Tiger Pataudi Death Anniversary: हिंदुस्तानीय क्रिकेट में कुछ नाम सिर्फ आंकड़ों की वजह से याद नहीं किए जाते, बल्कि इसलिए याद रहते हैं क्योंकि उन्होंने स्पोर्ट्स को देखने का नजरिया बदल दिया. मंसूर अली खान पटौदी भी ऐसा ही एक नाम थे. क्रिकेट की दुनिया उन्हें प्यार से ‘टाइगर पटौदी’ कहती थी. 22 सितंबर 2011 को 70 साल की उम्र में उनके निधन के साथ हिंदुस्तानीय क्रिकेट ने अपने सबसे अलग कप्तानों में से एक को खो दिया था.
22 सितंबर 2026 को उनके निधन को 15 साल पूरे हो रहे हैं. उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करने की सबसे खास वजह सिर्फ उनके रिकॉर्ड नहीं हैं. उनकी कहानी उस जिद और हिम्मत की है, जिसके दम पर उन्होंने एक बड़े हादसे के बाद भी क्रिकेट स्पोर्ट्सना जारी रखा और आगे चलकर हिंदुस्तानीय टीम की कप्तानी तक पहुंची.
21 साल की उम्र में संभाली टीम इंडिया की कमान
मंसूर अली खान पटौदी ने जब हिंदुस्तानीय टीम की कप्तानी संभाली, तब उनकी उम्र सिर्फ 21 साल और 77 दिन थी. मार्च 1962 में वेस्टइंडीज दौरे के दौरान नियमित कप्तान नारी कॉन्ट्रैक्टर के चोटिल होने के बाद पटौदी को टीम की कमान सौंपी गई थी. वह लंबे समय तक हिंदुस्तान के सबसे युवा टेस्ट कप्तान रहे.
कप्तानी मिलने के समय उन्होंने सिर्फ तीन टेस्ट मैच स्पोर्ट्से थे. इसके बावजूद पटौदी ने जिम्मेदारी संभाली और आने वाले वर्षों में हिंदुस्तानीय क्रिकेट की पहचान बदलने वाले कप्तानों में शामिल हो गए. उन्होंने हिंदुस्तान के लिए कुल 46 टेस्ट मैच स्पोर्ट्से और इनमें से 40 में टीम की कप्तानी की. उनके नाम टेस्ट क्रिकेट में 2,793 रन और छह शतक दर्ज हैं.
एक हादसे ने छीन ली दाईं आंख की रोशनी
पटौदी की कहानी को खास बनाने वाला सबसे बड़ा अध्याय उनके क्रिकेट करियर का एक दर्दनाक हादसा है.
1961 में इंग्लैंड में एक कार दुर्घटना के दौरान विंडस्क्रीन का एक टुकड़ा उनकी दाईं आंख में जा लगा. उनकी आंख की रोशनी चली गई और कुछ समय के लिए यह सवाल खड़ा हो गया कि क्या वह दोबारा क्रिकेट स्पोर्ट्स पाएंगे. लेकिन पटौदी ने क्रिकेट छोड़ने के बजाय एक नई चुनौती स्वीकार की. अभ्यास के दौरान उन्हें गेंद दो दिखाई देती थी. इससे बचने के लिए वह अपनी कैप को इस तरह रखते थे कि उनकी दाईं आंख ढकी रहे और वह बाईं आंख से गेंद पर ध्यान लगा सकें.
हादसे के कुछ ही महीनों बाद उन्होंने टेस्ट क्रिकेट में वापसी की. दिसंबर 1961 में इंग्लैंड के खिलाफ दिल्ली में उन्होंने हिंदुस्तान के लिए टेस्ट डेब्यू किया और अपनी तीसरी टेस्ट पारी में चेन्नई में शतक जड़ा. यही वजह है कि पटौदी की कहानी सिर्फ क्रिकेट के आंकड़ों की कहानी नहीं है. यह उस खिलाड़ी की कहानी है जिसने मुश्किल परिस्थिति को अपने करियर का अंत नहीं बनने दिया.
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हिंदुस्तान को दिलाई विदेशी जमीन पर पहली टेस्ट सीरीज जीत
| टेस्ट रिकॉर्ड | आंकड़े |
| मैच | 46 |
| पारियां | 83 |
| रन | 2793 |
| गेंदें | 1774 |
| सर्वोच्च स्कोर | 203 |
| औसत | 34.91 |
| स्ट्राइक रेट | 157.45 |
| नाबाद | 3 |
| 50+ स्कोर | 16 |
| शतक | 6 |
| दोहरा शतक | 1 |
| विकेट | 1 |
पटौदी की कप्तानी का सबसे बड़ा अध्याय 1967-68 में आया. न्यूजीलैंड दौरे पर उनकी अगुवाई में हिंदुस्तान ने चार मैचों की टेस्ट सीरीज 3-1 से जीती. यह हिंदुस्तानीय क्रिकेट के लिए ऐतिहासिक उपलब्धि थी. हिंदुस्तान ने पहली बार विदेशी जमीन पर टेस्ट मैच जीता और उसी दौरे पर पहली विदेशी टेस्ट सीरीज भी अपने नाम की. पटौदी की कप्तानी की खास बात यह थी कि उन्होंने हिंदुस्तानीय टीम की ताकत को समझने की कोशिश की. तेज गेंदबाजी के बजाय स्पिन पर भरोसा और बेहतर फील्डिंग पर जोर उस दौर की उनकी रणनीति का हिस्सा था.
मैदान पर आक्रामक, बाहर शाही अंदाज
पटौदी सिर्फ कप्तान ही नहीं, अपने दौर के बेहद चर्चित क्रिकेटरों में भी शामिल थे. वह पटौदी के शाही परिवार से आते थे और उनके पिता इफ्तिखार अली खान पटौदी भी हिंदुस्तान और इंग्लैंड के लिए टेस्ट क्रिकेट स्पोर्ट्स चुके थे. लेकिन मैदान पर पटौदी की पहचान उनकी शाही पृष्ठभूमि से ज्यादा उनके आत्मविश्वास और आक्रामक रवैये से बनी.
उनके पूर्व साथी फारुख इंजीनियर ने भी उनके व्यक्तित्व को याद करते हुए कहा था कि वह सम्मान हासिल करते थे और खुद को राजसी अंदाज में रखते थे.
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उनके निधन पर क्रिकेट जगत ने जताया था दुख
22 सितंबर 2011 को पटौदी का दिल्ली में निधन हुआ था. वह इंटरस्टिशियल लंग डिजीज से जूझ रहे थे और इलाज के दौरान उनकी हालत गंभीर हो गई थी. BCCI ने उनके निधन की पुष्टि करते हुए उन्हें हिंदुस्तानीय क्रिकेट का मार्गदर्शक और बेहतरीन कप्तान बताया था.
उनके निधन पर क्रिकेट जगत के कई दिग्गजों ने उन्हें याद किया. सचिन तेंदुलकर ने पटौदी को अपना ‘हीरो’ बताते हुए उनके निधन को क्रिकेट जगत के लिए बड़ा नुकसान कहा था. सुनील गावस्कर ने भी पटौदी को श्रद्धांजलि देते हुए उनकी एक आंख की रोशनी चले जाने के बावजूद लगभग 3,000 टेस्ट रन और छह शतक बनाने की उपलब्धि को असाधारण बताया था.
आज भी याद किए जाते हैं ‘टाइगर’
पटौदी के निधन के बाद BCCI ने उनके सम्मान में Mansoor Ali Khan Pataudi Memorial Lecture शुरू किया. 2013 में इसकी पहली कड़ी में सुनील गावस्कर ने व्याख्यान दिया था. वहीं, पटौदी को 1964 में अर्जुन पुरस्कार और 1967 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया था. क्रिकेट के मैदान पर अपनी अलग पहचान बनाने वाले पटौदी की विरासत आज भी कायम है. उनके बेटे सैफ अली खान ने भी अपने पिता से अलग क्षेत्र में पहचान बनाई और आज वह बॉलीवुड के स्टार अभिनेताओं की सूची में शामिल हैं.
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