कॉक्रोच जनता पार्टी (CJP) के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका को 14 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर कथित तौर पर सुरक्षा घेरा तोड़कर प्रवेश करने और शांति भंग करने के आरोपों के बाद हिरासत में लिया गया था. सीजेपी के दोनों नेताओं को पहले 5 दिन के लिए हिरासत में रखा गया था. अब उनकी न्यायिक हिरासत को आगे बढ़ाया गया है. दोनों ने इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी है.
मर्डर के दोषी को जमानत, राष्ट्रवादी जेल में: ध्रुव राठी
ध्रुव राठी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट किए गए एक वीडियो में कहा कि आशुतोष और सौरव अभी तक जेल में बंद हैं. उनका गुनाह सिर्फ इतना है कि उन्होंने जंतर-मंतर जाकर तिरंगा लहराया था. कोर्ट उन्हें बेल नहीं दे रहा है और इसकी वजह बताते हुए कहा जा रहा है कि यह शांति भंग करने (Breach of Peace) का मामला है.
लेकिन उसी दिन इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हत्या के एक मामले में दोषी ठहराए जा चुके व्यक्ति को जमानत दे दी, क्योंकि वह बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ना चाहता है. यह मजाक नहीं है. आज देश में कानून-व्यवस्था का यही हाल हो गया है. पूरे सिस्टम के जरिए खुलेआम जनता का मजाक बनाया जा रहा है.
उन्होंने आगे कहा कि यह कोई इकलौता मामला नहीं है. अंकिता भंडारी केस में भी जिन वीआईपी पर आरोप लगाए गए थे, उनमें बीजेपी नेता दुष्यंत गौतम का नाम लिया जाता रहा है. ध्रुव राठी ने आरोप लगाया कि बीजेपी ने उन्हें सिक्किम का राज्यपाल बना दिया है, जिससे अंकिता भंडारी को न्याय मिलना और मुश्किल हो जाएगा.
उन्होने वीडियो के साथ एक्स पर लिखा- मर्डर के दोषी को जमानत, राष्ट्रवादी जेल में.
वीडियो में देखें ध्रुव राठी ने क्या कहा-
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हत्या के दोषी को जमानत मिली?
Live Law के मुताबिक इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 19 अक्टूबर 2026 को नंदलाल राय उर्फ बबलू राय को राहत दी. वाराणसी की सेशन कोर्ट ने 2017 के प्रमोद कुमार निगम हत्याकांड में 2025 में उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी. नंदलाल राय ने हाईकोर्ट में अपील करते हुए दोषसिद्धि और सजा पर रोक लगाने की मांग की थी.
उनके वकील ने दलील दी कि वह 2027 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में या संभव होने पर बीजेपी के टिकट पर लड़ना चाहते हैं. अदालत ने जस्टिस सिद्धार्थ और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की पीठ के जरिए उनकी दोषसिद्धि और सजा पर अपील लंबित रहने तक रोक लगाई और जमानत भी मंजूर की. अदालत ने कहा कि आम व्यक्ति की आजीविका के अधिकार को राजनेता के चुनाव लड़ने के अधिकार से कम नहीं माना जा सकता.
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