Vat Savitri 2026: वट सावित्री हिंदू धर्म का एक प्रमुख व्रत है, जिसे सुहागिन स्त्रीएं करती हैं. इस दिन स्त्रीएं व्रत रखती हैं और सोलह श्रृंगार कर वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं. वे अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं. यह व्रत हर साल ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को किया जाता है. इस व्रत से जुड़ी कई पारंपरिक रस्में हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण रस्म पूजा के बाद बहू द्वारा अपनी सास को ‘बायना’ देना माना जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि वट सावित्री के दिन बहुएं अपनी सास को बायना क्यों देती हैं और इसके पीछे क्या धार्मिक महत्व है? आइए विस्तार से जानते हैं.
बायना का महत्व
वट सावित्री की पौराणिक कथा के अनुसार, जब माता सावित्री ने अपने पतिव्रता धर्म और बुद्धिमानी से यमराज को प्रसन्न किया था, तब उन्होंने अपने पति सत्यवान के प्राण मांगने से पहले अपने अंधे सास-ससुर की नेत्र ज्योति और उनका खोया हुआ राजपाठ वापस मांगा था. यह प्रसंग दर्शाता है कि एक आदर्श बहू के लिए सास-ससुर का सम्मान और उनकी सेवा सर्वोपरि होती है. इसी परंपरा को निभाते हुए आज भी बहुएं अपनी सास को उपहार स्वरूप बायना भेंट करती हैं.
यह परंपरा बहू द्वारा अपनी सास के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और प्रेम को दर्शाती है. इससे सास-बहू के रिश्ते में मधुरता बढ़ती है और आपसी तालमेल मजबूत होता है.
बायने की थाली में क्या-क्या होना चाहिए?
वट सावित्री के बायने की थाली में इन चीजों को जरूर शामिल करना चाहिए—
- मुख्य प्रसाद: भीगे हुए काले चने, पूड़ियां, हलवा या गुलगुले.
- सुहाग सामग्री: सिंदूर, बिंदी, लाल चूड़ियां, मेहंदी, आलता, काजल, शीशा और कंघी.
- वस्त्र: सास के लिए एक नई साड़ी. यदि साड़ी का रंग लाल, पीला या गुलाबी हो, तो उसे शुभ माना जाता है.
- मौसमी फल: आम, तरबूज, खरबूजा, केला और एक पानी वाला नारियल.
- दक्षिणा: थाली में सामर्थ्य के अनुसार कुछ नकद रुपये जरूर रखें.
सावधानियां
बायना देते समय इस बात का विशेष ध्यान रखें कि सास को कभी भी इस्तेमाल किया हुआ सुहाग का सामान न दें. साथ ही काले, सफेद और गहरे नीले रंग के कपड़े भी भूलकर न दें. इसके अलावा थाली में कोई भी धारदार वस्तु जैसे कैंची, सुई या सेफ्टी पिन नहीं रखनी चाहिए.
कैसे दी जाती है बायने की थाली?
वट वृक्ष की 7 या 108 बार परिक्रमा करने और सावित्री-सत्यवान की कथा सुनने के बाद स्त्रीएं घर लौटती हैं. इसके बाद वे बांस के पंखे से अपने पति को हवा करती हैं और उनका आशीर्वाद लेती हैं. फिर बायने की थाली को पल्लू से ढककर सास को सादर भेंट किया जाता है. यदि सास मौजूद न हों, तो यह बायना घर की किसी बड़ी स्त्री, जेठानी या मंदिर के पुजारी की पत्नी को भी दिया जा सकता है.
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