मुझे वह दिन आज भी याद है. मैं अटल बिहारी वाजपेयी के साथ कोलकाता जा रहा था, जहां भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक थी. हम कालका मेल में थे. वाजपेयी के साथ पत्रकारों का एक समूह यात्रा कर रहा था. उस यात्रा के दौरान वाजपेयी ने मुझसे एक बात कही, जो आज तक मेरे मन में बसी हुई है. उन्होंने कहा कि वह श्यामा प्रसाद मुखर्जी के निजी सचिव नहीं रहे, पर उन्हें इसका गहरा अफसोस रहा कि भाजपा लंबे समय तक केवल हिंदी पट्टी तक सीमित रही. उनका मानना था कि जब पार्टी खासकर पश्चिम बंगाल जैसे राज्य में एक शक्ति बन जायेगी, तभी वह अफसोस दूर होगा. वर्षों बाद वह क्षण आ चुका है. भाजपा ने बंगाल में जीत हासिल की है. यह एक ऐतिहासिक बदलाव है. कोलकाता में भाजपा की शुरुआती सफलताएं प्रतीकात्मक थीं, पर महत्वपूर्ण भी. जब पार्टी ने कोलकाता नगर निगम चुनाव में केवल दो वार्ड जीते थे, तब ज्योति बसु मुख्यमंत्री थे. लालकृष्ण आडवाणी ने तब दिल्ली से कहा था, ‘कोलकाता में भाजपा का खाता खुल गया है’. वह एक छोटा कदम था, पर दृढ़ इरादे का संकेत था.
आज नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा ने वह कर दिखाया है, जो कभी असंभव लगता था. यह परिवर्तन रातोंरात नहीं हुआ. इसके पीछे निरंतर प्रयास, एकाग्रता और सावधानीपूर्वक बनी रणनीति थी. मोदी-शाह की जोड़ी ने बंगाल को महत्वपूर्ण परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों की तरह देखा-अनुशासन, सही समय और तीक्ष्ण रणनीति के साथ. वर्ष 2021 में भी भाजपा ने बड़ा उछाल दिखाया था, जब केवल तीन विधायकों से बढ़कर 77 तक पहुंची थी. वह एक बड़ी सफलता थी. पर 2021 से मिले सबक अहम थे. भाजपा ने अपनी रणनीति में महत्वपूर्ण बदलाव किये. पार्टी ने अपनी मूल विचारधारा नहीं छोड़ी-‘जय श्री राम’ और हिंदुत्व जैसे मुद्दे पृष्ठभूमि में बने रहे. पर उसने समझ लिया था कि केवल इनके सहारे चुनावी सफलता संभव नहीं है. इस चुनाव में भाजपा ने अपना केंद्रीय संदेश ‘परिवर्तन’ पर केंद्रित किया. यह बदलाव जमीनी हकीकत की समझ पर आधारित था.
ममता के 15 वर्षों के शासन के बाद भाजपा ने मजबूत एंटी-इनकंबेंसी महसूस की. शिक्षा व्यवस्था में गिरावट, भ्रष्टाचार के आरोप, जिलों में हिंसा, सिंडिकेट संस्कृति और उगाही ने व्यापक असंतोष पैदा किया था. एक ऐतिहासिक निरंतरता भी दिखाई दी. जिस तरह वाम शासन में असामाजिक तत्वों की घुसपैठ हुई थी, वही तत्व तृणमूल व्यवस्था में भी जगह बना चुके थे. औद्योगिक ठहराव और छूटे हुए अवसरों ने जनता की निराशा और बढ़ाई. भाजपा ने इसका लाभ उठाया. उसने अपने अभियान को नेतृत्व परिवर्तन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि बंगाल के व्यापक रूपांतरण के रूप में पेश किया-यह वादा करते हुए, कि राज्य की खोई हुई बौद्धिक और सांस्कृतिक पहचान वापस दिलायी जायेगी. एक रैली में अमित शाह ने इसे स्पष्ट किया- लक्ष्य केवल मुख्यमंत्री बदलना नहीं, बल्कि पूरे बंगाल को बदलना है, और यह बदलाव जनता ही लायेगी.
दूसरी ओर, ममता बनर्जी ने इस एंटी-इनकंबेंसी की गहराई को कम आंका. नेतृत्वक इतिहास में इसका एक उदाहरण भी है. नंदीग्राम गोलीकांड के बाद जब तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को संभावित परिणामों को लेकर आगाह किया गया, तब उन्होंने हार की आशंका को नकार दिया था. कुछ ऐसा ही आत्मविश्वास तृणमूल नेतृत्व के कुछ हिस्सों में भी दिखाई दिया. आंतरिक मतभेद, टिकट वितरण के दौरान विवाद और सीबीआइ व प्रवर्तन निदेशालय की जांच ने असहज माहौल बनाया. मध्यवर्गीय बंगालियों में इससे निराशा की भावना बढ़ी.
फिर भी, ममता बनर्जी को हराना आसान नहीं था. एक महत्वपूर्ण कारक मुस्लिम वोट था, जो करीब 30 फीसदी है. भाजपा ने समझ लिया था कि जब तक यह वोट विभाजित नहीं होगा, तृणमूल की बढ़त को पार करना मुश्किल है. भाजपा का दावा है कि मतदाता सूची में सुधार जैसे कदमों से, खासकर सीमावर्ती जिलों में, अनियमितताओं में कमी आयी. चुनाव आयोग ने भी संकेत दिया कि एसआइआर प्रक्रिया के जरिये अवैध घुसपैठियों और फर्जी मतदाताओं को हटाया जायेगा, जिससे भाजपा को लाभ मिला. स्त्री मतदाता भी एक महत्वपूर्ण वर्ग थीं. पारंपरिक रूप से ममता का मजबूत आधार रही इस श्रेणी में कुछ बदलाव देखने को मिले. भाजपा ने स्त्री सुरक्षा का मुद्दा उठाकर और मोदी की छवि के जरिये इसमें सेंध लगाने की कोशिश की. इसके साथ ही हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण हुआ, जिसमें शुभेंदु अधिकारी की भूमिका अहम रही. पहले भी भाजपा को हिंदू वोट मिले थे, पर वे सीटों में परिवर्तित नहीं हो पाये थे. इस बार यह अधिक प्रभावी साबित हुआ.
भाजपा ने बंगाली भद्रलोक के बीच अपनी छवि नरम करने की भी कोशिश की. शमीक भट्टाचार्य जैसों ने सांस्कृतिक रूप से जुड़ी बहुलतावादी बंगाली पहचान पेश की, जिससे यह धारणा कमजोर हुई कि भाजपा बंगाल की संस्कृति से अलग है. कल्याणकारी नेतृत्व में भी बड़ा बदलाव देखा गया. पहले भाजपा तृणमूल की योजनाओं की आलोचना करती थी, पर 2026 में उसने न केवल बराबरी की, बल्कि कई मामलों में उससे आगे बढ़कर वादे किये. मसलन, जहां राज्य प्रशासन स्त्रीओं को 1,500 रुपये दे रही थी, वहीं भाजपा ने 3,000 रुपये देने का वादा किया. बंगाली अस्मिता की नेतृत्व में भी बदलाव आया. ममता बनर्जी लंबे समय से ‘भीतरी बनाम बाहरी’ की नेतृत्व करती रही थीं. इस बार भाजपा ने इसका प्रभावी जवाब दिया. मोदी और शाह ने बांग्ला भाषा, संस्कृति और भावनाओं से जुड़ने के लिए विशेष प्रयास किये. वर्ष 1977 के बाद पहली बार किसी अखिल हिंदुस्तानीय पार्टी ने बंगाल की क्षेत्रीय पहचान के साथ सार्थक संवाद स्थापित किया. इससे पहले कम्युनिस्ट और तृणमूल, दोनों मूलतः क्षेत्रीय दल थे. यह भी याद रखने योग्य है कि ममता बनर्जी स्वयं कभी सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों के दौरान असंतोष की नेतृत्व की प्रतीक थीं. पर 15 वर्षों के शासन के बाद वही असंतोष उनकी प्रशासन के खिलाफ हो गया.
अंततः, यह परिणाम कई कारकों का सम्मिलित प्रभाव है-एंटी-इनकंबेंसी, भाजपा के रणनीतिक बदलाव, संगठनात्मक मजबूती और बूथ स्तर तक प्रभावी प्रबंधन. भाजपा के भीतर के मतभेदों को भी सावधानीपूर्वक संभाला गया. अमित शाह ने व्यक्तिगत हस्तक्षेप कर नेताओं के बीच तालमेल सुनिश्चित किया और अभियान को एकजुट रखा. भाजपा ने बंगाल में वह हासिल कर लिया है, जो कभी दूर की बात लगता था. और यह जीत केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित नहीं है. इसके राष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक प्रभाव हैं. आगामी राज्य चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनाव के संदर्भ में यह सफलता मोदी-शाह की नेतृत्व को और मजबूत बनाती है. ममता बनर्जी और तृणमूल के लिए यह बड़ा झटका है. अब असली सवाल यह है कि आने वाले वर्षों में यह परिणाम देश की व्यापक नेतृत्व को किस दिशा में ले जायेगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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