CJP Protest: कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेता सौरव दास और आशुतोष रांका की न्यायिक हिरासत बढ़ाए जाने का मामला दिल्ली हाईकोर्ट पहुंच गया है. दोनों नेताओं ने विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट (SEM) के फैसले को चुनौती दी है. उनकी कानूनी टीम ने मंगलवार को अदालत से तत्काल सुनवाई की मांग की. यहां तक कि रात में भी मामले को सुनने का अनुरोध किया गया. अब हाईकोर्ट बुधवार (21 अक्टूबर) को याचिका पर सुनवाई करने के लिए सहमत हो गया है. दोनों नेता जंतर-मंतर पर प्रदर्शन से जुड़े मामले में हिरासत में हैं.
रात में सुनवाई के लिए क्यों पहुंचे हाईकोर्ट?
दशहरे की छुट्टियों के कारण दिल्ली हाईकोर्ट में अवकाश है. इसके बावजूद सौरव और आशुतोष की कानूनी टीम ने मंगलवार को अदालत का दरवाजा खटखटाया. दोनों नेताओं की ओर से पेश वकीलों ने हिरासत जारी रखने के फैसले पर तुरंत सुनवाई का अनुरोध किया. उनका कहना है कि जरूरी कानूनी शर्तें पूरी करने के बावजूद दोनों को रिहा नहीं किया जा रहा है. ऐसे में उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है.
रत्ना सिंह ने रिहाई को लेकर क्या कहा?
CJP की लीगल हेड रत्ना सिंह ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इस मामले की जानकारी दी. उन्होंने कहा कि सौरव और आशुतोष को एक मिनट के लिए भी सलाखों के पीछे नहीं रखा जाना चाहिए. नेतृत्वक स्वार्थ के कारण उनकी स्वतंत्रता का हनन नहीं होना चाहिए. रत्ना सिंह ने न्याय मिलने में देरी पर भी सवाल उठाए. पार्टी का आरोप है कि जमानत से जुड़ी प्रक्रिया को जानबूझकर लंबा खींचा जा रहा है, ताकि दोनों नेताओं की रिहाई रोकी जा सके.
मजिस्ट्रेट ने दो दिन क्यों बढ़ाई हिरासत?
सौरव दास और आशुतोष रांका को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के लिए लगाई गई पाबंदियों के कथित उल्लंघन के मामले में हिरासत में लिया गया था. 14 अक्टूबर को विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने दोनों को पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा था. इसके बाद सोमवार (19 अक्टूबर) को उन्हें मंदिर मार्ग पुलिस थाने में नवनियुक्त विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया. सुनवाई के बाद मजिस्ट्रेट ने उनकी हिरासत दो दिन और बढ़ाने का आदेश दिया. इसी फैसले के खिलाफ दोनों नेता हाईकोर्ट पहुंचे हैं.
संविधान के अनुच्छेद 21 का दिया हवाला
हाईकोर्ट में दाखिल याचिका में सौरव और आशुतोष ने 19 अक्टूबर के आदेश को अवैध और मनमाना बताया है. उनके वकीलों का तर्क है कि आवश्यक जमानतदार कई बार पेश किए जा चुके हैं. इसके बाद भी दोनों को हिरासत में रखना कानूनी प्रक्रिया के खिलाफ है. याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21 का हवाला दिया गया है, जो जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा का अधिकार देता है. दोनों नेताओं ने मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द करने की मांग की है.
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