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आतंकवाद के खिलाफ एकता जरूरी

पहलगाम में जो हुआ, वह बहुत बुरा था. वह मानवता पर हमला था. ऐसे चुनौतीपूर्ण समय में देशवासियों से हर स्तर पर परिपक्वता की उम्मीद है. अच्छी बात यह है कि पहलगाम हमले पर रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में बुलायी गयी सर्वदलीय बैठक में भी यह परिपक्वता दिखाई पड़ी. दो घंटे से भी अधिक समय तक चली इस बैठक में ज्यादातर नेतृत्वक दलों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया. विपक्षी नेतृत्वक पार्टियों ने इसे सुरक्षा और खुफिया चूक का मामला बताया, तो प्रशासन ने भी माना कि चूक हुई है. प्रशासन की तरफ से कहा गया कि इस घटना से एक सबक मिला है, हम इस हमले की जांच करेंगे और सुरक्षा के जो भी इंतजाम होंगे, उन्हें पूरा किया जायेगा. बैठक में कांग्रेस ने यह मुद्दा भी उठाया कि ऐसे मामलों में तुलनात्मक बयान नहीं दिये जाने चाहिए कि पहले क्या हुआ था. इसके बजाय यह देखे जाने की आवश्यकता है कि प्रशासन इससे निपटने के लिए क्या कदम उठाती है. विपक्षी नेतृत्वक पार्टियों ने पहलगाम में हुए आतंकवादी कृत्य की निंदा करते हुए प्रशासन के फैसलों को अपना समर्थन दिया. सभी विपक्षी नेताओं ने इसे देश की आत्मा पर हमला करार दिया और कहा कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में हम सभी प्रशासन के साथ हैं. सर्वदलीय बैठक संपन्न होने के बाद राहुल गांधी ने कहा कि विपक्ष ने प्रशासन को किसी भी तरह की कार्रवाई करने के लिए अपना पूरा समर्थन दिया है.

पहलगाम हमले के खिलाफ कश्मीर के लोग जिस तरह उठ कर खड़े हुए, उसे भी मैं बहुत सकारात्मक और स्वागतयोग्य घटना मानती हूं. लगभग तीन दशकों में पहली बार ऐसा हुआ है कि आतंकवादी हिंसा के खिलाफ स्थानीय लोग उठ खड़े हुए, उन्होंने बंद का आयोजन किया और आतंकवाद तथा उसके प्रायोजक पाकिस्तान की निंदा की. हमले के दो घंटे बाद कश्मीर की मस्जिदों से एलान हुआ कि पहलगाम हमला इस्लाम और मानवता के खिलाफ है, यह हमला कश्मीर की शांति और एकता को नष्ट करने की साजिश है. यह वही कश्मीर है, जहां पहले आतंकवादियों के मारे जाने पर लोग प्रशासन और सुरक्षा बलों के खिलाफ आक्रोश जताते हुए बंद का आयोजन करते थे, सड़कों पर उतरते थे, लेकिन पहलगाम हमले के बाद स्थानीय लोग आतंकवादियों के खिलाफ सड़कों पर उतर आये. कश्मीर घाटी के जो इलाके कभी आतंकवाद के गढ़ माने जाते थे, वहां भी लोगों ने सड़कों पर उतर कर ‘आतंकवाद बंद करो’ तथा ‘निर्दोष लोगों की हत्या स्वीकार नहीं’ जैसे नारे लगाये. हमले के विरोध में स्कूल, कॉलेज तो बंद रहे ही, श्रीनगर की डल झील के शिकारा वालों तक ने रैली निकाल हमले की निंदा की. जम्मू-कश्मीर के कई इलाकों में आतंकी हमले के विरोध में बाजार बंद रहे. कश्मीर के नेताओं ने इस हमले के खिलाफ जैसा आक्रोश दिखाया, वह भी उतना ही ध्यान देने लायक है. पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला ने भी पहलगाम हमले के बाद राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता पर जोर दिया. जम्मू और कश्मीर अवामी नेशनल कॉन्फ्रेंस ने हमले की कड़ी निंदा करते हुए श्रीनगर में काले झंडे लेकर प्रदर्शन किया. इससे यह स्पष्ट है कि जम्मू-कश्मीर में पिछले कुछ समय में व्यापक बदलाव आया है. हाल के वर्षों में केंद्र प्रशासन ने वहां विकास की दिशा में जो कदम उठाये हैं, उससे स्थानीय लोगों को लाभ मिला और आगे भी मिलने वाला है.

प्रशासन ने आतंकवाद के प्रायोजक पाकिस्तान को दंडित करने के लिए जो सख्त कदम उठाये हैं, वे न केवल आवश्यक हैं, बल्कि उनका पाकिस्तान पर भीषण असर पड़ने वाला है. सिर्फ यही नहीं कि पूरी विश्व बिरादरी ने पहलगाम हमले की तीखी निंदा की है, बल्कि हमारी प्रशासन विदेशी राजनयिकों को सबूतों के साथ बता रही है कि पहलगाम हमले के पीछे पाकिस्तान की लिप्तता थी. इस हमले के बाद अमेरिका समेत दूसरे बड़े देशों के सख्त रुख को देखते हुए कमजोर पाकिस्तान के अब और अलग-थलग पड़ जाने के आसार हैं. दूसरी ओर, पाकिस्तान ने हिंदुस्तानीय विमानों के लिए अपना एयरस्पेस बंद करने और शिमला समझौता रद्द करने के जो फैसले लिये, उसका हिंदुस्तान पर बहुत प्रभावी असर पड़ने वाला तो नहीं दिखता. एयरस्पेस बंद कर देने से हिंदुस्तानीय विमानों के लिए उड़ान में समय ज्यादा लगेगा, और वह ज्यादा महंगा भी होगा. लेकिन इसका नुकसान तो पाकिस्तान को भी आर्थिक रूप से होगा. जहां तक शिमला समझौते को रद्द करने का प्रश्न है, तो पाकिस्तान इसका पालन ही कब कर रहा था? शिमला समझौते के दो महत्वपूर्ण प्रावधान ये हैं कि हिंदुस्तान-पाकिस्तान कश्मीर मुद्दे का अंतरराष्ट्रीयकरण नहीं करेंगे, पर वह पाकिस्तान ही है, जो संयुक्त राष्ट्र जैसे मंच से हर बार कश्मीर राग अलापता आया है. शिमला समझौते के तहत नियंत्रण रेखा को महत्वपूर्ण माना गया है, पर पाकिस्तान हमेशा ही इसका उल्लंघन करता है. अब जब पाकिस्तान ने शिमला समझौता रद्द करने का एलान किया है, तो नियंत्रण रेखा पार करने की गुंजाइश तो इस ओर से भी है. यह समझ लेना चाहिए कि इन कदमों से पाकिस्तान को बहुत कुछ हासिल होने वाला नहीं है, जबकि सिंधु जल संधि के स्थगित होने से उसकी मुश्किलें बढ़ने ही वाली हैं. तत्काल प्रभाव से पाकिस्तानियों का वीजा रद्द कर दिया गया है, जिनमें मेडिकल वीजा भी है. पाकिस्तान को इसका बड़ा नुकसान होने वाला है. वह कई मामलों में हिंदुस्तान पर निर्भर है. जबकि पाकिस्तान से रिश्ते न रखने का हमें नुकसान नहीं है.

यह कहना तो जल्दबाजी है कि सर्वदलीय बैठक में दिखी एकता आगे भी कायम रहेगी और नेतृत्वक पार्टियों के बीच व्याप्त कटुता कम या खत्म हो जायेगी. ऐसा होना आसान नहीं है, पर आतंकवाद का मुकाबला करते हुए हमें एकता और एकजुटता बनाये रखनी होगी. यह समय बहुत चुनौतीपूर्ण है, इसलिए अलग-अलग स्वरों में बोलना खतरनाक है. आतंकवादियों ने सिर्फ निर्दोष देशवासियों की जान ही नहीं ली, बल्कि देश को हिंदू-मुस्लिम में बांटने की खतरनाक साजिश रचने की भी कोशिश की है. हमें इससे बचना होगा. प्रशासन की प्रशंसा करनी होगी कि उसने इस हमले के बाद पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिए सारे उचित कदम उठाये हैं. आगे भी उसे फूंक-फूंककर कदम रखना होगा. विपक्षी नेतृत्वक पार्टियों से भी उम्मीद है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों को वे दलीय नेतृत्व से ऊपर रखेंगे. नागरिकों के स्तर पर भी आतंकवाद के खिलाफ एकजुटता बनाये रखना आवश्यक होगा.
(ये लेखिका के निजी विचार हैं.)

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विनोद झा
संपादक नया विचार

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