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रीतब्रत बनर्जी को और समय न दें, तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग को लिखी चिट्ठी

WB Politics News: तृणमूल कांग्रेस (TMC) में वर्चस्व और संगठन पर अधिकार हासिल करने को लेकर शुरू हुआ विवाद नये मोड़ पर है. पार्टी की संस्थापक ममता बनर्जी ने निर्वाचन आयोग (ECI) को पत्र लिखकर मांग की है कि बागी गुट के नेता रीतब्रत बनर्जी को संगठनात्मक दावों पर जवाब दाखिल करने के लिए और समय न दिया जाये.

2 जुलाई को आयोग पहुंचा था रीतब्रत बनर्जी गुट

रीतब्रत बनर्जी की अगुवाई में बागी गुट ने 2 जुलाई को खुद को ‘असली’ अखिल हिंदुस्तानीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) बताते हुए निर्वाचन आयोग का रुख किया था. बागी गुट ने दावा किया था कि 22 जून के विशेष अधिवेशन के बाद उन्होंने पार्टी संगठन में बदलाव किये हैं. पार्टी ने आयोग से अपील की थी कि उन्हें आधिकारिक रूप से मान्यता प्रदान की जाये.

ममता का आरोप- आयोग का झुकाव बागी गुट की तरफ

निर्वाचन आयोग ने इस विवाद पर ममता बनर्जी और रीतब्रत बनर्जी दोनों पक्षों से जवाब मांगा था. ममता बनर्जी गुट ने निर्धारित समय के भीतर 6 जुलाई को ही अपना विस्तृत जवाब सौंप दिया. रीतब्रत गुट को 10 जुलाई शाम 5:30 बजे तक का अतिरिक्त समय मिला था.

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ममता बनर्जी ने आयोग को लिखा पत्र

ममता बनर्जी ने 12 जुलाई को इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया को एक पत्र लिखा. इसमें कहा कि 10 जुलाई की तय समयसीमा बीत जाने के 48 घंटे बाद भी रीतब्रत बनर्जी की तरफ से कोई जवाब साझा नहीं किया गया है. जब हमें जवाब देने के लिए केवल ढाई दिन मिले थे, तो समयसीमा खत्म होने के बाद भी रीतब्रत बनर्जी की ओर से जवाब नहीं मिलने पर आयोग चुप क्यों है. यह दिखाता है कि आयोग का झुकाव रीतब्रत के दुर्भावनापूर्ण इरादों की तरफ है. उन्होंने आयोग से आग्रह किया कि उनके जवाब पर तुरंत विचार किया जाये और बागी गुट को अब किसी भी परिस्थिति में रियायत या अधिक समय न दिया जाये.

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2027 तक वैध हैं पार्टी की वर्तमान समितियां : ममता

इससे पहले निर्वाचन आयोग को सौंपे गये अपने आधिकारिक पत्र में ममता बनर्जी नीत तृणमूल कांग्रेस ने बागी गुट के दावों को पूरी तरह खारिज कर दिया था. पार्टी ने कहा था कि तृणमूल के संविधान के अनुसार, अंतिम संगठनात्मक चुनाव वर्ष 2022 में हुए थे. इसके तहत पार्टी की सभी मौजूदा समितियां और पदाधिकारी वर्ष 2027 तक पूरी तरह वैध हैं. ममता गुट ने कहा कि प्रतिद्वंद्वी गुट का यह तर्क तथ्यात्मक और कानूनी दोनों रूप से बेबुनियाद है कि समितियों का कार्यकाल वर्ष 2025 में समाप्त हो चुका है.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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