US and Kabul : अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा अफगानिस्तान स्थित बगराम एयर बेस पर नियंत्रण वापस लेने की मांग तालिबान ने तत्काल खारिज कर दी थी, पर अब रूस में अफगानिस्तान पर मास्को फॉर्मेट परामर्श की बैठक में चीन, रूस, हिंदुस्तान, ईरान और पाकिस्तान समेत दस देशों ने जिस तरह ट्रंप की इस मांग का विरोध किया है, वह चौंकाने वाला है. इन देशों ने बयान जारी कर अमेरिकी कोशिश को काबुल की संप्रभुता के साथ-साथ क्षेत्रीय शांति और स्थिरता के हितों के भी खिलाफ बताया है.
इस बैठक में पहली बार अफगान विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी के नेतृत्व में अफगान प्रतिनिधिमंडल ने भी हिस्सेदारी की. बगराम एयर बेस पर अमेरिका का करीब दो दशक तक नियंत्रण रहा है. अगस्त, 2021 में अफगानिस्तान से अपने सैनिकों की वापसी के बाद अमेरिका ने उस पर से अपना कब्जा हटा लिया था. बगराम अफगानिस्तान का सबसे बड़ा एयर बेस है. चीन के परमाणु हथियार बनाने वाले इलाके से यह एयर बेस सिर्फ एक घंटे की दूरी पर है. चीन की बढ़ती परमाणु शक्ति का जवाब देने के लिए चीन के सबसे करीबी क्षेत्रों-यानी जापान, फिलीपींस और हिंदुस्तान-प्रशांत क्षेत्र के अन्य इलाकों में अमेरिकी सेना तैनात है. शायद यही कारण है कि पिछले कुछ दिनों में ट्रंप कई बार बगराम एयर बेस पर नियंत्रण हासिल करने की बात कहते आये हैं.
सबसे पहले 18 सितंबर को ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के साथ एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि अमेरिकी प्रशासन बगराम एयर बेस को वापस लेने की कोशिश कर रही है. उसके दो दिन बाद उन्होंने सोशल प्लेटफॉर्म ट्रुथ पर पोस्ट किया कि यदि अफगानिस्तान बगराम एयर बेस अमेरिका को वापस नहीं करता है, तो बहुत बुरा होगा. हिंदुस्तान इस मुद्दे पर तालिबान के साथ तब खड़ा हुआ है, जब अफगान विदेश मंत्री आमिर खान मुत्ताकी हिंदुस्तान यात्रा पर आने वाले हैं. हालांकि हिंदुस्तान ने अभी तक तालिबान शासन को मान्यता नहीं दी है, पर वह अफगानिस्तान में मानवीय आधार पर मदद मुहैया करा रहा है. बगराम एयर बेस पर अमेरिका द्वारा फिर से नियंत्रण हासिल करने से हो सकता है कि क्षेत्र में चीन का वर्चस्व घटे, जो हिंदुस्तान के हित में होगा, पर यहां अमेरिकी मौजूदगी से हिंदुस्तान-ईरान के रिश्तों पर असर पड़ेगा. सर्वोपरि, ट्रंप की अविश्वसनीयता और उनके हालिया हिंदुस्तान विरोधी कदमों ने नयी दिल्ली को यह कदम उठाने के लिए प्रेरित किया होगा.
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