धनबाद से धर्मेंद्र गुप्त की रिपोर्ट
झारखंड आंदोलन के इतिहास में टुंडी का नाम शिबू सोरेन के संघर्ष की कर्मभूमि के रूप में दर्ज है. लेकिन इस संघर्ष की एक कहानी ऐसी भी है, जो जंगल की पगडंडियों, परिवार की चिंता और एक पत्नी के धैर्य से होकर गुजरती है.
शिबू सोरेन जब टुंडी के जंगल-पहाड़ों में फरारी के दिन बिता रहे थे, तब उनकी पत्नी रूपी सोरेन भी घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहीं. पति का लंबे समय तक कोई पता नहीं चला, तो वह अपनी सास और ननद के साथ उन्हें खोजने जंगल तक पहुंच गयीं. उस समय उनकी गोद में बड़े बेटे दुर्गा सोरेन थे.
उनके करीबी सहयोगी बाम शंकर के अनुसार, इसी आवास से शिबू सोरेन का नेतृत्वक कार्यालय भी संचालित होता था. यहां उनके साथ पत्नी रूपी सोरेन, दिवंगत पुत्र दुर्गा सोरेन, हेमंत सोरेन, बसंत सोरेन और बेटी अंजलि रहती थीं.
इस लिहाज से बोकारो उनके परिवार के लिए महज रहने की जगह नहीं था. आंदोलन के कठिन दौर से निकलकर नेतृत्व के बड़े मंच तक पहुंचने की यात्रा में यह घर परिवार और नेतृत्वक गतिविधियों, दोनों का केंद्र बना.
ये भी पढ़ें: रूपी सोरेन : एक खामोश तपस्या, जिसने संघर्ष की विरासत को संभाले रखा
बोकारो से शिबू सोरेन का जुड़ाव इतना गहरा रहा कि बाद के वर्षों में भी वह यहां आते रहे और पुराने कार्यकर्ताओं से मिलते रहे. जंगलों में संघर्ष के उन दिनों से लेकर बोकारो के इस घर तक, रूपी सोरेन उनके साथ खड़ी रहीं. उनकी स्मृतियां झारखंड आंदोलन के उस दौर का एक मानवीय पक्ष सामने लाती हैं, जिसे अक्सर नेतृत्वक इतिहास के बीच जगह नहीं मिल पाती.
The post शिबू सोरेन की तलाश में टुंडी के जंगल छानती रहीं रूपी सोरेन, पढ़िए संघर्ष के दिनों की कहानी appeared first on Naya Vichar.

