स्वप्निल श्रीवास्तव
Mumbai : हमारी सुबह जिन चेहरों की खामोश मेहनत से रोशन होती है- जो हमारे जागने से पहले घर बुहार जाते हैं, चाय का पहला कप थमाते हैं और बच्चों को संभालते हैं. क्या हम कभी उन घरेलू कामगारों के सुरक्षित भविष्य के बारे में सोचते हैं? मुंबई के रहने वाले 17 वर्षीय अयान वाधवा ने न सिर्फ यह सोचा, बल्कि एक अभूतपूर्व बदलाव की नींव रख दी. इस कहानी की शुरुआत उनके अपने घर के दरवाजे पर हुई, जब उनके यहां काम करने वाली स्त्री ने बीमार मां के इलाज के लिए अयान की मां से कर्ज मांगा. उस असहज करने वाले पल ने अयान को झकझोर दिया. उसने सोचा कि यदि उनका परिवार मदद न करता, तो उस स्त्री का क्या होता? यहीं से अयान की क्रमिक जिज्ञासा एक बड़े आंदोलन में बदल गयी.
करा चुके हैं 700 से अधिक पंजीकरण
उसने रिसर्च किया तो पाया कि प्रशासन ने असंगठित क्षेत्र के कामगारों के लिए ‘ई-श्रम कार्ड’ जैसी कई कल्याणकारी योजनाएं बनाई हैं, जो दुर्घटना बीमा, आवास अनुदान और पेंशन की गारंटी देती हैं. लेकिन, इन कामगारों को इसकी भनक तक नहीं थी. अपनी मां पिंकी पंजवानी के सहयोग से 15 साल की उम्र से ही अयान ने शून्य से शुरुआत की. उसने जटिल प्रशासनी योजनाओं को सरल भाषा में ढालकर हिंदी और मराठी में बुकलेट तैयार किया और हाउसिंग सोसायटियों में वर्कशॉप आयोजित करने लगा. साल 2026 की शुरुआत से अब तक अयान मुंबई में पांच वर्कशॉप के जरिए 750 से अधिक घरेलू कामगारों का पंजीकरण इन योजनाओं में करा चुके हैं.
आसान नहीं थी राह, आईं तमाम मुश्किलें
अयान ने जब घरेलू कामगारों का पंजीकरण विभिन्न योजनाओं में करना शुरू किया, तो उनके सामने तमाम दिक्कतें आयीं. कामगारों को जानकारी ही नहीं थी कि पहचान पत्रों में दर्ज गलत विवरणों को कैसे सुधारा जाए. पहचान नंबर से अन्य जरूरी दस्तावेजों और बैंक खातों को जोड़ने की प्रक्रिया से वे पूरी तरह अनजान थे. कई स्त्रीओं के पहचान पत्र उनके पतियों के मोबाइल नंबर से लिंक थे, जिससे पंजीकरण के समय रियल-टाइम में ओटीपी प्राप्त करने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ती थी.
एक कैंप से बदल गया जीवन
पश्चिमी मुंबई के वंचित समुदाय से आने वाली 32 वर्षीय मनीषा ढेकडे पिछले 10 सालों से घरेलू सहायिका के रूप में काम कर रही हैं. बिना किसी पेड-लीव या मेडिकल सुरक्षा के छह दिन काम करने वाली मनीषा को मौखिक प्रचार से अयान के कैंप का पता चला. मनीषा कहती हैं, ‘पहले मुझे ई-श्रम कार्ड या पोस्ट ऑफिस बचत योजनाओं के बारे में कुछ पता नहीं था. कैंप में एक शिशु ने लैपटॉप लेकर मुझे सब कुछ बहुत धैर्य से सिखाया.’ आज मनीषा के पास न केवल अपना ई-श्रम कार्ड है, बल्कि प्रशासनी लाभ भी सीधे उनके घर तक पहुंच रहे हैं.
इंटरनेशनल स्तर पर सराहना, ग्लोबल फंड से मिला 1.6 लाख का अनुदान
अयान वाधवा की इस मुहिम ‘वर्कर्स ऑफ इंडिया’ की गूंज अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सुनाई दे रही है. दुनिया भर से आए 1,100 से अधिक छात्र-नेतृत्व वाले आवेदनों में से चुनिंदा 100 प्रोजेक्ट्स में अयान के प्रोजेक्ट को चुना गया है. इसके तहत उन्हें ‘ग्लोबल यूथ एक्शन फंड’ से लगभग 1.6 लाख रुपये का अनुदान मिला है. इस राशि का उपयोग वे एक एआई-पावर्ड व्हाट्सएप चैटबॉट विकसित करने में कर रहे हैं, जहां कामगार केवल अपनी भाषा में वॉयस नोट भेजकर अपना रोजगार अनुबंध तैयार कर सकेंगे.
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