Prashant Kishor : नेतृत्व में चर्चा, खर्चा और परचा का बहुत महत्त्व होता है. परचा और खर्चा तो खैर वक्त की बात है, फिलहाल चर्चा है की प्रशांत किशोर का बांकीपुर से चुनाव लड़ना लगभग तय है. शनिवार 4 जुलाई को जन सुराज पार्टी की कोर कमेटी की बैठक होनी है और फिर इस चर्चे के ऊपर मुहर लग सकती है. चुनाव आयोग की तरफ से कि 30 जुलाई को बिहार की बांकीपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव के लिए मतदान होगा. तो सवाल ये है की क्या प्रशांत किशोर को आत्मबोध हो गया है? बांकीपुर से चुनाव लड़कर वह गलती सुधारी जा रही है जो 2025 चुनाव में ना लड़ कर उन्होंने की थी?
Prashant Kishor : दूसरों की प्रशासन बनाते-बनाते, अब अपनी नेतृत्व चमकाने की बारी?
तमिलनाडु में चुनावी रणनीति बनाकर मुख्यमंत्री को जीत दिलाने के बाद अब लगता है कि प्रशांत किशोर ने अपनी ही नेतृत्वक ब्रांडिंग का प्रोजेक्ट हाथ में ले लिया है. वर्षों तक वे दूसरों की चुनावी नैया पार लगाते रहे, कभी नरेंद्र मोदी, कभी ममता बनर्जी, कभी अरविंद केजरीवाल, तो हाल के दिनों में तमिलनाडु की नेतृत्व में भी उनकी भूमिका चर्चा में रही.
लेकिन सवाल हमेशा यही पूछा जाता रहा कि जो व्यक्ति दूसरों को जीत दिलाने का दावा करता है, वह खुद चुनाव जीतकर क्यों नहीं दिखाता? शायद इसी सवाल का जवाब देने के लिए प्रशांत किशोर ने बिहार की सबसे चर्चित सीटों में से एक बांकीपुर को चुना है. यह सिर्फ एक उपचुनाव नहीं, बल्कि उनकी अपनी नेतृत्वक विश्वसनीयता की परीक्षा भी है.

क्या 2025 की गलती अब सुधारी जा रही है?
2025 के विधानसभा चुनाव में जन सुराज ने लगभग पूरे बिहार में उम्मीदवार उतारे, लेकिन पार्टी का खाता तक नहीं खुल सका. उससे भी बड़ा सवाल यह उठा कि बदलाव की नेतृत्व की बात करने वाले प्रशांत किशोर खुद चुनावी मैदान से दूर क्यों रहे? आलोचकों ने इसे उनकी सबसे बड़ी नेतृत्वक भूल बताया. अब अगर वे बांकीपुर से चुनाव लड़ते हैं, तो इसे उसी गलती को सुधारने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है. फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार उन्होंने कोई आसान सीट नहीं, बल्कि बीजेपी के सबसे मजबूत गढ़ों में से एक को चुना है.
बांकीपुर : सिर्फ एक सीट नहीं, बीजेपी की प्रतिष्ठा है
बांकीपुर (पूर्व में पटना वेस्ट) का नेतृत्वक इतिहास इसे सामान्य विधानसभा सीट नहीं रहने देता. पहले नवीन सिन्हा और फिर उनके बेटे नितिन नवीन पिछले लगभग तीन दशकों से यहां बीजेपी का झंडा बुलंद करते रहे हैं. नितिन नवीन अब बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बन चुके हैं और राज्यसभा चले गए हैं, जिसके बाद यह सीट खाली हुई है. ऐसे में यह चुनाव सिर्फ विधायक चुनने का नहीं, बल्कि नितिन नवीन की नेतृत्वक साख की भी परीक्षा माना जा रहा है. उम्मीदवार कोई भी हो, लेकिन नेतृत्वक संदेश यही जाएगा कि लड़ाई आखिरकार नितिन नवीन के प्रभाव की है.
पीके का निशाना सिर्फ बीजेपी नहीं है
अगर प्रशांत किशोर चाहते, तो किसी अपेक्षाकृत आसान सीट से चुनाव लड़ सकते थे. लेकिन बांकीपुर चुनने के पीछे उनकी रणनीति कहीं बड़ी दिखाई देती है. वे जानते हैं कि अगर बीजेपी के सबसे सुरक्षित किले में सेंध लगती है, तो उसका संदेश बिहार ही क्या देश भर में जाएगा. एक तरफ जहां विपक्ष के एक-एक क्षत्रप जैसे ममता, स्टालिन और केजरीवाल धराशायी हो गए है, यह जीत पीके को विपक्ष की राजनीती में नया आयाम दे सकती है.
यही वजह है कि वे इस उपचुनाव को सिर्फ स्थानीय मुकाबला नहीं, बल्कि प्रशासन के वादों पर जनमत संग्रह बता रहे हैं. रोजगार, पलायन, शिक्षा और युवाओं के भविष्य जैसे मुद्दों को सामने रखकर वे प्रशासन विरोधी माहौल को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. साथ ही वे यह भी याद दिला रहे हैं कि लोगों ने वोट नीतीश कुमार के चेहरे पर दिया था, लेकिन बाद में नेतृत्व बदल गया. इसी मुद्दे को वे जनता के विश्वास से जोड़ रहे हैं.
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इतिहास बताता है, गढ़ भी ढहते हैं
हिंदुस्तानीय नेतृत्व में ऐसे कई उदाहरण हैं जब सबसे मजबूत माने जाने वाले गढ़ भी उपचुनाव में ढह गए. 2017 में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद गोरखपुर लोकसभा सीट पर हुए उपचुनाव में बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा था. इसलिए सिर्फ किसी सीट का इतिहास जीत की गारंटी नहीं होता. शायद यही गणित प्रशांत किशोर भी लगा रहे हैं. उन्हें उम्मीद है कि प्रशासन से नाराज मतदाता, खासकर युवा, इस चुनाव को एक संदेश देने के अवसर के रूप में देख सकते हैं.
हार में नुकसान कम, जीत में फायदा बड़ा
बेशक, बांकीपुर का सामाजिक और चुनावी गणित आज भी बीजेपी के पक्ष में माना जाता है. जन सुराज की संगठनात्मक ताकत भी अभी उस स्तर पर नहीं है कि मुकाबला आसान हो जाए. लेकिन नेतृत्वक दृष्टि से देखें तो इस चुनाव में प्रशांत किशोर के पास खोने के लिए अपेक्षाकृत कम और पाने के लिए बहुत कुछ है.
अगर वे हारते हैं, तो कहा जाएगा कि बीजेपी के गढ़ में हारना अस्वाभाविक नहीं था. लेकिन अगर वे जीत जाते हैं, तो यह सिर्फ एक सीट की जीत नहीं होगी. यह उनकी नेतृत्वक स्वीकार्यता की पहली बड़ी मुहर होगी. जन सुराज को पहली विधानसभा सीट मिलेगी और प्रशांत किशोर पहली बार बिहार विधानसभा में एक प्रभावी विपक्षी चेहरे के रूप में स्थापित हो सकते हैं.
अंतिम सवाल और विशेषज्ञों की राय
इसलिए बांकीपुर का यह उपचुनाव दो उम्मीदवारों के बीच का सामान्य मुकाबला नहीं है. एक तरफ बीजेपी अपने सबसे प्रतिष्ठित नेतृत्वक किले को बचाने की कोशिश करेगी, तो दूसरी तरफ प्रशांत किशोर यह साबित करना चाहेंगे कि वे सिर्फ चुनावी रणनीतिकार नहीं, बल्कि जनता का चुनाव जीतने वाले नेता भी बन सकते हैं. अब देखना यह है कि बांकीपुर उनके लिए नेतृत्वक सेल्फ गोल साबित होता है या फिर यही सीट उनके लंबे नेतृत्वक सफर की पहली बड़ी जीत और नया टर्निंग पॉइंट बन जाती है.
इस मुद्दे पर जाने-माने नेतृत्वक विश्लेषक नरेंद्र कुमार का मानना है कि NDA जीतेगी, लेकिन मुकाबला कड़ा होगा. बांकीपुर (जिसे पहले पटना वेस्ट के नाम से जाना जाता था) में 60% से ज़्यादा वोटर BJP समर्थक जातियों, जैसे कायस्थ, बनिया, राजपूत, ब्राह्मण और भूमिहार से हैं. अगर इसमें JDU का फैक्टर भी जोड़ दें, तो कुर्मी और कुशवाहा जातियों के साथ यह आंकड़ा 70% के पार चला जाएगा.
हो सकता है कि ब्राह्मण, भूमिहार और राजपूत जातियों का पढ़ा-लिखा वर्ग PK को वोट दे. साथ ही, यह भी साफ नहीं है कि मुकाबला सीधा होगा या RJD-कांग्रेस भी इसमें शामिल होकर मुकाबले को और कड़ा और PK के लिए मुश्किल बना देंगे.
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नेतृत्व की समझ रखने वाले अजय प्रताप तिवारी का मानना है कि प्रशांत किशोर चुनावी रणनीतिकार के रूप में सफल रहे हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है. लेकिन चुनाव जीतने की रणनीति तैयार करना और स्वयं चुनाव लड़कर जीत हासिल करना दो अलग-अलग बातें हैं. ऐसे में बांकीपुर विधानसभा सीट से उनका चुनाव लड़ना उनकी व्यक्तिगत नेतृत्वक स्वीकार्यता की वास्तविक परीक्षा होगी.
बांकीपुर सीट का नेतृत्वक महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह लंबे समय से हिंदुस्तानीय जनता पार्टी का मजबूत गढ़ रही है. यह शहरी, शिक्षित और नेतृत्वक रूप से जागरूक मतदाताओं वाला क्षेत्र माना जाता है, जहां विकास, सुशासन, रोजगार, शिक्षा और शहरी आधारभूत ढांचे जैसे मुद्दे जातीय समीकरणों के साथ समानांतर रूप से चुनावी व्यवहार को प्रभावित करते हैं.
ऐसे में प्रशांत किशोर के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने वैचारिक एजेंडे और जन सुराज के संदेश को मतदाताओं के समर्थन में बदलने की होगी. पिछले चुनावों में जन सुराज के प्रदर्शन को देखते हुए यह कहना आसान नहीं है कि वह बिहार में वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में अपनी मजबूत पहचान स्थापित कर पाएंगे. हालांकि, यदि प्रशांत किशोर बांकीपुर से प्रभावशाली प्रदर्शन करते हैं या जीत दर्ज करते हैं, तो इससे जन सुराज को राज्यव्यापी नेतृत्वक विकल्प के रूप में नई ऊर्जा और विश्वसनीयता मिल सकती है. इसलिए यह चुनाव केवल एक सीट का मुकाबला नहीं, बल्कि प्रशांत किशोर की नेतृत्वक स्वीकार्यता और जन सुराज की भावी दिशा का भी महत्वपूर्ण परीक्षण होगा.
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