दुनिया का नक्शा देखकर हमें लगता है कि असल दुनियां ऐसी ही होंगी, लेकिन हम या आप जिस नक्शा से दुनियां की असल तस्वीर की कल्पना करते हैं वो 100 फीसदी नहीं होता है. वास्तविक तौर पर उसकी छवि अलग होती है. आज दुनिया को जानने और समझने के लिए हम जिस नक्शे का इस्तेमाल करते हैं वो करीब 450 साल से इस्तेमाल हो रहे मर्केटर द्वारा तैयार किया गया था.
अब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने इस तस्वीर को बदलने की पहल की है, 4 सितंबर 2026 को महासभा ने करेक्ट द मैप प्रस्ताव को मंजूरी दी. इसमें ऐसे नक्शों के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की बात कही गई है, जिनमें दुनिया के महाद्वीपों का आकार असल क्षेत्रफल के ज्यादा करीब दिखे. इनमें खास तौर पर इक्वल अर्थ नक्शे का जिक्र है. इसके पक्ष में 164 देशों ने वोट किया, अमेरिका ने विरोध किया और 6 देश मतदान से दूर रहे. हालांकि संयुक्त राष्ट्र का यह प्रस्ताव कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है.
क्या है इक्वल अर्थ नक्शा?
- इक्वल अर्थ एक ऐसा मानचित्र प्रक्षेपण है, जिसमें अलग-अलग जगहों का क्षेत्रफल वास्तविक आकार के ज्यादा करीब रखने की कोशिश की गई है.
- इसे कार्टोग्राफरों बोजन शाव्रिच, टॉम पैटरसन और बर्नहार्ड जेनी ने 2018 में तैयार किया था. इस नक्शे में अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका, दक्षिण एशिया और ओशिनिया पहले की तुलना में ज्यादा बड़े दिखाई देते हैं.
- दूसरी तरफ उत्तरी हिस्सों में मौजूद यूरोप और उत्तरी अमेरिका का आकार अपेक्षाकृत छोटा नजर आता है.
नए नक्शे में कहां दिखेगा हिंदुस्तान और पाकिस्तान ?
- अब सवाल आता है कि नए नक्शे में हिंदुस्तान और पाकिस्तान कैसे दिखेंगे? क्या दोनों देशों की जगह बदल जाएगी? इसका सीधा जवाब है नहीं.
- हिंदुस्तान और पाकिस्तान जहां आज हैं, नए नक्शे में भी वहीं रहेंगे. उनकी सीमाओं में कोई बदलाव नहीं होगा. यानी ऐसा बिल्कुल नहीं है कि नया नक्शा आने के बाद हिंदुस्तान या पाकिस्तान की जमीन बढ़ जाएगी या कम हो जाएगी. फर्क सिर्फ इतना होगा कि नक्शे पर हिंदुस्तान और पाकिस्तान का आकार दूसरे देशों के मुकाबले ज्यादा सही नजर आएगा.
- दरअसल, पुराने मर्केटर नक्शे में धरती के ऊपरी और निचले हिस्से के देश असल से काफी बड़े दिखाई देते हैं. इसकी वजह यह है कि हमारी धरती गोल है, लेकिन नक्शा कागज के एक सपाट पन्ने पर बनाया जाता है. इसे कागज पर उतारते समय कुछ जगहों का आकार बढ़ जाता है और कुछ जगहों का छोटा दिखाई देने लगता है.
- हालांकि भूमध्य रेखा के पास होने के कारण हिंदुस्तान और पाकिस्तान के साथ ऐसी गड़बड़ी नहीं होती, जैसी ग्रीनलैंड या उत्तरी ध्रुव के आसपास के इलाकों के साथ होती है. फिर भी पुराने नक्शे में दोनों देशों का आकार बिल्कुल उसी अनुपात में नहीं दिखता, जैसा जमीन पर है.
- इक्वल अर्थ नक्शा में कोशिश की गई है कि किसी देश को सिर्फ उसकी नक्शे वाली जगह की वजह से जरूरत से ज्यादा बड़ा न दिखाया जाए, यानी जिस देश की जमीन असल में जितनी बड़ी है, नक्शे पर भी उसका आकार उसी के करीब दिखाई दे.
- इसका मतलब यह भी नहीं है कि हिंदुस्तान के लिए नक्शे पर बहुत बड़ा दिखाई देने लगेगा और इसी तरह पाकिस्तान भी अचानक बड़ा या छोटा नहीं हो जाएगा. दोनों देशों के आकार में कोई जमीन पर बदलाव नहीं होगा. सिर्फ दूसरे देशों के साथ तुलना करने पर उनका आकार ज्यादा सही नजर आएगा.
तो क्या अब मर्केटर नक्शा खत्म हो जाएगा?
- नहीं, मर्केटर नक्शे का इस्तेमाल पूरी तरह बंद नहीं होगा. यह नक्शा समुद्री और हवाई दिशा-निर्धारण जैसे कामों में आज भी उपयोगी है, क्योंकि इसमें दिशा और कोण को खास तरीके से दिखाया जाता है.असल बदलाव सामान्य दुनिया के नक्शे में लाने की कोशिश है.
- आने वाले समय में स्कूलों, किताबों, मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर इक्वल अर्थ जैसे नक्शों का इस्तेमाल बढ़ सकता है. उदाहरण के लिए हिंदुस्तान और पाकिस्तान अपनी जगह पर ही रहेंगे, लेकिन उन्हें दुनिया के नक्शे पर देखने का तरीका बदल सकता है.
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