जब नरेंद्र मोदी 2014 में हिंदुस्तान के प्रधानमंत्री बने, तब हिंदुस्तान को दुनिया पहले से ही एक Rising Power यानी उभरती हुई शक्ति के रूप में देख रही थी. वित्तीय स्थिति का विस्तार हो रहा था, अमेरिका के साथ रणनीतिक रिश्ते मजबूत हो चुके थे और शीत युद्ध के दौर की गुटनिरपेक्षता की सीमाओं से हिंदुस्तान धीरे-धीरे आगे बढ़ चुका था.
लेकिन मोदी दौर की खासियत यह नहीं थी कि हिंदुस्तान का उदय उनके साथ शुरू हुआ. असली बदलाव हिंदुस्तान की रणनीतिक सोच, महत्वाकांक्षा और आत्मविश्वास में दिखाई देता है.
प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन के मौके पर हिंदुस्तान की विदेश नीति के इसी बदलाव को समझने की कोशिश की है इजरायल की India Expert Dr Lauren Dagan Amoss ने.
अब सवाल ‘क्या हिंदुस्तान बड़ी शक्ति बनेगा?’ से आगे है
हिंदुस्तान के सामने अब सवाल केवल यह नहीं है कि वह एक Major Power बनेगा या नहीं.
बड़ा सवाल यह है कि हिंदुस्तान किस तरह की Major Power बनना चाहता है?
क्या हिंदुस्तान किसी एक वैश्विक शक्ति-गुट के साथ जाएगा या Multi-Alignment जारी रखेगा?
क्या Strategic Autonomy भविष्य में भी उसकी विदेश नीति का केंद्रीय सिद्धांत बनी रहेगी?
क्या Global South की आवाज बनने की कोशिश हिंदुस्तान की स्थायी कूटनीतिक भूमिका बनेगी?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या हिंदुस्तान की बढ़ती रणनीतिक महत्वाकांक्षा को लंबे समय तक आर्थिक, तकनीकी, सैन्य और संस्थागत क्षमता में बदला जा सकेगा?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 76वें जन्मदिन पर हिंदुस्तान की विदेश नीति को देखने का शायद यही सबसे महत्वपूर्ण फ्रेम है.
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