जमशेदपुर: आज जहां युवाओं में बड़ी कंपनियों में नौकरी पाने और लाखों रुपये का पैकेज हासिल करने की होड़ मची हुई है. वहीं, जमशेदपुर के परसुडीह के रहने वाले 26 साल के प्रतीक सिंह ने करीब 10 लाख रुपये के पैकेज वाली नौकरी को छोड़कर देश सेवा का रास्ता चुना. कंप्यूटर साइंस में बीटेक करने के बाद प्रतीक ने ईवाई इंडिया और डेलॉयट जैसी बड़ी कंपनियों में डेटा एनालिस्ट के तौर पर काम किया. लेकिन दो साल की नौकरी के बाद उन्हें एहसास हुआ कि यही काम वह पूरी जिंदगी नहीं करना चाहते.
इसके बाद उन्होंने नौकरी छोड़कर सेना में जाने का फैसला किया. खास बात यह रही कि प्रतीक के इस फैसले और उनकी तैयारी की जानकारी उनके माता-पिता तक को नहीं थी. उन्होंने अपने पास मौजूद पैसों से दिल्ली में रहकर तैयारी शुरू की और एसएससी टेक के जरिए एसएसबी की परीक्षा दी. जून 2026 में दिया गया उनका दूसरा प्रयास उम्र के हिसाब से आखिरी मौका था. इस आखिरी मौके का उन्होंने अच्छे से फायदा उठाया और सेना में नौकरी हासिल की.
डीबीएमएस से शुरू हुई पढ़ाई
प्रतीक सिंह का जन्म 26 मार्च 2001 को हुआ. वह जमशेदपुर के परसुडीह हाउसिंग कॉलोनी के रहने वाले हैं. उनकी दसवीं तक की पढ़ाई डीबीएमएस इंग्लिश स्कूल से हुई. इसके बाद उन्होंने बिष्टुपुर स्थित श्रीकृष्ण पब्लिक स्कूल से 11वीं और 12वीं की पढ़ाई की. 12वीं में उन्होंने साइंस विषय लिया.
इसके बाद प्रतीक ने भुवनेश्वर के एसओए यूनिवर्सिटी से कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग में बीटेक किया और वर्ष 2023 में उनकी पढ़ाई पूरी हुई.
डेटा एनालिस्ट के तौर पर किया काम
बीटेक के बाद प्रतीक ने ईवाई इंडिया में डेटा एनालिस्ट के तौर पर करीब एक साल काम किया. इसके बाद उन्होंने डेलॉयट इंडिया ज्वाइन की और वहां भी करीब एक साल तक डेटा एनालिस्ट के तौर पर काम किया. दोनों नौकरियां गुरुग्राम में थीं.
इसके बाद प्रतीक स्काइडाइविंग के लिए हरियाणा के नारनौल गए. यहीं उनकी मुलाकात ब्रिगेडियर सौरभ सिंह शेखावत से हुई. सेना से जुड़े लोगों के साथ बातचीत और उनके अनुभवों को करीब से समझने के बाद प्रतीक को लगने लगा कि सेना का जीवन ही उनके लिए सही हो सकता है. यहीं से उनके मन में सेना में जाने का फैसला मजबूत होता गया.
बहन बनी सबसे बड़ी स्पोर्ट सिस्टम
प्रतीक के माता-पिता को उनके सेना में जाने की तैयारी के बारे में चयन होने से पहले तक कोई जानकारी नहीं थी. जब उनका चयन हो गया और मेडिकल की प्रक्रिया शुरू हुई, तब उन्होंने अपने माता-पिता को बताया कि उनका चयन हो गया है. यानी जिस तैयारी को प्रतीक ने परिवार से छिपाकर शुरू किया था, उसकी सफलता की समाचार उन्होंने मेडिकल के समय अपने परिवार के साथ साझा की. उनके पिता शलेंद्र सिंह रेलवे में प्रशासनी पद पर कार्यरत रहे हैं और मां प्रतीमा सिंह गृहिणी हैं.
‘इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’ में भी दर्ज है नाम
प्रतीक को बचपन से ही स्पोर्ट्सकूद और फिटनेस में काफी रुचि रही है. पुश-अप्स में उनके प्रदर्शन के लिए उनका नाम इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स में भी दर्ज किया गया है. उन्हें घुड़सवारी, तैराकी और स्काई-डाइविंग का भी शौक है.
सोशल मीडिया को मानते हैं बड़ा डिस्ट्रैक्शन
प्रतीक सोशल मीडिया पर सक्रिय नहीं हैं. वह व्हाट्सऐप के अलावा किसी सोशल मीडिया मंच का इस्तेमाल नहीं करते. उनका मानना है कि फोन और सोशल मीडिया का सही इस्तेमाल किया जाए तो यह उपयोगी हो सकता है, लेकिन गलत तरीके से इस्तेमाल होने पर खासकर विद्यार्थियों के लिए यह बड़ा डिस्ट्रैक्शन बन सकता है.
‘लेजर जैसा फोकस जरूरी है’: प्रतीक
प्रतीक अपनी सफलता का सबसे बड़ा मंत्र फोकस को मानते हैं. उनका मानना है कि अगर किसी व्यक्ति का ध्यान एक ही लक्ष्य पर लेजर की तरह केंद्रित हो और वह लगातार उसी दिशा में मेहनत करता रहे, तो सफलता हासिल की जा सकती है.
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