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19 दिन से अनशन पर Sonam Wangchuk… लेकिन क्या आपको 16 साल तक भूखी रहने वाली उस महिला की याद है?

जोहार. आज 17 जुलाई है. देश की निगाहें इन दिनों लद्दाख के पर्यावरण कार्यकर्ता Sonam Wangchuk पर टिकी हैं. वे लगातार कई दिनों से अनशन पर हैं. उनका संघर्ष केवल लद्दाख का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक अधिकारों और जनभागीदारी का प्रतीक बन चुका है.

लेकिन सोनम वांगचुक की यह तपस्या एक ऐसे चेहरे की याद भी दिलाती है, जिसने सिर्फ 19 दिन नहीं, पूरे 16 साल तक अन्न का एक दाना नहीं खाया.

उस स्त्री का नाम था- Irom Chanu Sharmila

एक अनसुनी कहानी, जिसे चुनावी लोकतंत्र भूल गया

आज भी उनका नाम सुनते ही सवाल उठता है- क्या लोकतंत्र में सबसे बड़ा त्याग करने वाला व्यक्ति हमेशा सबसे बड़ा जननेता भी बन पाता है?

जब एक गोलीकांड ने बदल दी पूरी जिंदगी

2 नवंबर 2000.

मणिपुर के मालोम कस्बे में गोली चली. दस निर्दोष नागरिक मारे गए. इस घटना ने पूरे राज्य को झकझोर दिया.

इरोम शर्मिला भी इस घटना से अंदर तक टूट गईं. उन्होंने तय किया कि जब तक सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम (AFSPA) नहीं हटेगा, तब तक वे खाना नहीं खाएंगी.

सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम, 1958 (AFSPA) हिंदुस्तान की संसद का एक कानून है, जो हिंदुस्तानीय सशस्त्र बलों को ‘अशांत क्षेत्रों’ में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए विशेष अधिकार देता है.

यह कोई भावनात्मक फैसला नहीं था. यह एक ऐसा संकल्प था, जिसने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी.

एक ऐसी कैद, जहां जेल भी थी और अस्पताल भी

अनशन शुरू होने के कुछ ही दिनों बाद पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया. उन पर आत्महत्या के प्रयास का मामला दर्ज किया गया.

फिर शुरू हुआ एक ऐसा सिलसिला, जो पूरे 16 वर्षों तक चलता रहा.

हर साल उन्हें रिहा किया जाता और कुछ ही दिनों में दोबारा गिरफ्तार कर लिया जाता. उनका कमरा अस्पताल भी था और जेल भी.

वे अपने मुंह से कभी खाना नहीं खाती थीं. डॉक्टर उनकी नाक में डाली गई एक पतली नली के जरिए उन्हें जीवित रखते थे.

कल्पना कीजिए…

एक दिन नहीं…

एक महीना नहीं…

एक साल नहीं…

पूरे 16 साल तक किसी इंसान ने अपनी इच्छा से एक निवाला तक नहीं खाया.

सिर्फ भूख ही नहीं, अकेलापन भी उनका साथी था

इरोम शर्मिला ने केवल भोजन नहीं छोड़ा था.

उन्होंने त्योहार छोड़े…

परिवार छोड़ा…

दोस्त छोड़े…

सामान्य जीवन छोड़ दिया.

सबसे मार्मिक बात यह थी कि उनकी मां भी उनसे मिलने नहीं आती थीं. कारण यह था कि कहीं माँ को देखकर बेटी का संकल्प कमजोर न पड़ जाए.

सोचिए, एक मां अपनी बेटी से मिलने की इच्छा को 16 वर्षों तक दबाए रखे- यह त्याग केवल इरोम का नहीं, पूरे परिवार का था.

दुनिया ने सलाम किया, लेकिन घर ने साथ नहीं दिया

दुनिया भर के मानवाधिकार संगठनों ने इरोम शर्मिला को शांति और अहिंसा की मिसाल बताया.

उन्हें ‘आयरन लेडी ऑफ मणिपुर’ कहा गया.

उनकी तुलना महात्मा गांधी की अहिंसक लड़ाई से की गई.

विदेशी विश्वविद्यालयों में उनके संघर्ष पर शोध हुए. अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उनका नाम सम्मान से लिया गया.

लेकिन उनके अपने लोकतंत्र में कहानी कुछ और थी.

16 साल बाद लगा कि अब संसद से लड़ाई लड़ेंगे

अगस्त 2016 में इरोम शर्मिला ने अपना अनशन समाप्त कर दिया.

उन्होंने कहा- 

‘सिर्फ विरोध से कानून नहीं बदलेंगे. अब लोकतंत्र के भीतर जाकर बदलाव की कोशिश करनी होगी.’

उन्होंने नेतृत्वक दल बनाया और 2017 के मणिपुर विधानसभा चुनाव में तत्कालीन मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह के खिलाफ चुनाव लड़ने का फैसला किया.

देश को लगा कि जिस स्त्री ने 16 साल अपना जीवन दांव पर लगाया, जनता उसे सिर-आंखों पर बिठाएगी.

लेकिन लोकतंत्र ने कुछ और ही फैसला लिखा था.

क्यों हार गईं इरोम शर्मिला?

इसका उत्तर केवल नेतृत्व में नहीं, समाज में भी छिपा है.

लोग किसी आंदोलन का समर्थन कर सकते हैं, लेकिन चुनाव में वे विकास, जातीय समीकरण, स्थानीय नेतृत्व, पार्टी संगठन, संसाधन और जीतने की संभावना जैसे अनेक पहलुओं को भी देखते हैं.

नैतिक सम्मान और चुनावी समर्थन- दोनों हमेशा एक जैसे नहीं होते.

इरोम शर्मिला एक महान आंदोलन की प्रतीक थीं, लेकिन उनके पास वह नेतृत्वक संगठन नहीं था, जो चुनाव जिता सके.

यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना भी है.

सोनम वांगचुक के लिए सबसे बड़ा सबक

सोनम वांगचुक का आंदोलन अपने संदर्भ और उद्देश्य में अलग है. उनकी तुलना इरोम शर्मिला से करना उचित नहीं होगा.

लेकिन इरोम शर्मिला की कहानी एक महत्वपूर्ण सीख जरूर देती है.

अहिंसक आंदोलन समाज की अंतरात्मा को जगा सकते हैं.

वे प्रशासनों को सोचने पर मजबूर कर सकते हैं.

वे इतिहास बदल सकते हैं.

लेकिन यह जरूरी नहीं कि वही आंदोलन चुनावी जीत में भी बदल जाए.

आखिर में…

लोकतंत्र केवल वोटों से नहीं चलता और न ही केवल आंदोलनों से.

आंदोलन लोकतंत्र की आत्मा को जीवित रखते हैं, जबकि चुनाव उसकी प्रशासन तय करते हैं.

इरोम शर्मिला चुनाव हार गईं, लेकिन उनका संघर्ष हार नहीं गया.

आज जब सोनम वांगचुक अपने संकल्प पर डटे हैं, तब इरोम शर्मिला की कहानी हमें याद दिलाती है कि त्याग का मूल्य इतिहास अक्सर समझता है, लेकिन चुनाव हमेशा नहीं.

शायद इसलिए कुछ लोग सत्ता नहीं जीतते, वे समय जीत लेते हैं.

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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