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दीदी की रसोई ने किया 286 करोड़ का कारोबार, 5640 परिवारों की बदली जिंदगी

Jeevika Didi : बिहार में स्त्री सशक्तिकरण की एक नई और सुनहरी इबारत लिखी जा रही है, जहां “दीदी की रसोई” न केवल स्वाद का केंद्र बनी है बल्कि राज्य की ग्रामीण वित्तीय स्थिति का पावरहाउस बनकर उभरी है. राज्यभर में फैली सैकड़ों यूनिट्स के माध्यम से जीविका दीदियां अब प्रोफेशनल शेफ और बिजनेस मैनेजर की भूमिका में नजर आ रही हैं, जो बड़े-बड़े प्रशासनी संस्थानों का जायका बदल रही हैं.

“दीदी की रसोई” सिर्फ खाना परोसने का काम नहीं कर रही, बल्कि हजारों स्त्रीओं के जीवन में स्थायित्व और आत्मनिर्भरता ला रही है. समूह बनाकर स्त्रीएं खुद इन रसोइयों का संचालन करती हैं और आर्थिक रूप से मजबूत हो रही हैं.

अस्पतालों से लेकर पुलिस लाइन तक का बदला स्वाद

दीदी की रसोई का विस्तार अब सिर्फ अस्पतालों तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि इसका दायरा पुलिस अकादमी, ओल्ड एज होम और आवासीय स्कूलों तक पहुंच गया है. पटना के नवीन पुलिस केंद्र से लेकर सुदूर जिलों के रजिस्ट्री ऑफिस तक, हर जगह स्त्रीओं द्वारा संचालित इन रसोइयों की मांग बढ़ रही है.

खास बात यह है कि यहां पुलिस के जवानों से लेकर बुजुर्गों तक को उनकी जरूरत और डाइट चार्ट के हिसाब से पोष्टिक भोजन परोसा जा रहा है.

डोसा से लेकर लिट्टी-चोखा

इन रसोइयों की सबसे बड़ी विशेषता इनका विविध मेन्यू है जो किसी बड़े रेस्टोरेंट को टक्कर देता है. यहां पारंपरिक दाल-भात, भुंजिया और लिट्टी-चोखा तो मिलता ही है, साथ ही साउथ इंडियन डिशेज और मीठे में रसगुल्ले की भी खूब डिमांड रहती है.

शाकाहारी भोजन के साथ-साथ कई केंद्रों पर चिकन और मटन चावल का भी स्वाद चखने को मिलता है, जिसे जीविका दीदी पूरी शुद्धता और स्वच्छता के साथ तैयार करती हैं.

लो-कॉस्ट मील मॉडल

यह पूरा प्रोजेक्ट न केवल मुनाफे के लिए है बल्कि एक ‘लो-कॉस्ट मील मॉडल’ पर आधारित है जो आम जनता को किफायती दरों पर गुणवत्तापूर्ण भोजन उपलब्ध कराता है.

इस पहल ने राज्य के 5,640 परिवारों की माली हालत सुधार दी है, जिससे वे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन गए हैं. जीविका समूहों के माध्यम से संचालित यह मॉडल आज पूरे देश के लिए स्त्री उद्यमिता की एक बेहतरीन मिसाल पेश कर रहा है.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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