10 हजार की भीड़ में गरजे सिदो- आज से महाजन, दारोगा और गोरी चमड़ी वालों का नहीं, हमारा राज चलेगा… Hul Diwas Special: बरहेट के छोटे-से गांव भोगनाडीह की तरफ चारों दिशाओं से लोग चले आ रहे थे. किसी के कंधे पर तीर-धनुष था, किसी के हाथ में फरसा, तो किसी की कमर से कुल्हाड़ी बंधी थी. हजारों कदमों की धूल हवा में उड़ रही थी. जंगल के रास्तों पर नगाड़ों की धीमी थाप सुनाई दे रही थी, पर आज का दिन उत्सव का उल्लास नहीं, बल्कि भीतर सुलगते गुस्से की गूंज थी. कुछ ही देर में गांव के मैदान में 10 हजार से अधिक संताल जमा हो गये. बूढ़े, जवान, स्त्रीएं, मांझी, परगनैत- हर किसी के चेहरे पर एक ही सवाल था- अब और कब तक? मैदान के बीचोंबीच सिदो और कान्हू खड़े थे. उनके साथ चांद, भैरव, फूलो और झानो भी थे. सिदो ने चारों ओर नजर दौड़ायी. जहां तक नजर जाती, अपने ही लोग दिखायी दे रहे थे, जिनके चेहरों पर वर्षों का अपमान, भूख और अन्याय साफ झलक रही थी. सन्नाटे के बीच सिदो ने ऊंची आवाज में कहा- ‘नितोक् दो़ खाजना बाबोन एमा आर ओकोयाक् गोबोलरे हो़ं बाबोन ताहेना. तेहेञ खोन माहाजोन, दोरोगा आर पोण्ड हारताकोआक् हुकुम बाङ चालाक्आ. आबोआक् दिसोमरे आबोवाक् राज होयोक्आ. नोआ मुंहिन खोन बाञ्चावोक् ला़गित् ते हूलगे आबोआक् मुचात् सापाप् काना. जिवेदोक् चाहेबोन गुजुक्, लाड़हाईकातेगे दिसोमबोन रूखिया दाड़ेयाक्आ. तेहेञ खोनगे आक् सार बोझायपे, कापी तारवाड़े गासाव लासेरपे आर हूल ला़गित् पाठे केटेजोक् पे. ओनकोआक् नास होयोक्आ आर आबोआक् जीत होयोक्आ.’ सिदो के भाषण का हिंदी रूपांतरण (अब हम लगान नहीं देंगे और किसी के गुलाम नहीं बनेंगे. आज महाजन, दारोगा और गोरी चमड़ी का हुक्म नहीं चलेगा. हमारे देश में हमारा राज होगा. इस मुश्किल परिस्थिति से बचने के लिए हूल ही हमारा आखिरी हथियार है. हम जियें या मरें, लड़कर ही अपनी आजादी को बचा पायेंगे. आज से तीर-धनुष तैयार करो, तलवार-फरसा तेज करो और हूल के लिए कमर कस लो. उनका नाश होगा और हमारी जीत होगी.) इसके बाद भीड़ में जैसे बिजली दौड़ गयी. हजारों धनुष एक साथ आसमान की ओर उठे. आवाज गूंजी… हूल…! हूल…! हूल…! हूंकार से कांपी राजमहल की पहाड़ियां राजमहल की पहाड़ियां इस हुंकार से कांप उठीं, लेकिन यह गुस्सा एक दिन में नहीं पैदा हुआ था. यह उन जख्मों की आग थी, जो वर्षों से भीतर सुलग रही थी. सिदो ने सभा में उपस्थित लोगों से कहा- आज बोलो. जो तुम्हारे साथ हुआ, सबके सामने कहो. सबसे पहले एक बूढ़ा किसान उठा. उसकी आंखें धंसी हुई थीं. बूढ़े किसान ने कहा- मैंने जंगल काटा… खेत तैयार किये… पांच साल तक जी तोड़ मेहनत की. अब महाजन कहता है- यह जमीन उसकी है. यह सुनकर भीड़ में सन्नाटा छा गया. एक दूसरी आवाज आयी- ‘मेरी पूरी फसल ले गया… फिर भी कहता है- कर्ज बाकी है.’ तीसरा आदमी उठा, गुस्से में कहा- ‘दारोगा कहता है- जेल भेज दूंगा.’ फिर एक स्त्री खड़ी हुई. उसकी आवाज कांप रही थी. ‘हमारे घर में घुस आये थे… मुर्गियां उठा ले गये… विरोध किया तो कहा- चुप रहो, नहीं तो तुम्हारे आदमी को जेल भेज देंगे.’ अब हर तरफ से आवाजें आने लगीं. हमारी जमीन…, हमारा अनाज…, हमारी बेटियां…, हमारी इज्जत… ऐसा लग रहा था, मानो वर्षों से दबा हुआ दर्द आज पहली बार शब्द बनकर बाहर निकल रहा हो. सिदो सब सुनते रहे. फिर धीरे से बोले-याद करो… यह सब कब शुरू हुआ था? और यहीं से मानो पूरा मैदान वर्षों पहले अतीत में लौट गया… संतालों ने उजाड़ जमीन को किया आबाद राजमहल की पहाड़ियों में घने जंगल थे, जिसमें मालेर जनजाति के लोग रहते थे. उनका जीवन बेहद ही साधारण था और जंगल के उत्पादों के भरोसे उनकी जिंदगी चलती थी. फिर समय बदला. 1765 में इलाहाबाद की संधि के बाद ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी मिली. उस समय वर्तमान झारखंड का अधिकांश भाग बंगाल प्रांत के ही अधीन था, इसलिए यहां भी राजस्व वसूली का अधिकार कंपनी के हाथों में आ गया. कंपनी का उद्देश्य साफ था- ज्यादा से ज्यादा राजस्व कमाना. पर इन पहाड़ियों में रहने वाले मालेरों (माल पहाड़िया) से कर वसूलना इतना आसान नहीं था, क्योंकि वे स्थायी खेती नहीं करते थे. संताल विद्रोहियों की तालश करती अंग्रेजो की सेना | तस्वीर वॉल्टर शेरवित द्वारा बनायी गयी है उधर, बंगाल की धरती पर हालात तेजी से बदल रहे थे. 1772 में तत्कालीन गर्वनर वॉरेन हेस्टिंग्स ने इजारेदारी प्रथा लागू की. एक गांव का किसान अपने बेटे से कह रहा था- ‘अब जमीन हमारी नहीं रही बेटा… जो सबसे ज्यादा बोली लगायेगा, वही हमारा मालिक होगा.’ बेटे ने पूछा- ‘फिर हम क्या करेंगे?’ बूढ़े ने आह भरते हुए कहा- ‘कर देंगे… नहीं दिया तो खेत चला जायेगा.’ इजारेदारों ने किसानों से मनमाना कर वसूलना शुरू कर दिया. फिर 1793 में गर्वनर लॉर्ड कार्नवालिस ने स्थायी बंदोबस्त लागू किया. अब जमींदार भूमि के स्वामी बना दिये गये. इससे किसानों पर आर्थिक बोझ और बढ़ गया, लेकिन इससे पहले ही बंगाल एक भयानक त्रासदी झेल चुका था. वो था 1770 का अकाल. धरती फट चुकी थी. खेत सूख चुके थे. गांवों में चूल्हे बुझ गये थे. लाखों लोग मर गये. खेत वीरान हो गये. इन विपरीत हालातों में संतालों ने नयी जमीन की तलाश शुरू की. वे धालभूम, मानभूम, हजारीबाग, मिदनापुर, बांकुड़ा, पलामू, छोटानागपुर, सिंहभूम और उड़ीसा से धीरे-धीरे राजमहल की पहाड़ियों की ओर आने लगे. यहां घने जंगल थे, खाली जमीन थी और मेहनत करने की आजादी थी. अंग्रेज अधिकारियों ने भी उन्हें बसाने में खूब मदद की, क्योंकि उन्हें उजाड़ जमीन आबाद कर राजस्व बढ़ाना था. पहले पांच वर्षों तक कोई लगान नहीं लिया गया, फिर प्रति बीघा चार आने की दर से कर लगा दिया गया. संतालों ने जंगल काटे, पत्थर हटाये, दलदल जमीन सुखाये, और इस तरह धरती को उपजाऊ बनाया. धीरे-धीरे खेत लहलहाने लगे. गांव बसने लगे. मांदर की थाप फिर गूंजने लगी. यहां जीवन जीने के सारे साधन मौजूद थे. इसी खुशहाली के बीच भोगनाडीह के मुर्मू परिवार में सिदो मुर्मू का जन्म होता है. पांच-पांच के अंतराल पर छोटे भाइयों कान्हू मुर्मू, चांद मुर्मू और भैरव मुर्मू भी जन्म लेते हैं.