल नेटवर्क पहुंचाना मुश्किल है. The post मस्क ने पूछा- क्या अंबानी हैं हिंदुस्तान के असली बॉस? राहुल गांधी के जवाब पर एलन ने कहा थैंक्यू appeared first on Naya Vichar.

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अमेरिका में H-1B और Green Card नियमों पर सख्ती, Microsoft-Infosys-Tata-Wipro समेत 7 बड़ी IT कंपनियां प्रभावित

H-1B Green Card : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने विदेशी कर्मचारियों से जुड़े इमिग्रेशन प्रोग्राम पर बड़ी कार्रवाई की है. अमेरिका ने Microsoft, Adobe समेत कई बड़ी IT और आउटसोर्सिंग कंपनियों को Permanent Labour Certification Programme (PERM) से निलंबित कर दिया है. PERM प्रक्रिया अमेरिका में रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड हासिल करने की दिशा में एक अहम कदम है. इस सूची में हिंदुस्तानीय IT सेक्टर की बड़ी कंपनियां भी शामिल हैं. इनमें Infosys, Tata, Wipro, HCL, Cognizant और Capgemini के नाम हैं. अमेरिकी अधिकारियों ने कंपनियों पर वीजा कार्यक्रम के कथित दुरुपयोग और अमेरिकी कर्मचारियों की नौकरियों को प्रभावित करने के आरोप लगाए हैं. जेडी वेंस ने Microsoft पर लगाए आरोप अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने माइक्रोसॉफ्ट के लिए PERM प्रोग्राम को सस्पेंड किए जाने की जानकारी देते हुए कहा कि यह फैसला चल रही जांच के कारण लिया गया है. उन्होंने कहा कि अब माइक्रोसॉफ्ट H-1B वीजा धारकों के लिए अमेरिका में स्थायी निवासी का दर्जा हासिल करने के लिए PERM प्रक्रिया के जरिए आवेदन नहीं कर पाएगी. जेडी वेंस ने माइक्रोसॉफ्ट और दूसरी विदेशी एवं अमेरिकी कंपनियों को संदेश देते हुए कहा कि अमेरिका चाहता है कि कंपनियां देश में निवेश करें और आगे बढ़ें. उन्होंने कहा कि अमेरिकी प्रशासन टेक्नोलॉजी सेक्टर को बढ़ावा देना चाहता है और कंपनियों के विकास का समर्थन करेगा. हालांकि, उन्होंने जोर देकर कहा कि कंपनियों को अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी देनी होगी. Vance ने कहा, “हम चाहते हैं कि आप आगे बढ़ें और बहुत से लोगों को नौकरी दें, लेकिन हम चाहते हैं कि आप अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी दें.” उन्होंने माइक्रोसॉफ्ट से कहा कि वह अमेरिकी कंपनी है और उसे बेहतरीन अमेरिकी कर्मचारियों को नौकरी पर रखना चाहिए. Vance ने आरोप लगाया कि कंपनियां अमेरिकी कर्मचारियों को हटाकर उनकी जगह विदेशी कर्मचारियों को नहीं रख सकतीं. क्या है PERM प्रोग्राम? PERM यानी Permanent Labour Certification अमेरिका में रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है. इसके तहत नियोक्ता को यह प्रमाणित करना होता है कि संबंधित नौकरी के लिए कोई योग्य, इच्छुक और उपलब्ध अमेरिकी कर्मचारी नहीं है. PERM प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही कई रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड मामलों में आगे की प्रक्रिया शुरू होती है. इसलिए इस पर रोक का सीधा असर उन विदेशी कर्मचारियों पर पड़ सकता है जो H-1B वीजा के जरिए अमेरिका में काम कर रहे हैं और स्थायी निवास की ओर बढ़ना चाहते हैं. H-1B वीजा पर सीधी रोक नहीं अमेरिकी प्रशासन के इस फैसले को H-1B वीजा के सीधे निलंबन के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. कार्रवाई PERM कार्यक्रम में कंपनियों की भागीदारी पर है. हालांकि, H-1B वीजा पर काम कर रहे विदेशी कर्मचारियों के लिए इसका असर महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि PERM रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड हासिल करने की प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाता है. हिंदुस्तानीय IT कर्मचारियों पर क्यों पड़ेगा असर? Infosys, TCS, Wipro, HCL और Cognizant जैसी हिंदुस्तानीय IT कंपनियां अमेरिकी बाजार में बड़ी मौजूदगी रखती हैं. इन कंपनियों को PERM कार्यक्रम से निलंबित किए जाने से उन विदेशी कर्मचारियों की स्थायी निवास प्रक्रिया प्रभावित हो सकती है, जिनके मामले इन कंपनियों के जरिए आगे बढ़ाए जा रहे हैं. अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि उसका लक्ष्य अमेरिकी कर्मचारियों के लिए रोजगार के अवसरों को प्राथमिकता देना और वीजा कार्यक्रमों के कथित दुरुपयोग पर कार्रवाई करना है. कई विश्वविद्यालय भी जांच के दायरे में अमेरिकी प्रशासन ने कुछ विश्वविद्यालयों के खिलाफ भी जांच की घोषणा की है. इनमें Harvard, Yale और Stanford जैसे संस्थानों के नाम शामिल हैं. अधिकारियों ने आरोप लगाया है कि कुछ विश्वविद्यालय विदेशी छात्रों से जुड़े कार्यक्रमों का इस्तेमाल अमेरिकी मजदूरी और रोजगार को प्रभावित करने के लिए कर सकते हैं. अमेरिकी श्रम विभाग के इंस्पेक्टर जनरल कार्यालय ने कहा है कि इस मामले में जांच और समन की कार्रवाई की जा रही है. अमेरिकी प्रशासन की यह कार्रवाई विदेशी कर्मचारियों और इमिग्रेशन कार्यक्रमों पर उसकी व्यापक सख्ती का हिस्सा मानी जा रही है. इससे खास तौर पर उन हिंदुस्तानीय IT पेशेवरों पर असर पड़ सकता है, जो H-1B के बाद अमेरिका में स्थायी निवास हासिल करने की प्रक्रिया में हैं. ये भी पढ़ें: ईरान युद्ध में अमेरिका को 3.3 अरब डॉलर का नुकसान, 24 MQ-9 ड्रोन समेत 81 विमान तबाह The post अमेरिका में H-1B और Green Card नियमों पर सख्ती, Microsoft-Infosys-Tata-Wipro समेत 7 बड़ी IT कंपनियां प्रभावित appeared first on Naya Vichar.

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Photos: किस लड़की की फोटो वाली टी-शर्ट पहनकर रांची में घूम रहे हैं श्रेयस अय्यर?

हिंदुस्तान-वेस्टइंडीज दूसरे टी20 से पहले श्रेयस अय्यर टीम इंडिया के खिलाड़ियों के साथ मॉल ऑफ रांची पहुंचे. इस दौरान लड़की की तस्वीर वाली टी-शर्ट ने सबका ध्यान खींचा. The post Photos: किस लड़की की फोटो वाली टी-शर्ट पहनकर रांची में घूम रहे हैं श्रेयस अय्यर? appeared first on Naya Vichar.

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GST Council: अब 10 हजार से कम टैक्स पर नहीं आएगा नोटिस, नहीं होगी गिरफ्तारी; 1 अप्रैल 2027 से लागू होंगे नए नियम

GST Council: 57वीं GST काउंसिल की बैठक में टैक्सपेयर्स को राहत देने वाले कई अहम फैसलों पर सहमति बनी है. केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बैठक के बाद कहा कि GST के तहत 10 हजार रुपये से कम टैक्स राशि के लिए डिमांड नोटिस नहीं भेजा जाएगा. इसके अलावा GST में गिरफ्तारी हटाने और अभियोजन की सीमा बढ़ाने की सिफारिश की गई है. हालांकि, इन बदलावों को लागू करने की प्रक्रिया 1 अप्रैल 2027 से शुरू होगी. साल में सिर्फ एक बार बदली जाएंगी GST की दरें वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि अब GST की दरों में बदलाव साल में केवल एक बार करने का प्रयास किया जाएगा. उन्होंने कहा कि दरों में बदलाव का फैसला 1 अप्रैल से लागू होने के लिए ही लाया जाएगा. इससे कारोबारियों और टैक्सपेयर्स को टैक्स व्यवस्था में अधिक स्थिरता मिलने की उम्मीद है. 10 हजार से कम टैक्स पर नहीं भेजा जाएगा डिमांड नोटिस 57वीं GST काउंसिल की बैठक के बाद वित्त मंत्री ने कहा कि 10 हजार रुपये से कम टैक्स राशि के लिए कोई GST डिमांड नोटिस नहीं भेजा जाएगा. प्रशासन के इस कदम का उद्देश्य छोटे मामलों में टैक्स प्रशासन की प्रक्रिया को आसान बनाना और टैक्सपेयर्स पर अनावश्यक अनुपालन का बोझ कम करना है. GST में गिरफ्तारी की शक्ति हटाने की सिफारिश काउंसिल ने GST के तहत गिरफ्तारी को हटाने की सिफारिश की है. इसके साथ ही अभियोजन के लिए टैक्स की सीमा 1 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 5 करोड़ रुपये करने की सिफारिश की गई है. यानी 5 करोड़ रुपये से कम के मामलों में अभियोजन नहीं चलाने का प्रस्ताव है. 25 हजार की सामान्य पेनल्टी घटकर 10 हजार रुपये होगी GST व्यवस्था में सामान्य पेनल्टी को भी कम करने की सिफारिश की गई है. वित्त मंत्री के मुताबिक, सामान्य पेनल्टी की मौजूदा 25 हजार रुपये की सीमा को घटाकर 10 हजार रुपये करने का प्रस्ताव है. प्रशासन का मानना है कि इससे छोटे अनुपालन संबंधी मामलों में कारोबारियों को राहत मिलेगी. ITC को लेकर फंसा पेच, अधिकारियों की कमेटी करेगी समीक्षा बैठक में CGST Act की धारा 16(2)(c) में संशोधन पर भी चर्चा हुई. मौजूदा व्यवस्था में यदि सप्लाई चेन में किसी स्तर पर सप्लायर ने टैक्स जमा नहीं किया या फर्जी ITC का मामला सामने आया, तो अंतिम और वास्तविक टैक्सपेयर का इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) भी प्रभावित हो सकता है. ईमानदार टैक्सपेयर्स को मिलेगी राहत देने की कोशिश वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि कई मामलों में टैक्सपेयर के पास वैध इनवॉयस होती है, उसे माल या सेवा की सप्लाई मिल चुकी होती है और वह सप्लायर को टैक्स का भुगतान भी कर चुका होता है. इसके बावजूद सप्लाई चेन में किसी दूसरे स्तर पर गड़बड़ी मिलने पर उसका ITC रोक दिया जाता है. काउंसिल ने इस समस्या को तर्कसंगत बनाने पर चर्चा की. पूरी सप्लाई चेन की जगह सप्लायर तक सीमित करने का प्रस्ताव वित्त मंत्री ने निर्मला सीतारमण बताया कि प्रशासन की ओर से प्रस्ताव था कि अंतिम टैक्सपेयर के ठीक पहले वाले सप्लायर तक ही अनुपालन की जिम्मेदारी सीमित की जाए और पूरी सप्लाई चेन की गड़बड़ी का असर अंतिम खरीदार पर न पड़े. लेकिन कुछ राज्यों ने इस मुद्दे पर और विचार की मांग की. इसके बाद अधिकारियों की कमेटी बनाने का फैसला लिया गया. 3 महीने में रिपोर्ट देगी अधिकारियों की कमेटी अधिकारियों की समिति को तीन महीने के भीतर रिपोर्ट देने को कहा गया है. रिपोर्ट आने के बाद GST काउंसिल की बैठक बुलाकर इस पर अंतिम फैसला लिया जाएगा. वित्त मंत्री ने साफ किया कि इस मुद्दे पर अभी अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है. GST प्रशासन में लागू होगा ‘फेसलेस’ सिस्टम वित्त मंत्री ने निर्मला सीतारमण GST प्रशासन में फेसलेस व्यवस्था लागू करने की दिशा में बड़ा ऐलान किया. उन्होंने कहा कि आयकर विभाग में लागू फेसलेस सिस्टम को टैक्सपेयर्स से सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है. इसी अनुभव के आधार पर अब CGST प्रशासन में भी इस सुधार को आगे बढ़ाने की योजना है. फेसलेस सिस्टम से टैक्स प्रशासन में पारदर्शिता बढ़ने की उम्मीद फेसलेस व्यवस्था के तहत टैक्सपेयर्स और अधिकारियों के बीच प्रत्यक्ष संपर्क को कम करने का प्रयास किया जाता है. प्रशासन का मानना है कि इससे प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ सकती है और टैक्स प्रशासन को अधिक तकनीक आधारित बनाया जा सकता है. वित्त मंत्री ने स्पष्ट किया कि यह मुद्दा आज की GST काउंसिल की बैठक के एजेंडे में शामिल नहीं था, बल्कि केंद्र प्रशासन की पहल के तौर पर इसकी घोषणा की गयी है. 1 अप्रैल 2027 से लागू होंगे प्रक्रिया सुधार निर्मला सीतारमण ने कहा कि बैठक के एजेंडे में शामिल लगभग सभी मुद्दों पर सहमति बनी है. दो मुद्दों पर आगे समीक्षा के लिए अधिकारियों की कमेटी बनाई गयी है. उन्होंने कहा कि प्रक्रिया से जुड़े सभी सुधारों को 1 अप्रैल 2027 से लागू करने का लक्ष्य रखा गया है. GST दरों में इस बैठक में कोई बदलाव नहीं वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने यह भी स्पष्ट किया कि 57वीं GST काउंसिल की बैठक में GST की दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है. दरों से जुड़े फैसलों को साल में एक बार लेने की व्यवस्था पर जोर दिया गया है. वहीं, अधिकारियों की कमेटी से जुड़े दोनों मामलों पर रिपोर्ट आने के बाद अंतिम फैसला किया जाएगा. ये भी पढ़ें: PM Kisan 24वीं किस्त को लेकर आया अपडेट, ₹2000 पाने से पहले किसान जरूर कर लें ये काम The post GST Council: अब 10 हजार से कम टैक्स पर नहीं आएगा नोटिस, नहीं होगी गिरफ्तारी; 1 अप्रैल 2027 से लागू होंगे नए नियम appeared first on Naya Vichar.

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मां रूपी सोरेन की अंतिम विदाई, नेमरा में फूट-फूटकर रोए CM हेमंत सोरेन, देखें तस्वीरें

नेमरा से सुनील चौधरी, नवीन शर्मा, अरविंद सिंह, राज कौशिक, कुणाल कुमार की रिपोर्ट रांची/नेमरा: मां की गोद से बड़ा इस दुनिया में शायद ही कोई सहारा होता है. मां का जाना उस खालीपन को छोड़ जाता है, जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल होता है। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने गुरुवार को अपनी मां रूपी सोरेन को नम आंखों से अंतिम विदाई दी. नेमरा में अंतिम संस्कार के दौरान मुख्यमंत्री कई बार अपनी आंखों से आंसू पोंछते नजर आए. मां को खोने का दर्द उनके चेहरे पर साफ दिखाई दे रहा था. रांची से रूपी सोरेन का पार्थिव शरीर पैतृक गांव नेमरा पहुंचा. पैतृक आवास के आंगन में परिवार और समाज की परंपरा व संस्कृति के अनुसार अंतिम रस्में पूरी की गयीं. इसके बाद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन समेत परिवार के सदस्यों ने पार्थिव शरीर को कंधा दिया और श्मशान घाट की ओर रवाना हुए. मां के अंतिम संस्कार के समय CM हेमंत सोरेन जहां गुरुजी हुए थे पंचतत्व में विलीन, वहीं मां को दी अंतिम विदाई रूपी सोरेन का अंतिम संस्कार उसी स्थान पर किया गया, जहां करीब एक साल पहले उनके पति और झारखंड आंदोलन के महानायक शिबू सोरेन यानी गुरुजी का अंतिम संस्कार हुआ था. उसी घाट पर आज परिवार ने रूपी सोरेन को भी अंतिम विदाई दी. इस दौरान हेमंत सोरेन, उनके दोनों बेटे समेत परिवार के अन्य सदस्यों ने पार्थिव शरीर को कंधा दिया. अंतिम विदाई के वक्त पूरा परिवार भावुक था. नेमरा में मौजूद लोगों की आंखें भी नम थीं. ये भी पढ़ें… The post मां रूपी सोरेन की अंतिम विदाई, नेमरा में फूट-फूटकर रोए CM हेमंत सोरेन, देखें तस्वीरें appeared first on Naya Vichar.

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जब थिएटर की स्टेज पर हाथ में झाड़ू लहराते बोले थे नाना, ‘मेरे जैसी भद्दी शक्ल वाले भी एक दिन हीरो बनेंगे, सदाशिव बोल उठे थे शाबाश…’

“‘स्टेज पर उस वक्त कोई बड़ा कलाकार नहीं था. कुछ लोग काम कर रहे थे. शाम को नाटक होना था. स्टेज की तैयारी चल रही थी. तभी नाना ने झाड़ू उठा ली. झाड़ू को उन्होंने ऐसे पकड़ा जैसे तलवार हो. कमर के पास खींचकर, पूरे तेवर के साथ उसे हवा में लहराया और जोर से बोले-“क्या समझ रखे हो तुम लोग अपने आप को? मेरे जैसे भद्दी शक्ल वाले भी एक दिन हीरो बनकर आएंगे. मैं बताऊंगा.” सदाशिव भाई भी वहीं थे. उन्होंने तालियां बजाईं और कहा-शाबाश! शाबाश! जियो!” नाना पाटेकर को समझना हो, तो शायद उनकी फिल्मों से पहले उनके नाटकों तक जाना पड़ेगा. उस नाना तक, जो बड़े पर्दे का सितारा बनने से बहुत पहले स्टेज की धूल में अपना संसार तलाश रहा था. उस नाना तक, जिसे मैंने पहली बार पृथ्वी थिएटर में देखा था. मैं(तापस चक्रवर्ती) एक रंगकर्मी झारखंड से हूं. थिएटर मेरे लिए शौक नहीं, एक तरह की बेचैनी थी. रंगमंच की दुनिया में बड़े कलाकारों को देखने, उनसे मिलने और उनके आसपास कुछ वक्त बिताने की एक अलग ही लालसा होती थी. इसी लालसा ने मुझे झारखंड से मुंबई खींच लिया था. उस समय पृथ्वी थिएटर आज जैसा चमकता हुआ ठिकाना नहीं था. वहां पहुंचकर लगता था कि थिएटर किसी इमारत का नाम नहीं, बल्कि उन लोगों का नाम है जो उसके लिए अपना सब कुछ छोड़ सकते हैं. मैं विनोद कुमार और रंगायन की टीम के साथ आया था. पृथ्वी पर अपना नाटक किया था. शायद 1981-82 की बात होगी. नाटक के बाद मैं वापस चला गया, लेकिन पृथ्वी मेरे भीतर रह गया. 1982 में मैंने यहां नौकरी शुरू कर दी थी. मगर मन बार-बार मुंबई की उसी जगह पर लौटता था. छुट्टी मिलती, कोई बहाना मिलता और मैं पृथ्वी पहुंच जाता. वहां कोई मेरा इंतजार नहीं कर रहा था. न कोई बड़ा काम था, न कोई पहचान. बस नाटक देखने का जुनून था और उन लोगों के करीब बैठने की इच्छा, जिनसे मैं सीखना चाहता था. हंगल साहब जैसे लोग वहां थे. उनके अनुभव सुन लेना भी मेरे लिए किसी पुरस्कार से कम नहीं था. शफी इनामदार जैसे कलाकार थे. सदाशिव अमरापुरकर जैसे लोग थे. और उसी दुनिया में एक नाम धीरे-धीरे अपनी जगह बना रहा था- नाना पाटेकर. नाना उस वक्त आज वाले नाना नहीं थे. वह स्टार नहीं थे. मगर उनमें एक चीज तब भी पूरी ताकत से मौजूद थी- थिएटर का जुनून. मेरी उनसे पहली मुलाकात भी किसी फिल्मी दृश्य जैसी नहीं थी. कोई औपचारिक परिचय नहीं. कोई हाथ मिलाना नहीं. मैं वहां खाना खा रहा था. टेबल-कुर्सी का इंतजाम नहीं था. खड़े-खड़े खाना होता था. बाहर एक छोटी सी खाने की जगह थी. आठ रुपये में पूरा खाना मिल जाता था. पास ही हरे रामा हरे कृष्णा मंदिर था. हम पैदल चले जाते थे. वहीं किसी चाईबासा के लड़के के जरिए मेरी नाना से मुलाकात कराई गई. नाना ने खाते-खाते पहला सवाल पूछा- “क्या करता है?” मैंने कहा- “नौकरी.” उन्होंने तुरंत पूछा- “फिर काहे को आया मरने?” मैंने कहा- “आपको देखने.” बस. इतना सुनते ही उन्होंने मुझे अपने अंदाज में जवाब दिया- “इतना मारूंगा ना, बिहार जाकर रुकेगा.” उनकी बात में एक अजीब सा अपनापन था. वह आपको पहली मुलाकात में ही सहज कर देते थे. उनकी भाषा में कोई बनावट नहीं थी. मैंने उनसे कहा कि मैं इतनी दूर सिर्फ इसलिए आता हूं क्योंकि मुझे थिएटर का नशा है. उन्होंने कहा था- “मैं महान-वहान कुछ नहीं हूं.” यही नाना थे. बाद में मैंने उनसे कहा कि मैं भी स्टेज के लिए ऐसा ही पागल हूं. सैकड़ों किलोमीटर से सिर्फ नाटक देखने और आप जैसे कलाकारों से मिलने चला आता हूं. उन्होंने शायद ज्यादा कुछ नहीं कहा, लेकिन वह मुलाकात मेरे भीतर रह गई. आज पीछे मुड़कर देखता हूं तो लगता है कि उस दौर में पृथ्वी थिएटर एक तरह की यूनिवर्सिटी था. वहां कोई डिग्री नहीं मिलती थी, लेकिन जिंदगी भर के सबक मिल जाते थे. मैं कहता हूं- स्कूल नहीं, वह यूनिवर्सिटी थे. और नाना? नाना उस यूनिवर्सिटी के उन विद्यार्थियों में थे, जो पढ़ने के साथ-साथ पूरी इमारत की नींव भी मजबूत कर रहे थे. मैं खुद किसी नाटक का कलाकार नहीं होता था, फिर भी स्टेज पर मौजूद रहता था. रस्सी पकड़नी हो, लाइट लगानी हो, कोई ऊपर चढ़ा हो तो नीचे से सहारा देना हो, सामान हटाना हो, पर्दा खींचना हो- जो काम मिला, कर लिया. पृथ्वी में काम करने वाले हर आदमी से धीरे-धीरे पहचान होने लगी. उस वक्त पृथ्वी का टिकट भी आज की तरह महंगा नहीं था. तीस रुपये. हां, तीस रुपये. मेरे लिए वह तीस रुपये सिर्फ टिकट के पैसे नहीं थे. वह उस दुनिया में दाखिल होने की कीमत थे, जहां मैं अपने से बड़े कलाकारों को काम करते देख सकता था. जहां शाम को नाटक होना है, उससे पहले घंटों तैयारी चलती थी. कोई स्टार नहीं, कोई छोटा-बड़ा नहीं. जो काम सामने आया, वह कर दिया. और नाना भी उसी दुनिया के आदमी थे. रुकिएगा, यहां एक बात फिर से कहनी जरूरी है. सज्जाद को कौन भूल सकता है? नाना के शुरुआती थिएटर किरदारों में से एक सज्जाद था. आज जब नाना का नाम लेते ही फिल्मों के बड़े-बड़े किरदार आंखों के सामने घूम जाते हैं, तब कभी-कभी यह याद करना जरूरी है कि यह आदमी पहले स्टेज पर अपने किरदार के साथ जीता था. नाना को मैंने सिर्फ गुस्से में नहीं देखा. उनके भीतर गुस्सा था, लेकिन वह गुस्सा सिर्फ उनका स्वभाव नहीं था. उन्हें लगता था कि समाज में कुछ गलत हो रहा है तो उसे गलत कहना चाहिए. देश की मिट्टी में कोई गलत जगह गड्ढा खोद दे, तो वह तिलमिला उठते थे. आसपास कुछ गलत होता, तो भीतर से बेचैन हो जाते. शायद इसलिए दुनिया ने उन्हें गुस्सैल नाना के रूप में ज्यादा याद किया. लेकिन सच यह भी है कि उनके जैसा मजाकिया आदमी मिलना मुश्किल था. वह एकदम गंभीर चेहरा बनाकर एक शब्द बोलते और सामने वाला हंसते-हंसते लोटपोट हो जाता. मुझे उनकी एक तस्वीर आज भी याद है. स्टेज पर उस वक्त कोई बड़ा कलाकार नहीं था. कुछ लोग काम कर रहे थे. शाम को नाटक होना था. स्टेज

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‘कानूनन हम ज्ञानेश कुमार से इस्तीफा नहीं ले सकते, विवेक के आधार पर देना होगा त्यागपत्र’: सलमान खुर्शीद

8 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार से इस्तीफे की मांग को लेकर कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दल लगातार तीसरे दिन प्रदर्शन कर रहे हैं. लेकिन, ज्ञानेश कुमार इस्तीफा देंगे या नहीं, यह कौन तय करेगा? ज्ञानेश कुमार खुद यह तय करेंगे या देश का कानून? इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमने कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता और सुप्रीम कोर्ट के वकील सलमान खुर्शीद से बात की. जानिए, उन्होंने इन सवालों के जवाब में क्या कहा है… {“type”:”faq”,”question”:”क्या संविधान या कानून में CEC के इस्तीफे को लेकर कोई जिक्र है?”,”answer”:”नहीं, संविधान में CEC के इस्तीफे की प्रक्रिया को लेकर सीधे-सीधे कोई उल्लेख नहीं है, हालांकि, अनुच्छेद 324 में चुनाव आयोग, CEC की नियुक्ति, कार्यकाल और उन्हें हटाने का जिक्र जरूर किया गया है. CEC को हटाने के लिए कानूनी प्रक्रिया महाभियोग के जरिए अपनाई जाती है.nnमुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त स्वैच्छिक तौर पर अपने पद से इस्तीफा दे सकते हैं. 2020 में अशोक लवासा और 2024 में अरुण गोयल ने अलग-अलग वजहों से इस्तीफा दिया था. यह इसका उदाहरण है. कोई जबरदस्ती उनसे इस्तीफा नहीं ले सकता है.”}{“type”:”faq”,”question”:”अगर कानूनन कोई इस्तीफा नहीं ले सकता है तो यह प्रदर्शन क्यों?”,”answer”:”ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शन इसलिए हो रहा है, ताकि वह नैतिक तौर पर अपने पद से इस्तीफा दे दें. अगर देखा जाए तो विवेक के आधार पर ज्ञानेश कुमार को पहले ही इस पद से इस्तीफा दे देना चाहिए. वह लोकतंत्र के सबसे ताकतवर पदों में से एक पर बैठे हैं. अगर उनको लेकर ही लोगों के मन में संदेह होगा तो फिर पूरी व्यवस्था को लेकर सवाल खड़ा होने लगेगा.”}{“type”:”faq”,”question”:”क्या कोई ठोस सबूत ज्ञानेश कुमार के खिलाफ है, नहीं तो बिना सबूत इतना बड़ा प्रदर्शन क्यों?”,”answer”:”सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को लेकर कई याचिकाएं दर्ज हैं. सभी याचिकाओं में SIR प्रक्रिया और ज्ञानेश कुमार को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं. अब कोर्ट की यह जिम्मेदारी है कि वह इसकी जांच के लिए एक स्वतंत्र कमेटी नियुक्त करे. एक ऐसी कमेटी, जो लोगों और नेतृत्वक दलों के संदेह की जांच कर दूध का दूध और पानी का पानी कर दे.nnअगर जांच नहीं होती है और वह पद पर बने रहते हैं तो इससे लोकतंत्र को लेकर संदेह और गहरा जाएगा। इसलिए जितनी जल्दी इसकी ठोस जांच हो जाए, उतना अच्छा है.”}{“type”:”faq”,”question”:”अगर मुद्दा इतना ही महत्वपूर्ण है तो विपक्षी दल एकजुट क्यों नहीं हैं?”,”answer”:”सभी दल एकजुट हैं. आप जिस आम आदमी पार्टी की बात कर रहे हैं, वह भी हमारे मुद्दे पर साथ है. भले ही वह हमारे प्रदर्शन में किसी नेतृत्वक वजह से शामिल नहीं हो रहे हैं, लेकिन इस मुद्दे पर सभी दल एकजुट हैं.”}{“type”:”faq”,”question”:”मुख्य चुनाव आयुक्त को कैसे हटाया जा सकता है?”,”answer”:”संविधान के अनुच्छेद 324(5) में कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को केवल सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के समान तरीके से और समान आधारों पर पद से हटाया जा सकता है. nnयह प्रावधान 2023 अधिनियम की धारा 11(2) में भी पाया जा सकता है. अनुच्छेद में आगे कहा गया है कि किसी अन्य चुनाव आयुक्त या क्षेत्रीय आयुक्त को मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश के बिना पद से नहीं हटाया जाएगा.nnचुनाव आयोग को नेतृत्वक दबावों से बचाने के उद्देश्य से, मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का मानदंड जानबूझकर बहुत कठिन रखा गया है. nnसंविधान के अनुच्छेद 124(4) के अनुसार, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने की प्रक्रिया बताई गई है, किसी न्यायाधीश को केवल प्रमाणित दुर्व्यवहार या अक्षमता के आधार पर ही हटाया जा सकता है.nnदुर्व्यवहार में किसी भी प्रकार की भ्रष्ट गतिविधियां या पद का दुरुपयोग शामिल हो सकता है. वर्षों से, न्यायालयों ने इसकी व्याख्या इस प्रकार की है कि इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त के पद के लिए अनुपयुक्त कार्य या मुख्य चुनाव आयुक्त के जरिए अपने आधिकारिक कर्तव्यों का निर्वहन करने में विफलता भी शामिल है. अक्षमता से तात्पर्य ऐसी स्थिति से है, जहां अधिकारी अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने में असमर्थ हो.”} The post ‘कानूनन हम ज्ञानेश कुमार से इस्तीफा नहीं ले सकते, विवेक के आधार पर देना होगा त्यागपत्र’: सलमान खुर्शीद appeared first on Naya Vichar.

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क्या आप जानते हैं कि रूपी सोरेन भी लड़ी थीं लोकसभा चुनाव? बाबूलाल मरांडी से हुआ था मुकाबला

रांची: झारखंड की नेतृत्व में दिशोम गुरु शिबू सोरेन के परिवार का दुमका से गहरा और पुराना रिश्ता रहा है. शिबू सोरेन की धर्मपत्नी और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की माता रूपी सोरेन किस्कू ने अपने जीवन में केवल एक बार चुनाव लड़ा था. वर्ष 1999 में उन्हें झारखंड मुक्ति मोर्चा ने दुमका लोकसभा सीट से उम्मीदवार बनाया था. इस चुनाव में उनका मुकाबला भाजपा के वरिष्ठ नेता और उस समय केंद्र प्रशासन में मंत्री रहे बाबूलाल मरांडी से हुआ था. कांटे के मुकाबले में रूपी सोरेन महज 4648 मतों के अंतर से चुनाव हार गयी थीं. 1999 में शिबू सोरेन की परंपरागत सीट पर उतरीं वर्ष 1999 का दुमका लोकसभा चुनाव झामुमो के लिए काफी महत्वपूर्ण था. दुमका को लंबे समय से शिबू सोरेन की नेतृत्वक कर्मभूमि माना जाता रहा है. ऐसे में पार्टी ने उनकी पत्नी रूपी सोरेन को मैदान में उतारा. दूसरी ओर भाजपा ने उस समय के केंद्रीय मंत्री और पार्टी के प्रमुख नेताओं में शामिल बाबूलाल मरांडी को उम्मीदवार बनाया. चुनाव में दोनों के बीच बेहद करीबी मुकाबला देखने को मिला. सिर्फ 4648 वोट से मिली हार चुनाव परिणाम में भाजपा के बाबूलाल मरांडी को 2,01,141 वोट मिले, जबकि झामुमो की रूपी सोरेन किस्कू को 1,96,493 मत प्राप्त हुए. दोनों उम्मीदवारों के बीच केवल 4648 वोट का अंतर रहा. इस तरह रूपी सोरेन अपने एकमात्र चुनाव में जीत हासिल नहीं कर सकीं, लेकिन उन्होंने भाजपा के मजबूत उम्मीदवार को कड़ी चुनौती दी. चुनाव के दौरान उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भरने की कोशिश भी की थी. दुमका से रहा गहरा पारिवारिक रिश्ता रूपी सोरेन का दुमका से रिश्ता केवल चुनाव तक सीमित नहीं था. शिबू सोरेन ने दुमका को अपनी नेतृत्वक कर्मभूमि बनाया था. अलग झारखंड राज्य की मांग को लेकर चले लंबे आंदोलन में दुमका महत्वपूर्ण केंद्र रहा. शिबू सोरेन ने इसी क्षेत्र से आंदोलन को मजबूत किया और अलग झारखंड राज्य के गठन की नेतृत्वक लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. शिबू सोरेन आठ बार रहे सांसद दुमका लोकसभा सीट शिबू सोरेन के नेतृत्वक जीवन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रही. वह इस सीट से आठ बार लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं. लंबे समय तक दुमका में सक्रिय रहने के कारण उनका यहां व्यापक नेतृत्वक और सामाजिक जुड़ाव बना. इसी दौरान रूपी सोरेन भी उनके साथ नेतृत्वक और सामाजिक गतिविधियों में नजर आती रहीं. दुमका के खिजुरिया स्थित आवास से भी सोरेन परिवार का पुराना रिश्ता रहा है. बेटों ने भी दुमका की नेतृत्व संभाली रूपी सोरेन और शिबू सोरेन के तीनों बेटों का भी दुमका की नेतृत्व से सीधा जुड़ाव रहा. उनके बड़े पुत्र स्वर्गीय दुर्गा सोरेन जामा विधानसभा क्षेत्र से दो बार विधायक बने. इसके बाद हेमंत सोरेन ने वर्ष 2009 में दुमका विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर पहली बार विधानसभा में प्रवेश किया. बाद में उन्होंने राज्य की नेतृत्व में अपनी अलग पहचान बनाई और झारखंड के मुख्यमंत्री बने. बसंत सोरेन भी लगातार दूसरी बार विधायक शिबू और रूपी सोरेन के छोटे पुत्र बसंत सोरेन भी दुमका की नेतृत्व में सक्रिय रहे हैं. वर्तमान में वह दुमका विधानसभा क्षेत्र से लगातार दूसरी बार विधायक हैं. इस तरह एक ही परिवार की कई पीढ़ियों ने दुमका का नेतृत्वक प्रतिनिधित्व किया है. शिबू सोरेन की लोकसभा नेतृत्व से लेकर दुर्गा सोरेन, हेमंत सोरेन और बसंत सोरेन तक, दुमका सोरेन परिवार की नेतृत्वक यात्रा का अहम केंद्र रहा है. इसे भी पढ़ें: मां के पार्थिव शरीर के साथ एंबुलेंस में बैठे हेमंत सोरेन, भावुक कर देने वाला दृश्य; नेमरा रवाना हुआ काफिला एक चुनाव, लेकिन लंबा नेतृत्वक जुड़ाव रूपी सोरेन ने भले ही अपने जीवन में केवल एक बार चुनाव लड़ा, लेकिन दुमका से उनका जुड़ाव उससे कहीं पुराना और व्यापक था. 1999 के चुनाव में उन्होंने बाबूलाल मरांडी को कड़ी टक्कर दी. चुनाव परिणाम में मामूली अंतर से हार के बावजूद उनका नेतृत्वक महत्व परिवार और पार्टी के संदर्भ में बना रहा. दुमका ने सोरेन परिवार को लगातार नेतृत्वक जमीन दी और परिवार के सदस्यों ने भी अलग-अलग दौर में इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया. यही वजह है कि रूपी सोरेन का नाम भी दुमका और सोरेन परिवार के नेतृत्वक इतिहास से अलग नहीं किया जा सकता. इसे भी पढ़ें: Rupi Soren Funeral Live: मां की अंतिम विदाई में फूट-फूट कर रोए CM हेमंत, थोड़ी देर में पंचतत्व में विलीन होंगी रूपी सोरेन The post क्या आप जानते हैं कि रूपी सोरेन भी लड़ी थीं लोकसभा चुनाव? बाबूलाल मरांडी से हुआ था मुकाबला appeared first on Naya Vichar.

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‘वोट चोरी’ के आरोपों पर 42 पूर्व जजों का खुला पत्र, दी ऐसी चेतावनी

हिंदुस्तान के लोगों के नाम लिखे खुले पत्र के जरिए 42 पूर्व न्यायाधीशों ने निर्वाचन आयोग, न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने की कोशिशों पर गंभीर चिंता जताई है. पूर्व न्यायाधीशों ने बिना ठोस सबूत के लगाए जा रहे ‘‘वोट चोरी’’ के आरोपों पर भी सवाल उठाए हैं. ‘वोट चोरी’ के आरोपों पर उठाए सवाल खुले पत्र में पूर्व न्यायाधीशों ने कहा कि बिना पर्याप्त साक्ष्य के संवैधानिक संस्थाओं पर गंभीर आरोप लगाना उचित नहीं है. उन्होंने चेतावनी दी कि निर्वाचन आयोग और अन्य संवैधानिक प्राधिकारियों को बार-बार ‘‘चोर’’ या ‘‘समझौता कर चुके’’ बताने से लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता का भरोसा कमजोर हो सकता है. इन पूर्व जजों ने लिखा खुला पत्र क्र.सं. पदवी नाम पद/विवरण 1 जस्टिस हेमंत गुप्ता पूर्व न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय 2 जस्टिस पंकज मित्तल पूर्व न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय 3 जस्टिस बी.सी. पटेल पूर्व मुख्य न्यायाधीश, जम्मू और कश्मीर तथा दिल्ली उच्च न्यायालय 4 जस्टिस सुभ्रो कमल मुखर्जी पूर्व मुख्य न्यायाधीश, कर्नाटक उच्च न्यायालय 5 जस्टिस परमोद कोहली पूर्व मुख्य न्यायाधीश, सिक्किम उच्च न्यायालय 6 जस्टिस एस.एम. सोनी पूर्व न्यायाधीश, गुजरात उच्च न्यायालय एवं लोकायुक्त, गुजरात राज्य 7 जस्टिस एस.एन. ढींगरा पूर्व न्यायाधीश, दिल्ली उच्च न्यायालय 8 जस्टिस कृष्णा एस. दीक्षित पूर्व न्यायाधीश, कर्नाटक एवं उड़ीसा उच्च न्यायालय 9 जस्टिस श्रीधर राव पूर्व न्यायाधीश, कर्नाटक उच्च न्यायालय 10 जस्टिस आर.एस. राठौड़ पूर्व न्यायाधीश, राजस्थान उच्च न्यायालय 11 जस्टिस प्रशांत कुमार अग्रवाल पूर्व न्यायाधीश, राजस्थान उच्च न्यायालय 12 जस्टिस के.के. त्रिवेदी पूर्व न्यायाधीश, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय 13 जस्टिस डी.के. पालीवाल पूर्व न्यायाधीश, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय 14 जस्टिस राकेश सक्सेना पूर्व न्यायाधीश, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय 15 जस्टिस राजेंद्र कुमार पूर्व न्यायाधीश, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय 16 जस्टिस सुभाष संवत्सर पूर्व न्यायाधीश, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय 17 जस्टिस वेद प्रकाश शर्मा पूर्व न्यायाधीश, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय 18 जस्टिस आलोक वर्मा पूर्व न्यायाधीश, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय 19 जस्टिस आई.एस. श्रीवास्तव पूर्व न्यायाधीश, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय 20 जस्टिस सुभाष साकरीकर पूर्व न्यायाधीश, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय 21 जस्टिस एस.पी. खरे पूर्व न्यायाधीश, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय 22 जस्टिस पी.एन. सिंह पूर्व न्यायाधीश, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय 23 जस्टिस देवेंद्र कुमार अरोड़ा पूर्व न्यायाधीश, इलाहाबाद उच्च न्यायालय 24 जस्टिस सुरेंद्र विक्रम सिंह राठौड़ पूर्व न्यायाधीश, इलाहाबाद उच्च न्यायालय 25 जस्टिस एस.एन. श्रीवास्तव पूर्व न्यायाधीश, इलाहाबाद उच्च न्यायालय एवं लोकायुक्त, छत्तीसगढ़ राज्य 26 जस्टिस रमेश कुमार मेराठिया पूर्व न्यायाधीश, झारखंड उच्च न्यायालय 27 जस्टिस करम चंद पुरी पूर्व न्यायाधीश, पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय 28 जस्टिस (श्रीमती) राज राहुल गर्ग पूर्व न्यायाधीश, पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय 29 जस्टिस सी.वी. नागार्जुन रेड्डी पूर्व न्यायाधीश, आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय 30 जस्टिस विनोद गोयल पूर्व न्यायाधीश, दिल्ली उच्च न्यायालय 31 जस्टिस जी.पी. मित्तल पूर्व न्यायाधीश, दिल्ली उच्च न्यायालय 32 जस्टिस वी.बी. गुप्ता पूर्व न्यायाधीश, दिल्ली उच्च न्यायालय 33 जस्टिस दीपा शर्मा पूर्व न्यायाधीश, दिल्ली उच्च न्यायालय 34 जस्टिस पी.एन. रवींद्रन पूर्व न्यायाधीश, केरल उच्च न्यायालय 35 जस्टिस ज्योतिंद्रनाथ पूर्व न्यायाधीश, केरल उच्च न्यायालय 36 जस्टिस लोकपाल सिंह पूर्व न्यायाधीश, उत्तराखंड उच्च न्यायालय 37 जस्टिस सुभाष चंद्र पूर्व न्यायाधीश, उत्तराखंड उच्च न्यायालय 38 जस्टिस विवेक हिंदुस्तानी शर्मा पूर्व न्यायाधीश, उत्तराखंड उच्च न्यायालय 39 जस्टिस नरिंदर कुमार संस्थाएं (Institutions) 40 जस्टिस राजेंद्र कुमार पूर्व जिला एवं सत्र न्यायाधीश एवं निर्णायक अधिकारी, गुरुग्राम रेरा प्राधिकरण (RERA) 41 जस्टिस सुभाष बत्रा पूर्व सदस्य (विधि/कानूनी), पीएनजीआरबी (PNGRB) 42 जस्टिस जे.ए.पी. श्रीवास्तव पूर्व न्यायाधीश, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ‘संस्थाओं की आलोचना लोकतांत्रिक अधिकार’ पूर्व न्यायाधीशों ने कहा कि लोकतंत्र में संवैधानिक संस्थाओं की आलोचना करना हर नागरिक का अधिकार है. हालांकि, संस्थाओं को बदनाम करना अलग बात है. पत्र में कहा गया, ‘‘संस्थाओं की आलोचना लोकतांत्रिक अधिकार है. बदनाम करना नहीं.’’ संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर जोर पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले 42 पूर्व न्यायाधीशों ने निर्वाचन आयोग, न्यायपालिका और अन्य संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता बनाए रखने की जरूरत पर जोर दिया. उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में संस्थाओं के प्रति जनता का विश्वास महत्वपूर्ण है और ऐसे आरोपों से बचना चाहिए, जो बिना प्रमाण के उनकी विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाते हों. The post ‘वोट चोरी’ के आरोपों पर 42 पूर्व जजों का खुला पत्र, दी ऐसी चेतावनी appeared first on Naya Vichar.

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