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Om Birla: कोलकाता/नई दिल्ली. लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों के एनसीपीआई में प्रस्तावित विलय के बाद कानूनी राय ले सकते हैं. संसद के मानसून सत्र से पहले निर्णय लिया जाएगा, जो जुलाई के तीसरे सप्ताह में शुरू होता है. इस मामले में पहले ही विशेषज्ञों ने संविधान के कुछ प्रावधानों का हवाला देते हुए मौजूदा विलय पर सवाल उठाए हैं. ऐसे में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला तृणमूल कांग्रेस के बागी सांसदों के एनसीपीआई में प्रस्तावित विलय के बाद उन्हें अलग समूह के रूप में मान्यता देने की मांग पर कानूनी राय ले सकते हैं.
मॉनसून सत्र से पहले आयेगा फैसला
लोकसभा सचिवालय के सूत्रों ने बताया कि टीएमसी के बागी सांसदों की मांग पर कोई भी फैसला संसद के मॉनसून सत्र से पहले लिया जाएगा, जो सामान्य जुलाई के तीसरे सप्ताह में शुरू होता है. उन्होंने ने कहा कि बागी सांसदों की मांग पर निर्णय केंद्रीय विधि मंत्रालय की लिखित राय के आधार पर लिया जाएगा. मंत्रालय किसी वरिष्ठ विधि अधिकारी से परामर्श के बाद अपनी राय देगा. सूत्रों के अनुसार, लिखित कानूनी राय ली जाएगी, ताकि यदि लोकसभा अध्यक्ष के अंतिम निर्णय को अदालत में चुनौती दी जाती है, तो वह न्यायिक जांच-परख की कसौटी पर खरा उतर सके.
विशेषज्ञों ने सवाल उठाए
इस बीच, लोकसभा के पूर्व महासचिव और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ पीडीटी आचारी ने संविधान की 10वीं अनुसूची के पैरा-4 का हवाला देते हुए कहा कि केवल कोई नेतृत्वक दल ही दूसरे नेतृत्वक दल में विलय कर सकता है. केवल सांसद या विधायक ऐसा नहीं कर सकते हैं. आचार्य ने कहा कि यदि किसी नेतृत्वक दल का नेतृत्व दूसरे नेतृत्वक दल में विलय का फैसला करता है, तो उसके सांसदों और विधायकों को उस विलय से सहमत होना होता है, लेकिन केवल सांसद या विधायक अपने स्तर पर किसी दूसरे नेतृत्वक दल में विलय नहीं कर सकते. संविधान में यही प्रावधान है.
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कानून की नजर में विलय नया प्रयोग
निर्वाचन आयोग के एक पूर्व अधिकारी ने टीएमसी के बागी सांसदों की एनसीपीआई में विलय की मौजूदा योजना को नया प्रयोग बताया. उन्होंने ने कहा कि ऐसी व्यवस्था का उल्लेख ना तो दलबदल विरोधी कानून में है और न ही जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में है. उन्होंने कहा कि कानून की नजर में यह विलय अवैध है, लेकिन इसकी वैधता की जांच का काल अवधि क्या होगी यह निश्चित नहीं है. ऐसे में इस मामले का फैसला टाला जा सकता है.
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