Chola Copper Plates : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात के 134वें एपिसोड में चोल साम्राज्य की कॉपर प्लेट्स का जिक्र किया. उन्होंने बताया कि जब वे नीदरलैंड की यात्रा पर गए थे, उसी दौरान उन्हें चोल युगीन ताम्र पत्र दिए गए. पीएम मोदी ने बताया कि इन ताम्र पत्रों को 300 साल बाद हिंदुस्तान वापस लाया गया है. यह ताम्रपत्र हिंदुस्तानीय सभ्यता और संस्कृति का प्रतीक हैं. पीएम मोदी ने कहा कि हिंदुस्तान वापस लाई गई चोल-युग की प्लेटों में 21 बड़ी और तीन छोटी तांबे की प्लेटें शामिल हैं. आइए जानते हैं इन ताम्र पत्रों की और राजा राजेंद्र चोल की खासियत, जिनके शासन की खूबियां इन प्लेटों में दर्ज है.
चोल युग की 21 बड़ी और 3 छोटी प्लेटें पीएम मोदी को सौंपी गई

नीदरलैंड में पीएम मोदी को चोल राजवंश के शासनकाल की कुल 24 प्लेटें सौंपी गईं. इन प्लेटों में 21 बड़ी और 3 छोटी प्लेटें शामिल हैं. इन ताम्र पत्रों का वजन 30 किलोग्राम है. इन ताम्र पत्रों को कांसे के छल्ले से बांधा गया है, जिस पर चोल राजवंश की शाही मुहर लगी हुई है.यह ताम्र पत्र 11 शताब्दी की हैं. उस वक्त दक्षिण में चोल राजाओं का शासन था और राजेंद्र चोल के हाथों में कमान थी. वे चोल शासक राजराजा चोल के बेटे थे. इन पट्टिकाओं में तमिल और संस्कृत में उस काल की महत्वपूर्ण बातें लिखी हुई हैं. इन प्लेटों में नागपट्टिनम के पास अनाइमंगलम गांव को बौद्ध विहार, चूड़ामणि विहार के रखरखाव के लिए दी गई स्थायी जमीन और रेवेन्यू ग्रांट का रिकॉर्ड है. राजराजा ने यह आदेश बोलकर जारी किया था. उनके बेटे राजेंद्र चोल ने इस ऑर्डर को तांबे की प्लेटों पर औपचारिक रूप से लिखवाया था ताकि उनके दान को स्थायी कानूनी और शाही अधिकार मिल सके. इन ताम्र पत्रों में चोल वंश की समुद्री ताकत और दक्षिण एशियाई देशों से उनके संबंधों का भी उल्लेख है. इतिहासकार इन ताम्रपत्रों को चोल साम्राज्य की सबसे महत्वपूर्ण अभिलेखों में से एक मानते हैं.
ये ताम्रपत्र नीदरलैंड कैसे पहुंचे?
चोल कालीन ताम्र पत्र आखिर हिंदुस्तान से नीदरलैंड कैसे पहुंचे? यह सवाल सबके मन में उठता है, तो आप यह जान लें कि 17वीं-18वीं सदी में नागपट्टिनम क्षेत्र डच नियंत्रण में था, तब ये ताम्रपत्र वहां से नीदरलैंड ले जाए गए. बाद में उन्हें लीडेन विश्वविद्यालय( Leiden University) के संग्रह का हिस्सा बनाया गया. हिंदुस्तान 2012 से इन्हें वापस लाने की कोशिश कर रहा था और 2026 में सफलता मिली है.
राजेंद्र चोल कौन थे?
चोल साम्राज्य दक्षिण हिंदुस्तान के सबसे अधिक शक्तिशाली साम्राज्यों में से एक था. राजेंद्र चोल उसके सबसे प्रसिद्ध शासकों में से एक थे. वे महान चोल सम्राट राजराजा चोल प्रथम के बेटे थे. उन्होंने लगभग 1014 से 1044 ईस्वी तक शासन किया और चोल साम्राज्य को शिखर तक पहुंचाया. राजेंद्र चोल ने दक्षिण हिंदुस्तान से निकलकर पूर्वी हिंदुस्तान तक सैन्य अभियान चलाया और गंगा क्षेत्र तक अपनी शक्ति का विस्तार किया. उन्होंने पाल राजवंश के साथ युद्ध किया था और उनसे काफी संपत्ति जीती थी. इसी जीत की याद में उन्होंने गंगैकोंड चोलपुरम नामक नई राजधानी बसाई, जिसका अर्थ है -गंगा को जीतने वाला चोल राजा. राजेंद्र चोल ने पूरे दक्षिण हिंदुस्तान में अपनी सत्ता जमाने के बाद अपनी नौसेना को मजबूत किया, जिसके लिए उनकी ख्याति बहुत ज्यादा है. दक्षिण एशियाई देशों के साथ उनके व्यापार और युद्ध की खूब चर्चा होती है. उन्होंने दक्षिण-पूर्व एशिया तक नौसैनिक अभियान चलाए और उस समय के शक्तिशाली श्रीविजय साम्राज्य को चुनौती दी थी. यह साम्राज्य आधुनिक इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप पर स्थित एक शक्तिशाली और समृद्ध मलय बौद्ध समुद्री साम्राज्य था. मजबूत समुद्री ताकत की वजह से चोल साम्राज्य का व्यापार और प्रभाव हिंदुस्तान से बाहर तक फैल गया.राजेंद्र चोल को इतिहासकार हिंदुस्तान के सबसे सफल समुद्री और साम्राज्यवादी शासकों में गिनते हैं. राजेंद्र चोल ने अपना प्रभाव हिंद महासागर में स्थापित कर लिया था.
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