सरायकेला-खरसावां से शचिंद्र कुमार दाश/ प्रताप मिश्रा की रिपोर्ट
Seraikela Kharsawan News: छऊ नृत्य के कारण अंतरराष्ट्रीय क्षितिज पर सरायकेला-खरसावां की पहचान बनी है. यह जिला अपनी प्राकृतिक सुंदरता के साथ-साथ छऊ नृत्य के लिए भी जाना जाता है. छोटे शहर होने के बावजूद इसकी प्रसिद्धि विदेशों तक पहुंच चुकी है. यहां के सात छऊ गुरुओं को पद्मश्री पुरस्कार मिल चुका है. संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित छऊ गुरु और राजकीय छऊ नृत्य कला केंद्र के पूर्व निदेशक तपन पटनायक के अनुसार छऊ कला एक प्राचीन योग है. इसमें आध्यात्मिकता की गहराई भी देखने को मिलती है. छऊ नृत्य में आस्था, परंपरा और धार्मिक विश्वास स्पष्ट रूप से झलकता है.
हिंदुस्तान की प्राचीन नृत्य है छऊ
छऊ गुरु तपन पटनायक ने छऊ नृत्य को विशुद्ध रुप से हिंदुस्तान की प्राचीन नृत्य बताया. गुरु तपन पटनायक के अनुसार समय के साथ यह सामरिक कला से शास्त्रीय कला के रुप में आगे बढ़ता गया. इसका पूरा श्रेय सरायकेला राजपरिवार को जाता है. इसमें आधुनिक छऊ निर्माता सरायकेला राजघराने के कुंवर विजय प्रताप सिंहदेव क भूमिका रही. सरायकेला में राजकुमार भी आम कलाकारों के साथ नृत्य किया करते थे.

छऊ नृत्य के संरक्षण में राजपरिवार का बड़ा योगदान
देश-विदेशों में छऊ नृत्य प्रस्तुत कर चुके गुरु तपन पटनायक ने बताया कि छऊ नृत्य ने अपनी उत्कृष्ट नृत्य शैली के कारण अपने प्रांत और देश के शरहदों के पार भिन्न भाषा, विचार वाले देशों में के लोगों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बनी हुई है. 1938 में पहली बार सरायकेला राजघराने की अगुवाई में इस नृत्य कला ने विदेशों (यूरोप) में जा कर अपनी आभा बिखेरी थी. गुरु तपन पटनायक के अनुसार छऊ नृत्य के संरक्षण में राजपरिवार का बड़ा योगदान रहा है.
2010 में, छऊ नृत्य को यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत
गुरु तपन पटनायक के अनुसार 2010 में, छऊ नृत्य को यूनेस्को की मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में अंकित किया गया था, जो इसके वैश्विक सांस्कृतिक महत्व को उजागर करता है. इस नृत्य कला के लिये सरायकेला के सात कलाकारों को पद्मश्री की उपाधी मिल चुकी है. देश में सरायकेला ही एक मात्र ऐसा शहर है, जहां से छऊ नृत्य के लिए सात कलाकारों को पद्मश्री का सम्मान मिला है. गुरु तपन पटनायक के अनुसार वर्तमान समय में छऊ नृत्य कला के संरक्षित करने के लिए ये सही रुप में प्रशासनी स्तर पर पहल होनी चाहिए.

नृत्य कला के जोड़ना, प्रोत्साहन, विकास और प्रचार प्रसार पर जोर देना होगा
गुरु तपन पटनायक के अनुसार कला का बेहतर माहौल तैयार हो, गुरु-शिष्य परंपरा को मजबूत बने, अनुभवी गुरुओं का सलाह पर काम हो और उन्हें उचित सम्मान मिले. स्कूल-कॉलेज में छऊ की पढ़ाई हो और कलाकारों को प्रशिक्षण देने के साथ साथ उचित मानदेय मिले, तभी इस नृत्य कला प्रोत्साहन मिलेगी. इस नृत्य कला के संबद्धन, प्रोत्साहन, विकास और प्रचार प्रसार पर जोर देना होगा. गुरु तपन पटनायक का मानना है कि कला को कला दृष्टि से ही संवारा जा सकता है, न कि किसी नेतृत्वक दृष्टिकोण से.
सरायकेला-खरसावां जिला में तीन शैली के छऊ नृत्य है प्रचलित
छऊ नृत्य सरायकेला-खरसावां का प्रसिद्ध नृत्य है. यह देश-विदेश में काफी लोकप्रिय है. सरायकेला शैली के छऊ कलाकार मुखौटा कर पहन कर पारंपरिक वाद्य यंत्र ढ़ोलक, नगाड़ा और शहनाई (पेंकाली) के धून पर नृत्य करते है. सरायकेला में छऊ के दर्जनों अंतरराष्ट्रीय कलाकार है. सरायकेला-खरसावां जिला में तीन शैली के छऊ नृत्य का प्रचलन है. सरायकेला शैली में कलाकार मुखौटा पहने नृत्य करते है. इस शैली के नृत्य में भाव भंगिमाओं पर विशेष ध्यान दिया जाता है. इसी तरह खरसावां शैली के छऊ नृत्य में मुखौटा का उपयोग नहीं होता है. चांडिल क्षेत्र में प्रचलित मानभूम शैली के छऊ नृत्य बड़े-बड़े आकार के मुखौटों का उपयोग होता है. विदेशों से भी काफी संख्या में लोग छऊ नृत्य सीखने के लिए पहुंचते है.

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