शनिवार (18 अप्रैल)को होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) में दो हिंदुस्तानीय जहाजों पर हुई फायरिंग ने ईरान के अंदर चल रही खींचतान को उजागर कर दिया. मामला इस बात को लेकर उलझा था कि रास्ता खुला है या नहीं. एक बड़े अधिकारी ने कहा कि जहाज जा सकते हैं, लेकिन पहले Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) से तालमेल जरूरी है. वहीं विदेश मंत्री अब्बास अराघची (Abbas Araghchi) ने दावा किया कि इजराइल-हिज़्बुल्ला युद्ध में सीजफायर के बाद रास्ता खुला है. इन उलझे बयानों की वजह से ही हालात और तनावपूर्ण हो गए.
हिंदुस्तानीय जहाजों पर फायरिंग के बाद हिंदुस्तान ने कड़ा रुख अपनाया. ईरान के राजदूत मोहम्मद फथाली को तलब कर औपचारिक विरोध दर्ज कराया गया. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर किन हालात में ईरानी सुरक्षाबलों ने आम जहाजों पर फायरिंग कर दी. माना जा रहा है कि इसके पीछे भारी भ्रम और अंदरूनी नेतृत्व की खींचतान बड़ी वजह हो सकती है.
क्या IRGC अपने हिसाब से ले रहा है फैसले?
एक तरफ ईरान की प्रशासन होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की आवाजाही फिर शुरू होने का संकेत दे रही थी, वहीं दूसरी तरफ जमीन पर असली कंट्रोल इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) के हाथ में दिख रहा है, जो अपने हिसाब से फैसले ले रहा है. 28 फरवरी से शुरू हुए युद्ध के बाद से ही IRGC और ईरान की प्रशासन के बीच मतभेद दिख रहे थे. लेकिन शनिवार (18 अप्रैल) को होर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही के दौरान जो परेशानी हुई, उसने साफ कर दिया कि यह दरार अब और गहरी हो चुकी है.
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होर्मुज से गुजरना अब सुरक्षित नहीं
मिडिल ईस्ट में युद्ध शुरू होने और सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत के बाद, तेहरान की प्रशासन लगातार बातचीत और आर्थिक राहत पर जोर दे रही है. वहीं IRGC का रुख ज्यादा आक्रामक रहा है. हिंदुस्तानीय जहाजों पर फायरिंग से साफ है कि होर्मुज से गुजरना अब सुरक्षित नहीं रहा. यह सिर्फ तेल-गैस का रास्ता नहीं, बल्कि ऐसा मैदान बन गया है जहां तय हो रहा है कि ईरान में असली सत्ता आखिर किसके हाथ में है.
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