हिंदुस्तान के विकास की कहानी में स्त्रीओं की भूमिका को लेकर नीति का फोकस पिछले कुछ वर्षों में बदला है. पहले सवाल मुख्य रूप से यह था कि स्त्रीओं तक प्रशासनी योजनाओं का लाभ कैसे पहुंचे. अब इसके साथ यह सवाल भी जुड़ गया है कि स्त्रीएं कमाने वाली, उद्यमी, किसान, तकनीकी कामगार और नेतृत्वक निर्णयकर्ता कैसे बनें.
इसी सोच को केंद्र में रखते हुए प्रशासन ‘Women-Led Development’ को Viksit Bharat @2047 के बड़े लक्ष्यों से जोड़ती है. यानी 2047 तक विकसित हिंदुस्तान की कल्पना में स्त्रीओं की आर्थिक और सामाजिक भागीदारी को एक अहम घटक माना जा रहा है.
Drone Didi से Digital Didi तक
स्त्री उद्यमिता को पारंपरिक कामों से आगे ले जाने की कोशिश भी दिखाई देती है.
NaMo Drone Didi जैसी पहल में स्त्री SHGs को कृषि में ड्रोन सेवाओं से जोड़ने का प्रयास किया गया. प्रशासन ने 15,000 चयनित स्त्री SHGs को ड्रोन उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा था.
इसका प्रतीकात्मक महत्व भी है—ग्रामीण स्त्री को केवल स्वयं सहायता समूह की सदस्य नहीं, बल्कि टेक्नोलॉजी आधारित सेवा देने वाली उद्यमी के रूप में देखने की कोशिश.
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बैंक खाता, ऋण और आर्थिक पहचान
स्त्री सशक्तीकरण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा वित्तीय समावेशन है. बैंक खाता, डिजिटल भुगतान, SHG बैंक क्रेडिट और छोटे कारोबार के लिए ऋण स्त्रीओं को आर्थिक निर्णयों में अधिक स्वतंत्रता दे सकते हैं.
DAY-NRLM से जुड़े SHGs ने अब तक ₹12 लाख करोड़ से अधिक बैंक क्रेडिट तक पहुंच बनाई है. प्रशासनी आंकड़ों के अनुसार, 50 हजार से अधिक प्रशिक्षित Bank Sakhis ग्रामीण स्त्रीओं को बैंकिंग सेवाओं और ऋण तक पहुंच में मदद कर रही हैं.
इसका असर केवल एक स्त्री की आय तक सीमित नहीं रहता. जब स्त्री की अपनी आर्थिक पहचान मजबूत होती है तो परिवार के खर्च, बच्चों की शिक्षा और स्थानीय वित्तीय स्थिति में भी उसका प्रभाव बढ़ सकता है.
सुरक्षा और गरिमा भी विकास का हिस्सा
स्त्री-नेतृत्व वाले विकास का अर्थ केवल रोजगार नहीं है. सुरक्षा, कानूनी अधिकार और गरिमा भी इसके महत्वपूर्ण हिस्से हैं.
Mission Shakti के तहत One Stop Centres, Women Helpline और अन्य सहायता तंत्र चलाए जा रहे हैं. इसी व्यापक नीति ढांचे में स्त्रीओं की सुरक्षा और सहायता को जोड़ा गया है.
2019 में मुस्लिम स्त्रीओं के लिए instant triple talaq की प्रथा को कानूनी रूप से अपराध घोषित करने वाला कानून भी लागू हुआ. प्रशासन इसे स्त्रीओं के अधिकार और गरिमा से जुड़ा सुधार बताती है.
नेतृत्व में 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व: लेकिन लागू होने की तारीख अभी बाकी
स्त्रीओं की आर्थिक भागीदारी के बाद सबसे बड़ा सवाल नेतृत्वक प्रतिनिधित्व का है.
2023 में संसद ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम पारित किया. इसके तहत लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में स्त्रीओं के लिए 33% आरक्षण का प्रावधान है.
हालांकि यह प्रावधान तत्काल प्रभाव से लागू नहीं हुआ. कानून के अनुसार इसका क्रियान्वयन संबंधित जनगणना के बाद होने वाली परिसीमन प्रक्रिया से जुड़ा है.
इसलिए स्त्री नेतृत्वक प्रतिनिधित्व के मामले में अगला बड़ा पड़ाव कानून का वास्तविक क्रियान्वयन होगा.
लेकिन असली चुनौती यहीं से शुरू होती है
स्त्रीओं की भागीदारी के आंकड़े बढ़ने के बावजूद कुछ बुनियादी समस्याएं अभी बनी हुई हैं.
- सबसे पहला सवाल रोजगार की गुणवत्ता का है. श्रम बाजार में स्त्रीओं की भागीदारी बढ़ना सकारात्मक संकेत हो सकता है, लेकिन बड़ी संख्या में स्त्रीएं अनौपचारिक, अस्थायी या कम सामाजिक सुरक्षा वाले कामों में रहती हैं.
- दूसरा सवाल है—कौशल और नौकरी के बीच का अंतर. प्रशिक्षण तभी प्रभावी होगा जब वह बाजार की वास्तविक मांग, बेहतर वेतन और करियर की संभावनाओं से जुड़ा हो.
- तीसरी और अक्सर नजरअंदाज की जाने वाली चुनौती है unpaid care work.
हिंदुस्तान के Time Use Survey 2019 के अनुसार घरेलू सदस्यों के लिए बिना भुगतान वाले घरेलू कामों में स्त्रीओं का समय पुरुषों की तुलना में काफी अधिक था. खाना बनाने और भोजन प्रबंधन जैसे कामों में भी स्त्रीओं का औसत समय पुरुषों से कहीं अधिक दर्ज किया गया.
यानी यदि स्त्री के पास नौकरी है, तब भी उसके घर के भीतर काम का बड़ा हिस्सा अक्सर बना रहता है.
अगला चरण: योजना से परिणाम तक
इसलिए 2047 की स्त्री-नेतृत्व वाली विकास यात्रा का अगला सवाल केवल यह नहीं होगा कि कितनी स्त्रीओं को योजना का लाभ मिला?
सवाल यह होगा—
कितनी स्त्रीएं स्थायी आय अर्जित कर रही हैं? कितनी स्त्रीएं formal jobs में पहुंच रही हैं? कितनी स्त्री उद्यमी बाजार से जुड़ पा रही हैं? कितनी स्त्रीओं के पास सामाजिक सुरक्षा है? और कितनी स्त्रीएं परिवार से लेकर संसद तक वास्तविक निर्णय लेने की स्थिति में पहुंच रही हैं?
यही वह अंतर है जो women-centric welfare और women-led development के बीच है.
प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन पर ‘नारी शक्ति’ और ‘विकसित हिंदुस्तान 2047’ की चर्चा इसलिए केवल योजनाओं की सूची नहीं है. यह हिंदुस्तान की विकास रणनीति के उस बदलाव को समझने का अवसर है जिसमें स्त्री को विकास की लाभार्थी के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक परिवर्तन की भागीदार के रूप में देखा जा रहा है.
आने वाले वर्षों में इस दृष्टिकोण की वास्तविक परीक्षा योजनाओं की संख्या से नहीं, बल्कि स्त्रीओं की आय, रोजगार की गुणवत्ता, आर्थिक स्वतंत्रता, सुरक्षा और निर्णय लेने की शक्ति में होने वाले ठोस बदलाव से होगी.
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