रोजा लक्जमबर्ग ने एक बार कहा था कि ‘जिस दिन स्त्रियों के श्रम का हिसाब होगा, इतिहास की सबसे बड़ी चोरी पकड़ी जायेगी.’ यह बात दुनियाभर की स्त्रियों पर लागू होती है. घर के जितने भी काम हैं, जैसे खाना बनाना, कपड़े धोना, बर्तन मांजना, घर की साफ-सफाई, पति, बच्चों और पति के अन्य रिश्तेदारों की देखभाल, पशुओं की देखभाल, दूध दूहना, मक्खन बनाना आदि, स्त्रियां सवेरे से उठकर देर रात तक करती रहती हैं. पर इन कामों को काम ही नहीं माना जाता. उन्हें अक्सर सुनने को मिलता है कि करती ही क्या हो. घर में ही तो रहती हो. मानो घर कोई ऐसी जगह है, जहां बिना हाथ-पांव हिलाये, बिना मेहनत किये, सारे काम अपने आप ही पूरे हो जाते हैं. इसे अनपेड डोमेस्टिक सर्विसेज कहा जाता है. पश्चिम में जिसे केयर इकोनॉमी कहते हैं, हमारे यहां उस तरह के देखभाल के काम कर्तव्य के खाते में हैं. स्त्रियों को बस एक घर में रहने के बदले, जब तक वे जीती हैं, हाड़तोड़ मेहनत करनी पड़ती है. चूंकि हिंदुस्तान में अधिकांश स्त्रीएं घर में ही रहती हैं, इसलिए उनके श्रम को कोई आंकता भी नहीं है. मिनिस्ट्री ऑफ स्टैटिस्टिक्स प्रोग्राम इंप्लीमेंटेशन ने 2024 में टाइम यूज सर्वे (टीयूएस) किया था. इस सर्वे में पंद्रह वर्ष से लेकर उनसठ वर्ष तक की 92.9 प्रतिशत स्त्रीओं और लड़कियों ने भाग लिया था. सर्वे से पता चला कि स्त्रीएं हर दिन अपने घर में कम से कम 305 मिनट या पांच घंटे, पांच मिनट काम करती हैं. जबकि उनकी तुलना में 30.4 प्रतिशत पुरुष कुल छियासी मिनट ही काम करते हैं. इतना ही नहीं, स्त्रियों को प्रतिदिन एक सौ चालीस मिनट किसी न किसी की देखभाल में खर्च करना पड़ता है. इससे पहले 2019 के टीयूएस में पाया गया था कि स्त्रियां दिन के 299 मिनट और पुरुष सत्तानबे मिनट काम करते हैं. इसका अर्थ हुआ कि जैसे-जैसे समय बीतता है, स्त्रियों के काम के घंटे पुरुषों के मुकाबले बढ़ते जाते हैं. विदित हो कि इस सर्वे में स्त्रियों के वे ही काम शामिल किये गये थे, जिनका जिक्र ऊपर किया गया है. जैसे कि खाना बनाने की तैयारी करना और खाना बनाना, सफाई, घर का मैनेजमेंट, घर के लिए सामान की खरीदारी तथा अन्य घरेलू काम आदि. वर्ष 2021 में एक अन्य सर्वे में कहा गया था कि स्त्रियों के घरेलू कार्यों को राष्ट्रीय बही-खाते में नहीं जोड़ा जाता. जबकि घर के तमाम काम न केवल परिवार के स्वास्थ्य और देश की आर्थिकी से जुड़े रहते हैं, बल्कि उन्हें बढ़ाते भी हैं. इन कामों में लैंगिक भेदभाव भी जुड़ा होता है कि घर के काम स्त्रियों के हैं. पुरुष घर के काम नहीं करते. स्त्रियों के जिम्मे अधिकांश घरेलू काम होते हैं. यह एक ऐसा श्रम है, जिसकी कभी कोई कीमत नहीं आंकी जाती. वर्ष 2023 में चेन्नई और बेंगलुरु की 9,636 स्त्रियों पर किये गये अध्ययन में सामने आया था कि घर में रहने वाली स्त्रियों के अधिकांश काम ऐसे होते हैं, जिनसे उन्हें कोई आय नहीं होती. वर्ष 2022 में नीति आयोग के एक लेख में बताया गया था कि स्त्रियों के घरेलू काम अक्सर उन्हें बाहर के उन कामों से वंचित रखते हैं, जिनसे उन्हें कोई आय हो सकती है. बताया जाता है कि हिंदुस्तान में लगभग सोलह करोड़ से लेकर इक्कीस करोड़ स्त्रीएं ऐसी हैं, जिनका मुख्य काम घर संभालना और बच्चों तथा बुजुर्गों की देखभाल करना है. एक दूसरे अध्ययन में कहा गया था कि हिंदुस्तान में लगभग 90 प्रतिशत स्त्रीएं घर के ऐसे काम करती हैं, जिनका उन्हें कोई पैसा नहीं मिलता. इतना ही नहीं, उनके जिम्मे खेती-किसानी और अपने ही घर में मजदूरी के काम अलग से हैं. यहां एक बात पर और गौर करना चाहिए. जो स्त्रियां नौकरीपेशा हैं, उनसे बातचीत करने पर पता चलता है कि विवाह हो जाने के बाद भी उन्हें घर के कामों से कोई मुक्ति नहीं मिलती, चाहे वह बारह घंटे की नौकरी ही क्यों न करती हों. छोटी-मोटी नौकरी करने वाली स्त्रीएं कहती हैं कि यदि घर के कामों और बच्चों की देखभाल के लिए उन्हें किसी सहायक की मदद लेनी हो, तो उनका नौकरी करने का कोई लाभ नहीं होगा. क्योंकि तब जो पैसा वह कमाती हैं, सारा सहायक को देने में चला जायेगा. यही नहीं, अधिकांश मामलों में उनके कमाये पैसों पर उनका कोई अधिकार भी नहीं होता. यह लेखिका कई उच्च पदस्थ स्त्रियों को जानती है, जिनके पति ही सारा पैसा रख लेते थे. जब से वेतन के लिए अकाउंट खोलना जरूरी हुआ है, तब से संभवत: कुछ हद तक उन्हें इससे मुक्ति मिली हो. सिर्फ विवाहित स्त्रियां ही नहीं, अपने माता-पिता के साथ रहने वाली लड़कियों को भी घर के कामों में हर तरह से योगदान देना पड़ता है. घर के कामों, छोटे भाई-बहनों को खिलाने, पालने की जिम्मेदारी उन्हीं के ऊपर होती है. घर के लड़कों से इसकी उम्मीद कोई नहीं करता. कई बार तो घर की जिम्मेदारी उठाने के कारण उनकी पढ़ाई तक छुड़वा दी जाती है. कई बार महसूस होता है कि जब तक स्त्रियों के जीवन में विवाह और मां बनना ही उनकी एकमात्र नियति रहेगी, तब तक शायद उन्हें कभी इन कामों से मुक्ति नहीं मिल सकेगी. या यूं कहें कि स्त्रियां पैदा ही बस दिन-रात काम करने के लिए होती हैं. आखिर वे कौन सी योजनाएं हैं, जो उन्हें इस दोहरे-तिहरे भार से आजाद कर सकती हैं? (ये लेखिका के निजी विचार हैं.) The post स्त्रियों के काम को काम कब माना जायेेगा, पढ़ें क्षमा शर्मा का लेख appeared first on Naya Vichar.