IPL 2026 की शुरुआत आज से हो रही है. फैंस एक बार फिर रोमांच से भरे मुकाबलों के लिए तैयार हैं. मैदान पर जहां एक तरफ धुआंधार बल्लेबाजी और तेज गेंदबाजी देखने को मिलेगी, वहीं दूसरी तरफ एडवांस टेक्नोलॉजी भी स्पोर्ट्स को और ज्यादा फेयर और दिलचस्प बनाएगी. खासकर जब बात आती है LBW जैसे करीबी फैसलों की, तो अब सिर्फ अंपायर की नजर ही नहीं, टेक्नोलॉजी भी पूरा साथ देती है. आइए आपको एक-एक कर बताते हैं कि कौन-कौन सी टेक्नोलॉजी किस काम आती है.
हॉक-आई (Hawk-Eye)
सबसे पहले बात करते हैं हॉक-आई की. हॉक-आई एक एडवांस्ड कंप्यूटर सिस्टम है. स्टेडियम में लगे कई हाई-स्पीड कैमरे बॉल की हर मूवमेंट को रियल टाइम में ट्रैक करते हैं. इसके बाद हॉक-आई उस डेटा की मदद से गेंद की 3D ट्रैजेक्टरी तैयार करता है और ये बताता है कि बॉल स्टंप्स पर लगती या नहीं. यही वजह है कि थर्ड अंपायर को एकदम सटीक विजुअल्स मिलते हैं और फैसले भी पहले से कहीं ज्यादा सही और भरोसेमंद हो जाते हैं.
अल्ट्राएज (UltraEdge) या स्निकोमीटर (Snickometer)
जब मैदान पर फैसला बेहद करीब का होता है, यानी बॉल बैट या पैड को हल्का सा छूकर निकली है या नहीं, तब काम आता है अल्ट्राएज (UltraEdge) या स्निकोमीटर (Snickometer). ये टेक्नोलॉजी कुछ खास ऑडियो सेंसर और हाई-स्पीड कैमरों की मदद से बॉल और बैट के बीच होने वाले बेहद हल्के से कॉन्टैक्ट को भी पकड़ लेती है. जैसे ही कोई टच होता है, स्क्रीन पर ग्राफ में एक छोटा सा स्पाइक दिखता है. यह अंपायर को साफ संकेत देता है कि एज लगा है या नहीं. खासकर LBW रिव्यू और कैच-बिहाइंड जैसे फैसलों में ये सिस्टम गेम-चेंजर साबित होता है.
स्टंप सेंसर्स (Stump sensors)
आजकल क्रिकेट के स्टंप्स भी हाई-टेक हो चुके हैं. अब इनमें LED या माइक्रोचिप सेंसर लगे होते हैं. यह बॉल लगते ही तुरंत सिग्नल भेज देते हैं. जैसे ही बॉल स्टंप से टकराती है, ये सेंसर रियल टाइम में थर्ड अंपायर और ब्रॉडकास्ट टीम को जानकारी दे देते हैं. इसका फायदा ये है कि अब बोल्ड या रन-आउट जैसे फैसले लेने में न तो देरी होती है और न ही ज्यादा कन्फ्यूजन.
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