Hot News

21 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे हैं सोनम वांगचुक, जानिए उनकी जिंदगी की पूरी कहानी

Who is sonam wangchuk : इन दिनों दिल्ली का जंतर मंतर एक और विरोध प्रदर्शन का साक्षी बन रहा है. यहां पेपर लीक मामले की जांच और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर हो रहा प्रदर्शन चर्चा में है. लेकिन बीते तीन सप्ताह में एक और चेहरा लगातार सुर्खियों में बना हुआ है. ये चेहरा है शिक्षाविद्, और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक…

सोनम वांगचुक पिछले 28 जून से भूख हड़ताल पर बैठे हैं. हालांकि शनिवार सुबह आंदोलन ने नया मोड़ तब लिया, जब दिल्ली पुलिस उन्हें जंतर-मंतर से सफदरजंग अस्पताल ले गई. बताया जा रहा कि यह कार्रवाई दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश के बाद हुई, जिसमें केंद्र और दिल्ली प्रशासन को निर्देश दिया गया था कि वांगचुक का प्रतिदिन मेडिकल परीक्षण कराया जाए और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें उपचार उपलब्ध कराया जाए.

उनकी बिगड़ती सेहत और भूख हड़ताल की वजहों के साथ-साथ लोग जानना चाह रहे कि वे कब तक अनशन पर रहेंगे.सवाल ये भी पूछा जा रहा कि सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर क्यों बैठे हैं..? लेकिन बात सिर्फ भूख हड़ताल तक सीमित नहीं है,बल्कि उससे ज्यादा महत्वपूर्ण है यह जानना कि शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए काम करने वाला एक इंजीनियर और इनोवेटर, इस प्रकार के जन आंदोलन का प्रमुख चेहरा कैसे बन गया?

क्या था वो मुद्दा जिसने लद्दाख के एक शिक्षाविद को सड़कों पर उतरने और प्रशासन के खिलाफ आवाज उठाने के लिए मजबूर किया? जानना ये भी जरूरी है कि पिछले 21 दिन से भूखे रहकर शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही, कथित परीक्षा अनियमितताओं और छात्रों के हितों से जुड़े मुद्दों को उठा रहे वांगचुक असल जिंदगी में कौन हैं?

जंतर मंतर पर भूख हड़ताल करने वाले..कौन हैं सोनम वांगचुक

सोनम वांगचुक का जन्म 1 सितंबर 1966 को लद्दाख के अल्ची गांव में हुआ था, उनके पिता सोनम वांगयाल प्रशासनी सेवा में श्रीनगर में कार्यरत थे और बाद में नेतृत्व में आए और मंत्री भी बने. नौकरी के दौरान उनके साथ उनका परिवार भी रहता था. 

बचपन और शिक्षा 

लद्दाख के सुदूर गांव (अलची/उलेटोकपो) में स्कूल न होने के कारण 9 वर्ष की आयु तक उनका किसी स्कूल में दाखिला नहीं हुआ था. तो वांगचुक की शुरुआती पढ़ाई घर पर ही हुई, जहां उनकी मां उन्हें उनकी मातृभाषा लद्दाखी (जिसे भोटी या बोधी भी कहा जाता है) में पढ़ाती थीं. करीब नौ वर्ष की उम्र में उन्हें आगे की पढ़ाई के लिए श्रीनगर भेजा गया, जहां एक स्कूल में उनका दाखिला कराया गया. हालांकि, वहां पढ़ाई का माध्यम उर्दू और अंग्रेजी था, जिसे वे नहीं समझते थे. भाषा की इस बाधा के कारण शुरुआती वर्षों में उन्हें पढ़ाई में काफी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा.

बाद में उनकी पढ़ाई दिल्ली के सेंट्रल स्कूल (केंद्रीय विद्यालय) में हुई. इसके बाद उन्होंने वर्ष 1987 में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (NIT), श्रीनगर ( उस समय उसे रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज कहा जाता था) से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक की डिग्री हासिल की. उच्च शिक्षा के दौरान उन्होंने फ्रांस के ग्रेनोबल स्थित CRAterre School of Architecture में लगभग दो वर्षों तक मिट्टी से बने पर्यावरण-अनुकूल भवनों (Earthen Architecture) का अध्ययन भी किया.

शिक्षा में योगदान 

उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद वर्ष 1988 में सोनम वांगचुक लद्दाख लौट आए. अपने स्कूली दिनों में भाषा संबंधी समस्याओं का सामना कर चुके वांगचुक ने शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की दिशा में काम करने का फैसला किया. उनका मानना था कि भाषा या भौगोलिक परिस्थितियां किसी भी शिशु की शिक्षा और उसके भविष्य में बाधा नहीं बननी चाहिए.

वांगचुक ने अपने भाई और पांच साथियों के साथ स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (SECMOL) की स्थापना की. जिसका उद्देश्य लद्दाख की शिक्षा व्यवस्था में सुधार करना, ग्रामीण विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना और स्थानीय संसाधनों व सौर ऊर्जा पर आधारित पर्यावरण-अनुकूल शिक्षा परिसर विकसित करना था.

वांगचुक ने SECMOL को एक वैकल्पिक शिक्षा मॉडल के रूप में विकसित करने के लिए लगातार काम किया. 19 वर्ष की उम्र में वांगचुक अपनी पढ़ाई का खर्च उठाने के लिए ट्यूशन पढ़ाते थे. इसके साथ-साथ उन छात्रों की भी मदद करते जो राष्ट्रीय स्तर की कॉलेज प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी में पीछे थे.बाद में जब उन्होंने SECMOL की स्थापना की तो छात्रों को एजुकेशन में व्यावहारिक व स्थानीय जरूरतों के अनुरूप की जा सकने वाली प्रयास के लिए प्रशिक्षण देना शुरू किया. उनके शिक्षा सुधार संबंधी योगदान को देखते हुए…

वर्ष 2005 में हिंदुस्तान प्रशासन के तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने सोनम वांगचुक को नेशनल गवर्निंग काउंसिल फॉर एलिमेंट्री एजुकेशन का सदस्य नियुक्त किया.

पर्यावरण संरक्षण और तकनीकी योगदान 

लद्दाख में पानी की कमी और जलवायु परिवर्तन से पैदा हो रही चुनौतियों को देखते हुए सोनम वांगचुक ने आइस स्तूप (Ice Stupa) तकनीक विकसित की.

आइस स्तूप एक कृत्रिम ग्लेशियर है, जिसका उद्देश्य सर्दियों में उपलब्ध अतिरिक्त पानी को बर्फ के रूप में संरक्षित करना और गर्मियों में उसके पिघलने से सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराना है. इससे स्थानीय किसानों को खेती के मौसम में पानी की कमी से राहत मिलती है.

आइस स्तूप जल संरक्षण, हरित आवरण बढ़ाने और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने की दिशा में भी महत्वपूर्ण पहल मानी जाती है.आइस स्तूप आज लद्दाख आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का प्रमुख केंद्र बन चुका है.

समाज सेवा 

आइस स्तूप और SECMOL के अलावा सोनम वांगचुक ने फार्म स्टेज लद्दाख (Farm Stays Ladakh) परियोजना की भी शुरुआत की.

वर्ष 2016 में शुरू हुई फार्म स्टेज लद्दाख परियोजना का उद्देश्य समुदाय-आधारित और सतत पर्यटन को बढ़ावा देना था. इसके तहत पर्यटकों को स्थानीय परिवारों के घरों में ठहरने का अवसर मिलता है, जिससे स्थानीय लोगों, विशेषकर स्त्रीओं को अतिरिक्त आय और रोजगार के अवसर प्राप्त होते हैं.

शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक नवाचार के क्षेत्र में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए सोनम वांगचुक को वर्ष 2018 में एशिया के प्रतिष्ठित रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

  • आइस स्तूप (Ice Stupa) कृत्रिम हिमनद तकनीक और सौर ऊर्जा से गर्म होने वाले सैन्य टेंट (Solar-Heated Military Tents) जैसे तकनीक को सोनम वांगचुक ने विकसित किया है. हालांकि उन्होंने कभी इसका पेटेंट नहीं कराया.
  • पर्यावरण संरक्षण की आवाज उठाने वाले वांगचुक प्रदर्शनकारी कैसे बने…

    साल 2018 में रेमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित होने के बाद सोनम वांगचुक की पहचान लद्दाख तक सीमित नहीं रही, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वो पहचाने जाने लगे. हालांकि शिक्षाविद, समाज सुधारक और पर्यावरणविद के रूप में उनकी पहचान वाली, यह कहानी वर्ष 2018 तक ही रही. उसके बाद उनकी पहचान एक सामाजिक-नेतृत्वक आंदोलन के प्रमुख चेहरे के रूप में भी बनने लगी.

    पहले तारीफ…फिर नाराजगी

    दरअसल हुआ ये कि अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधान हटा लिए गए और लद्दाख को अलग केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा मिला. केंद्र प्रशासन के इस फैसले को काफी सराहा गया. उस समय, सोनम उन लोगों में शामिल थे जिन्होंने इस फैसले का स्वागत किया था. उनका मानना था कि इससे लद्दाख को नई गति मिलने के साथ-साथ बेहतर प्रशासनिक अवसर भी मिलेंगे. हालांकि कुछ ही समय के बाद उन्होंने केंद्र प्रशासन की नीतियों पर सवाल उठाने शुरू किए. कभी लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश होने के फायदे गिनाने वाले वांगचुक का नया तर्क था कि केंद्र शासित प्रदेश बनने के बावजूद लद्दाख में निर्वाचित विधानसभा नहीं होगा. जिसके कारण अधिकांश प्रशासनिक निर्णय नौकरशाही के हाथों में केंद्रित होगा और स्थानीय लोगों की भागीदारी सीमित होने की आशंका है. 

    छठी अनुसूची को लेकर क्या है वांगचुक की मांग ?

    सोनम वांगचुक ने लेह अपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस (KDA) के साथ मिलकर केंद्र प्रशासन के सामने चार प्रमुख मांगें रखीं. इनमें लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची के तहत संरक्षण देना, पूर्ण राज्य का दर्जा प्रदान करना, स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाना और लोक सेवा आयोग की स्थापना करना, तथा हिमालयी पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना शामिल है. उनका कहना है कि इन कदमों से लद्दाख की जनजातीय पहचान, संस्कृति और पर्यावरण को लंबे समय तक सुरक्षा मिल सकेगी.​

    ​मांगों को मनवाने के लिए..गांधीवादी आंदोलन का तरीका

    अपनी मांगों के समर्थन में वांगचुक ने गांधीवादी तरीके से शांतिपूर्ण आंदोलन किए. वर्ष 2023 और 2024 में उन्होंने लद्दाख के संवैधानिक अधिकारों और पर्यावरण संरक्षण के मुद्दों को लेकर कई बार भूख हड़ताल की. मार्च 2024 में उनका 21 दिनों का ‘क्लाइमेट फास्ट’ राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना. इसके बाद सितंबर-अक्टूबर 2024 में उन्होंने लद्दाख से दिल्ली तक करीब 1,000 किलोमीटर की दिल्ली चलो पदयात्रा शुरू की. दिल्ली सीमा पर उन्हें और उनके समर्थकों को पुलिस ने हिरासत में लिया, जिसके बाद यह मुद्दा राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया.

    सोनम वांगचुक पर क्यों लगा NSA

    आंदोलन के बढ़ते दबाव के बीच केंद्र प्रशासन के गृह मंत्रालय ने लेह अपेक्स बॉडी (LAB) और कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस (KDA) सहित विभिन्न पक्षों के साथ बातचीत के लिए एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति (High-Powered Committee) के माध्यम से संवाद की प्रक्रिया आगे बढ़ाई. इस दौरान अनुसूचित जनजातियों के लिए प्रशासनी नौकरियों में आरक्षण बढ़ाने जैसे कुछ प्रशासनिक कदम उठाए गए, लेकिन छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक संरक्षण और पूर्ण राज्य के दर्जे जैसी प्रमुख मांगों पर अब तक अंतिम फैसला नहीं हो सका है.

    केंद्र प्रशासन के साथ जारी बातचीत को वांगचुक ने अनावश्यक रूप से लंबी और बिना मतलब की, बताते हुए असंतोष जताया. बाद में यह आंदोलन हिंसक घटनाओं तक पहुंच गया. इसको कंट्रोल करने के लिए प्रशासन ने कई क्षेत्रों में इंटरनेट सेवाएं बंद कर दीं और सोनम वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत हिरासत में लेकर जेल भेज दिया गया. हालांकि बाद में लगभग 170 दिनों (6 महीने) तक जेल में रहने के बाद उन्हें रिहा कर दिया गया और मार्च 2026 में उन पर लगा NSA हटा लिया गया.

    फिलहाल सोनम वांगचुक शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही, परीक्षा अनियमितताओं, कथित NEET पेपर लीक की निष्पक्ष जांच, केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग और लद्दाख से जुड़ी अपनी लंबित मांगों को लेकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं. लगातार 21 दिनों के उपवास के कारण उनकी सेहत बिगड़ गई है. मीडिया रिपोर्टों के अनुसार उनका लगभग 9.5 किलोग्राम वजन कम हो चुका है, जिसके बाद उन्हें चिकित्सकीय निगरानी के लिए सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया.

    ये भी पढ़ें : E20 Petrol Controversy : फायदे का सौदा या नई मुसीबत! जानिए क्या है एथेनॉल विवाद

    The post 21 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे हैं सोनम वांगचुक, जानिए उनकी जिंदगी की पूरी कहानी appeared first on Naya Vichar.

    Spread the love

    विनोद झा
    संपादक नया विचार

    You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.

    About Us

    नयाविचार एक आधुनिक न्यूज़ पोर्टल है, जो निष्पक्ष, सटीक और प्रासंगिक समाचारों को प्रस्तुत करने के लिए समर्पित है। यहां राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाज, तकनीक, शिक्षा और मनोरंजन से जुड़ी हर महत्वपूर्ण खबर को विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत किया जाता है। नयाविचार का उद्देश्य पाठकों को विश्वसनीय और गहन जानकारी प्रदान करना है, जिससे वे सही निर्णय ले सकें और समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकें।

    Quick Links

    Who Are We

    Our Mission

    Awards

    Experience

    Success Story

    © 2025 Developed By Socify

    Scroll to Top