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World Thalassemia Day : उस पिता के दर्द की कहानी, जिसके बच्चे की रगों में दौड़ता है ‘किराये का लहू’

World Thalassemia Day : हर माह में तीसरा सप्ताह आते ही सौरव पर छटपटाहट हावी होने लगती है. फोन की कॉन्टैक्ट लिस्ट में हर उस व्यक्ति को तलाशते हैं, जो शायद इस बार मना न करे. ये एक पिता की अपने 11 साल के शिशु के लिए फिक्र है, जो हर तीन-चार सप्ताह में एक बार उसे घेर लेती है. एक ऐसे पिता की, जिसे शिशु के जन्म के छह माह बाद ही पता चला था कि वह ‘थैलेसीमिया मेजर’ से पीड़ित है.
तब से अब तक वह शिशु की जिंदगी को ‘किराये के लहू’ से चलाता आया है. उसे शुरू में ही डॉक्टरों ने बता दिया था कि इस बीमारी का कोई इलाज नहीं. समय-समय पर सिर्फ ब्लड ट्रांसफ्यूजन ही एकमात्र उपाय है. हां, अब तक मेडिकल साइंस में एक और उपचार है- बीएमटी, मगर इसकी प्रक्रिया कहीं अधिक जटिल और महंगी है, जिस बारे में साधारण आय वाले माता-पिता सोच भी नहीं सकते. कई प्रशासनी सुविधाएं तो हैं, मगर महज कागजों पर.

पापा डोनर मिला क्या?

सौरव रांची स्थित एक प्राइवेट कंपनी में काम करते हैं, जिनकी आय बेहद सीमित है. पूछे जाने पर भावुक होकर कहते हैं कि आप भाई-बंधु लोग की वजह से शिशु को जीला पा रहा हूं, नहीं तो मेरे जैसे कितने मां-बाप हैं, जिन्हें हर माह अस्पतालों में खून के लिए दिन-दिन भर चक्कर लगाते देखता हूं. मेरे लिए तो अब आम बात है. जैसे हर महीना अपना मोबाइल रिचार्ज करवाता हूं, बस उसी तरह महीने में शिशु का ‘ब्लड रिचार्ज’ करवाना होता है. ‘भाई साहब, इस महीने की फलां तारीख को आपने खून देने को बोला था, क्या आप आ पायेंगे?’- यही मैसेज भेजता रहता हूं. आखिरी वक्त पर कोई मुकर जाये, तो बता नहीं सकता कि दिल पर क्या बीतती है. इसलिए हमेशा दो-तीन लोगों को बैकअप में बोल कर रखना होता है. मैं तो खुद को खून का भिखारी मानता हूं, जो हर महीने अपने शिशु के लिए सबसे खून मांगता फिरता है. अगर खून मिल गया, तो समझिए एक महीना और शिशु को जीवन मिल गया. अगर नहीं मिला, तो सामने अंधेरा छा जाता है. घर आता हूं, तो बच्चा भी पूछ देता है कि ‘पापा डोनर मिला क्या?’ अस्पताल में एक मैम ने मुझे कहा है कि आप अपना खून बचाकर रखिए, ताकि आपात स्थिति में काम आ सके.

पढ़ाई में अच्छा कर रहा है, मगर…

सौरव का थैलेसीमिया पीड़ित बच्चा क्लास सिक्स में पढ़ रहा है और इस बार वह 92% अंकों के साथ पास हुआ है. मैंने बीमारी के कारण शिशु के शारीरिक व मानसिक विकास के बारे में जानना चाहा, तो वे कहते हैं कि मानसिक रूप से बिल्कुल फिट है. पढ़ाई में अच्छा कर रहा है. मैथ-साइंस में बेहद रुचि है, पर शारीरिक विकास में बाधा है. 11 साल की उम्र के अनुसार वजन बेहद कम है और हाइट भी नहीं बढ़ रही. डॉक्टर बताते हैं कि इस बीमारी में शारीरिक विकास सामान्य नहीं रहता.
किसी बार जब समय पर खून का इंतजाम नहीं हो पाता या स्कूल में एग्जाम वगैरह के चलते कुछ समय टालना पड़ता है, तो यह बहुत कष्टकारी हो जाता है. जब उसके चेहरे का रंग पीला पड़ने लगता है, भूख कम होती जाती है, उल्टी, सिरदर्द और कमजोरी घेर लेती है, तो समझ जाता हूं कि तुरंत खून चढ़ाना होगा, नहीं तो स्थिति भयावह हो सकती है.

काश! हम पहले जांच कराये होते

सौरव आज भी उस दिन को याद कर सिहर जाते हैं जब पहली बार वे शिशु को लेकर वेल्लोर गये थे. बच्चा जन्म से काफी कमजोर था. डॉक्टरों ने बताया कि हीमोग्लोबिन नहीं बन रहा. सीएमसी वैल्लोर के डॉक्टरों के ऑब्जर्वेशन में डेढ़ साल तक बच्चा रहा. वहीं 17 जून, 2015 को पहली बार उसे खून चढ़ाया गया और उसे थैलेसीमिया मेजर होने का पता चला. हम मां-बाप पर तो पहाड़ ही टूट गया. वहीं के डॉक्टर के गाइडेंस भी दवाएं आज भी चला रहे हैं, कुछ जरूरी होने पर जाना होता है या फोन से सलाह मिल जाती है.
वहां डॉक्टरों ने बताया कि शादी से पहले स्त्री और पुरुष थैलेसीमिया स्क्रीनिंग टेस्ट कराना कितनी जरूरी है. वह कहते हैं, अगर हम भी जांच कराये होते, तो आज यह नौबत नहीं आती. हालांकि इसमें भी भारी खर्च आता है. आम लोग के लिए संभव ही नहीं. प्रशासन को इस ओर भी ध्यान देना चाहिए.
शिशु को स्थायी इलाज (BMT) देने की उम्मीद में दूसरा बच्चा प्लान किया, ताकि बोन मैरो मैच हो सके. लेकिन लंबी जांच प्रक्रियाओं के बाद पता चला कि छोटे भाई का बोनमैरो बड़े भाई से मैच नहीं हुआ. वह उम्मीद भी टूट गयी.

प्रशासनी सुविधाओं का सच

थैलेसीमिया मरीजों के लिए आयरन ओवरलोड कम करने वाली दवाएं और इंजेक्शन बेहद महंगे हैं. हालांकि कुछ दवाएं प्रशासनी अस्पताल से मिल जाती हैं, लेकिन हर महीने हजारों का खर्च फिर भी बना रहता है. सौरव बताते हैं कि प्रशासनी निर्देशानुसार थैलेसीमिया पीड़ितों को बिना डोनर के मुफ्त खून मिलना चाहिए, लेकिन हकीकत सभी जानते हैं कि खून के लिए कितने करम करने होते हैं. वहीं प्रशासनी जांच में कितनी सावधानी बरती जाती है, ये भी सबको पता है. झारखंड में कई शिशु इसी लापरवाही या कमियों की वजह से एचआइवी पॉजिटिव हो गये. 
जाहिर तौर पर निजी अस्पताल इसमें रुचि नहीं लेते और प्रशासनी अस्पतालों पर मरीजों का भारी बोझ है. अकेले रांची सदर अस्पताल में ही करीब 1700 मरीज पंजीकृत हैं. अब तो रिम्स के पेशेंट भी उधर ही शिफ्ट कर दिये गये हैं. ऐसे में समय पर खून मिलना किस्मत की ही बात है.

बीएमटी दूर, एमआरआइ ही मुश्किल

बीएमटी के लिए नारायणा हॉस्पिटल, बेंगलुरु से 2021 में डॉ विक्रम भट्ट आये थे, जो बच्चों के सैंपल ले गये थे. करीब 23 बच्चों के एचएलए-मैच डोनर भी मिले. मगर अब तक एक का भी बीएमटी नहीं हो सका. कुछ अन्य संस्थाएं भी प्रयासरत हैं, मगर कुछ नहीं हुआ. मेरे हिसाब से ये जुआ की तरह है. बोनमैरो मैच करने के बाद भी जरूरी नहीं कि यह सफल हो जाये. बीएमटी की बात तो दूर, प्रशासनी अस्पताल में एमआरआइ सहित कई अन्य जरूरी जांच की ही व्यवस्था नहीं है, जिसे बाहर से कराना हम जैसों पर भारी पड़ता है. अगर सब बच्चों को समय से खून उपलब्ध हो, दवाएं मिलें, निशुल्क एमआरआइ और जरूरी जांच की सुविधा मिले, तो सभी पीड़ित मां-बाप के लिए राहत होगी.

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क्या तमिलनाडु में प्रशासन बना पाएंगे विजय या फिर एआईएडीएमके के सहयोग से बनेगा कोई नया समीकरण?

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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