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त्याग, सेवा, समर्पण, धैर्य व विनयशिलता की प्रतिमूर्ति थीं सीता

जानकी नवमी आज, सनातन संस्कृति में इस त्योहार का खास महत्व

फोटो की जगह पर ग्राफिक्स लगाना है

औरंगाबाद/कुटुंबा. सनातन संस्कृति का पवित्र पारंपरिक त्योहार जानकी नवमी मंगलवार को विधि विधान से मनायी जायेगी. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जानकी मां लक्ष्मी के अवतार मानी जाती हैं. हिंदू धर्मावलंबियों में इस दिन का खास महत्व रहा है. ज्योतिर्विद डॉ हेरम्ब कुमार मिश्र ने बताया कि आज जगत जननी मां सीता जी का प्राकट्य दिवस है. इस बार पांच मई को दिन में 11:47 बजे से लेकर मंगलवार को 11:54 बजे पूर्वाह्न तक नवमी है. ऐसे में छह मई को पूरे दिन यह व्रत रखा जायेगा. मध्याह्न में सीता जी की पूजा की जायेगी. उन्होंने बताया कि मिथिला क्षेत्र में सीता भूमि से अवतरित हुई थीं. डॉ मिश्र ने बताया कि वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्री राम के जन्म से सात वर्ष एक माह के बाद माता सीता जी जनकपुर की धरती से प्रकट हुई थीं. सीता जी त्याग, सेवा, संयम, समर्पण, धैर्य व विनयशीलता की प्रतिमूर्ति थीं. उनके इन आदर्शों का मानव जीवन में अनुकरण करना चाहिए. उन्होंने पति परायण जीवन को पूर्ण किया. सुहागिन स्त्रीएं पति की लंबी उम्र के लिए जानकी नवमी का व्रत रखती हैं. इस दिन स्नान आदि के उपरांत घर की साफ-सफाई करना चाहिए और श्री सीताराम जी व हनुमान जी का विधि विधान से पूजन और आरती कीर्तन भक्ति करना चाहिए. तुलसी कृत रामचरितमानस में भी श्रीसीता जी का विधिवत बखान किया गया है. इस दिन पूर्णतः सात्विक रूप से रहना के परंपरा है. अगर संभव हो तो श्रद्धालु पूजा के बाद भी पूरे दिन उपवास रखकर और अगले दिन पारण कर अनुष्ठान को पूरा करें.

जगत कल्याण के लिए प्राकट्य दिवस मनाना जरूरी

ज्योतिर्विद डॉ मिश्र व ढुंडा गांव के आचार्य राधेकृष्ण पांडेय ने बताया कि त्रेतायुग में चैत्र शुक्ल पक्ष नवमी को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम धरा पर अवतरित हुए थे. वहीं वैशाख शुक्ल पक्ष अक्षय तृतीया को भगवान परशुराम और वैशाख शुक्ल पक्ष नवमी को जगत जननी जानकी तथा भाद्रकृष्ण पक्ष अष्टमी को भगवान कृष्ण और चैत्र पूर्णिमा को हनुमान जी का आगमन हुआ था. उन्होंने बताया कि आधुनिकता के दौर में मानव समाज अपने सत्कर्मों से भटक रहा है. आध्यात्मिकता लुप्त हो रही है. दूसरे तरफ पाखंडी, ढोंगी व व्यभिचारी के साथ कई नेतृत्वक संगठन सनातन धर्म पर लगातार प्रहार करने का प्रयास कर रहे हैं. ऐसे में हिंदुस्तानीय संस्कृति की रक्षा व जगत कल्याण के लिए देवी-देवताओं के साथ विष्णु के अवतार भगवान राम, कृष्ण, परशुराम व लक्ष्मी स्वरूपा जगत जननी सीता का अवतरण दिवस मनाना जरूरी समझा जा रहा है. जानकी नवमी सिर्फ जन्मोत्सव नहीं. यह एक ऐसा दिन है कि मनुष्य को हर युग को याद दिलाता है. मौन में शक्ति और सहनशीलता में क्रांति माता सीता उस आदर्श का नाम है. जिसने एक हिंदुस्तानीय नारी को नयी ऊंचाई दी. संघर्ष में अडिग व मर्यादा में अटल उनके स्वभाव में शामिल था.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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