पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय, भारी उद्योग मंत्रालय और सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय द्वारा ऑटोमोबाइल दिग्गजों के साथ आयोजित एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस विषय पर एक-एक कर स्थिति साफ की है.
1. दावा: 2023 से पहले बने वाहन E20 पेट्रोल पर नहीं चल सकते
सच्चाई: यह दावा वैज्ञानिक तथ्यों के विपरीत है. देश में पिछले साढ़े तीन सालों से E15+ और ढाई सालों से अधिक समय से E19-E20 ईंधन का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर हो रहा है. रोजाना करीब 8 करोड़ वाहन पेट्रोल पंपों पर आते हैं, जिनमें बड़ी संख्या 2023 से पहले के वाहनों की है. इतने बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के बावजूद एथेनॉल के कारण बड़े स्तर पर इंजन खराब होने या गाड़ियां बंद पड़ने का एक भी प्रामाणिक मामला सामने नहीं आया है.
2. दावा: 30 करोड़ वाहन पूरी तरह बेकार हो जाएंगे
सच्चाई: आंकड़े बताते हैं कि अब तक 20 करोड़ से अधिक दोपहिया वाहन और 3 करोड़ से अधिक कारें E15+ और E20 पेट्रोल पर बिना किसी रुकावट के फर्राटा भर चुकी हैं. यदि E20 से गाड़ियां बेकार होतीं, तो देश भर में लाखों गाड़ियां बीच सड़क पर बंद मिलतीं और सर्विस सेंटरों पर वारंटी क्लेम की बाढ़ आ जाती. वास्तविक डेटा में वाहन ब्रेकडाउन का ऐसा कोई पैटर्न दर्ज नहीं हुआ है.
3. दावा: ऑटो कंपनियां निजी तौर पर E20 को अनुपयुक्त मानती हैं
सच्चाई: टोयोटा, मारुति सुजुकी, हीरो मोटोकॉर्प, हुंडई, टीवीएस और बजाज ऑटो के शीर्ष अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से आकर E20 के प्रति पूर्ण विश्वास जताया है. टोयोटा किर्लोस्कर ने स्पष्ट किया कि E20 ईंधन अंतरराष्ट्रीय UNECE मानकों के तहत कड़ी जांच के बाद ही लाया गया है. वहीं, हीरो मोटोकॉर्प और अन्य दिग्गजों ने भी पुष्टि की है कि E20 से गाड़ियों को अतिरिक्त नुकसान का कोई रिकॉर्ड नहीं है.
4. दावा: पुरानी गाड़ियों के इंजन में जंग और असामयिक घिसावट का खतरा है
सच्चाई: देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी मारुति सुजुकी ने वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान अपनी वर्कशॉप में आई 2.84 करोड़ गाड़ियों का विश्लेषण किया. इनमें लगभग 1.5 करोड़ ऐसी पुरानी गाड़ियां थीं जो मूल रूप से E20 के लिए प्रमाणित नहीं थीं. इसके बावजूद, इंजन के पुर्जों में न तो एथेनॉल से जंग का कोई मामला मिला और न ही कल-पुर्जों की उम्र कम पाई गई. एक अन्य OEM द्वारा 1.4 करोड़ वाहनों की लंबी ट्रैकिंग में भी ऐसे ही सकारात्मक नतीजे मिले.
5. दावा: E20 पेट्रोल डालने से माइलेज पूरी तरह गिर जाएगा
सच्चाई: विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि माइलेज क्रैश होने की बात मनगढ़ंत है. E10 के हिसाब से बनी बहुत पुरानी गाड़ियों में ईंधन दक्षता में अधिकतम 3 से 5 प्रतिशत का ही मामूली फर्क पड़ता है. रोजमर्रा का माइलेज गाड़ी चलाने के तरीके, ट्रैफिक, टायर प्रेशर और एसी के उपयोग पर ज्यादा निर्भर करता है. इसके विपरीत, E20 में उच्च ऑक्टेन नंबर होने के कारण इंजन को अधिक पावर, स्मूथ परफॉर्मेंस और बेहतर पिक-अप मिलता है.
6. दावा: प्रशासन के दबाव में जबरन E20 का समर्थन कर रही हैं ऑटो कंपनियां
सच्चाई: वाहन निर्माताओं ने साफ किया है कि यदि वे प्रयोगशाला परीक्षणों और सुरक्षा मानकों से संतुष्ट न होते, तो वे E20-संगत वाहनों का निर्माण और उन पर वारंटी (Warranty) देना जारी नहीं रखते. कंपनियों द्वारा दी जाने वाली वारंटी का फैसला नेतृत्वक दबाव में नहीं, बल्कि कड़े इंजीनियरिंग सत्यापन के आधार पर होता है.
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7. दावा: ऑटो कंपनियां प्रशासन के कहने पर सच छुपा रही हैं
सच्चाई: हिंदुस्तान की प्रमुख वाहन निर्माता कंपनियां स्वतंत्र और शेयर बाजार में सूचीबद्ध संस्थाएं हैं. कानूनन वे अपने ग्राहकों से किसी भी बड़े तकनीकी डिफेक्ट को छुपा नहीं सकती हैं. ऐसा करने पर उन पर भारी कानूनी जुर्माना, वारंटी दावों का आर्थिक बोझ और ब्रांड की साख खराब होने का खतरा रहता है. कंपनियों ने अपनी बात पूरी तरह से पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक डेटा के साथ रखी है.
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