रिपोर्ट – शिवपूजन सिंह
मिडिल ईस्ट की जंग की काली छाया से दुनिया हलकान और हैरान है. ईरान के साथ इजराइल और अमेरिका के संग्राम की तपिश से दुनिया झुलस रही है. इतिहास के पन्नों में दर्ज जंग की दास्तान हमेशा यही बताती है कि युद्ध ने बर्बादी और बेकारी ही हर तरफ फैलाई है. इसके दरीचे में खून की छींटे, बेपनाह दर्द, जमींदोज हसरतें, बिछड़ाव और बिखराव ही समेटे हुए हैं.
अभी ईरान की जंग से सिर्फ ईरान ही नहीं, बल्कि इसकी बारूद की गंध से दुनिया भी परेशान है. खासकर कच्चे तेल का उत्पादन करने वाला यह प्रमुख देश युद्ध के चलते इसकी आपूर्ति करने में अक्षम और असमर्थ है. खासकर हर्मूज-वे से इसकी सप्लाई बाधित हुई है. नतीजा यह है कि कच्चे तेल के दाम 100 डॉलर के पार चले गए हैं. इसके चलते महंगाई बेकाबू होती जा रही है और हिंदुस्तान भी इसका खामियाजा भुगत रहा है. हिंदुस्तान के लिए तेल का बड़ा महत्व है. यहां तेल महंगा होने से दाल, चावल, सब्जी, किराया सब महंगे हो जाते हैं.
सबसे चिंता वाली बात यह है कि अगर ईरान की लड़ाई लंबी चली और तेल की सप्लाई में अड़चन आई तो दुनिया एक ऐसे आर्थिक चक्र में फंस सकती है, जहां महंगाई बढ़ने के साथ आर्थिक विकास भी धीमा पड़ सकता है.
वित्तीय स्थिति के लिए धड़कन है कच्चा तेल
अगर देखें तो तेल की बुनियाद पर ही बहुत कुछ टिका हुआ है, खासकर परिवहन, विमानन, उद्योग, पेट्रोकेमिकल, प्लास्टिक और कृषि. तकरीबन किसी न किसी रूप में ऊर्जा जरूरतों के लिए तेल पर ही आसरा रहता है. ईरान का संघर्ष लंबा चलने से वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है. हर्मूज-वे जैसे समुद्री मार्ग नहीं खुलते हैं तो फिर तेल संकट और गहराएगा. यहां बात सिर्फ मौजूदा वक्त की नहीं, बल्कि चिंता यह भी है कि भविष्य के लिए भी बिना परेशानी के आपूर्ति होती रहे.
महंगा तेल मतलब महंगी जिंदगी
तेल हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा और एक कड़ी के माफिक है. सीधे सोचिए, तेल महंगा होगा तो पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ेंगे, किराया बढ़ने के साथ रोजाना की उपभोक्ता वस्तुओं की कीमत में भी बढ़ोतरी होगी. ट्रक से आने वाला सामान महंगा होगा तो लाजिमी है कि आपकी जेब खाली होगी. इसके साथ ही इससे जुड़े उद्योगों पर भी इसका भारी दबाव होगा.
क्या महंगा तेल मंदी की दस्तक है?
कच्चे तेल की दिक्कत से मंदी दुनिया को जकड़ लेगी, इसे तुरंत सोच और बोल देना जल्दबाजी और उतावलापन ही होगा. दरअसल, सिर्फ कच्चे तेल के ऊंचे दाम से मंदी पांव पसार लेगी, ऐसा नहीं हो सकता. लेकिन हां, अगर लंबे समय तक तेल की कीमत उच्च स्तर पर बनी रहती है तो फिर मंदी और सुस्ती वित्तीय स्थिति में ला सकती है.
महंगे तेल के कारण उत्पादन लागत बढ़ती है. कंपनियों का मुनाफा दबाव में आता है. लोगों की जेब में खर्च करने के लिए पैसा कम रहता है. केंद्रीय बैंक महंगाई को काबू में रखने के लिए ब्याज दरों को ऊंची रखती है. लाजिमी है कि फिर इससे कर्ज महंगा होगा. इससे निवेश की रफ्तार धीमी होगी और तमाम आर्थिक गतिविधियां सुस्त पड़ने लगेंगी. अगर इसका समाधान नहीं निकला और सिलसिला लंबा चला तो फिर हालात विपरीत और विकट हो सकते हैं.
हिंदुस्तान के सामने कितनी बड़ी चुनौती?
कच्चा तेल हिंदुस्तान के लिए बेहद अहमियत रखता है. इसका इस्तेमाल और जरूरत तकरीबन हर जगह होती है. इससे कई चीजें जुड़ी रहती हैं. सीधी तौर पर समझें तो अगर तेल महंगा होगा तो हिंदुस्तान को इसे खरीदने के लिए ज्यादा धन खर्च करना होगा. इसके चलते कारोबार घाटे का दबाव बढ़ सकता है. अगर यह अधिक समय तक चलता है तो फिर रुपये पर दबाव बढ़ेगा. फिर आयात की जाने वाली वस्तुएं महंगी होंगी, जिसके लिए बाजार में आम लोगों को ज्यादा पैसा चुकाना होगा.
हालांकि, दूसरा पहलू और सुकून देने वाली बात यह है कि हिंदुस्तान अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए किसी एक देश पर निर्भर नहीं है, बल्कि अलग-अलग देशों से यह तेल खरीदता है.
जंग का समापन ही सबसे बेहतर समाधान
युद्ध कभी भी अच्छा नहीं होता, यह सिर्फ नुकसान और नाकामी ही हर चीज में दिखलाता रहा है. अभी रूस-यूक्रेन युद्ध चार सालों से तकरीबन चल ही रहा है. इसकी विभीषिका और भीषण दर्द क्या है, यह तो वहां के बाशिंदे जानते हैं. लिहाजा जंग की आग पर जल्द से जल्द पानी डालना ही एक उपाय है. तभी खुशनुमा वित्तीय स्थिति के लिए रास्ता तैयार हो सकता है.
अभी-अभी दुनिया कोरोना महामारी की जद से छूटी है. साथ ही ट्रेड वार, सप्लाई-चेन संकट और महंगाई के दौर से उबरी है. लिहाजा मिडिल-ईस्ट का सुलगा तनाव फिर दुनिया को आगे ले जाने की बजाय पीछे धकेलेगा.
बाजार में बहार आने का इंतजार सभी को है. लेकिन यह तब मुमकिन है, जब आपसी अहं खत्म हो और लड़ाई को शांत कर बातचीत की मेज पर इसका समाधान तलाशा जाए.
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