French Prime Minister Sebastien Lecornu Resigns: फ्रांस के नेतृत्वक हालात पहले से ही काफी नाजुक हैं. ऐसे में प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लेकोर्नू ने सोमवार को चौंकाने वाला कदम उठाया. अपने नए मंत्रिमंडल की घोषणा के सिर्फ कुछ घंटे बाद ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया. यह इसलिए भी अहम है क्योंकि लेकोर्नू ने 9 सितंबर 2025 को ही प्रधानमंत्री का पद संभाला था. रॉयटर्स के अनुसार, इस्तीफे की वजह नेतृत्व में दबाव और नाराजगी थी. नए मंत्रिमंडल को कुछ लोग बहुत दक्षिणपंथी और कुछ लोग अपर्याप्त मान रहे थे. इस तरह की प्रतिक्रिया ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि यह प्रशासन कितने दिन टिक पाएगी.
मैक्रों के करीबी और संकट में प्रशासन
लेकोर्नू, जो राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के करीबी सहयोगी हैं, रविवार को अपने मंत्रियों की नियुक्ति कर चुके थे. सोमवार दोपहर को मंत्रिमंडल की पहली बैठक तय थी. लेकिन नई टीम के गठन से विरोधियों और सहयोगियों दोनों ही नाराज हो गए. फ्रांस की संसद खंडित है और किसी भी दल के पास बहुमत नहीं है. लेकोर्नू को अगले साल मितव्ययिता बजट पास कराने का कठिन काम भी सामना करना था. उनके दो पूर्ववर्ती, फ्रांस्वा बायरू और मिशेल बार्नियर, भी इसी बजट गतिरोध के कारण पद से हटा दिए गए थे.
अधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, फ्रांस का सार्वजनिक ऋण अब रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है. देश का ऋण-से-जीडीपी अनुपात यूरोप में तीसरा सबसे अधिक है, ग्रीस और इटली के बाद. पिछले तीन बजट संसद में बिना वोटिंग के पारित कराए गए थे, लेकिन लेकोर्नू ने इस बार पारदर्शिता का वादा किया.
लेकोर्नू ने स्पष्ट कहा, “मैं समझौते के लिए तैयार था. लेकिन हर पार्टी चाहती थी कि दूसरा दल उसका पूरा एजेंडा अपनाए. यह कभी-कभी मुख्य गठबंधन के लिए सच है. यह विपक्ष के लिए भी सच है.” नेतृत्वक दलों की यह मांग और लाल-रेखाएं समझौते में बाधा बन गईं.
French Prime Minister Sebastien Lecornu Resigns: इतिहास रचते हुए इस्तीफा
परिणामस्वरूप, लेकोर्नू केवल 27 दिन में इस्तीफा देने वाले सबसे कम समय तक रहने वाले प्रधानमंत्री बन गए. फ्रांस 24 के अनुसार, उन्होंने 26 दिन तक बिना पूर्ण कार्यशील प्रशासन के काम किया. उनके इस्तीफे के बाद, दक्षिणपंथी नेशनल रैली (RN) के नेता जॉर्डन बार्डेला ने राष्ट्रपति मैक्रों से आग्रह किया कि या तो नेशनल असेंबली भंग करें या फिर इस्तीफा दें. लेकोर्नू ने अपने भाषण में कहा कि फ्रांस दोनों चरम नेतृत्वक रुझानों के बीच नहीं फंस सकता. पार्टियों को समझौते करने होंगे और फैसलों में फ्रांसीसी जनता का हित सर्वोपरि होना चाहिए.
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