मधेपुरा . वेस्ट बंगाल के मत्स्य किसान गैर पालित चेचरा (पाबदा) मछली की व्यापक पैमाने पर पालन कर कोसी क्षेत्र से विलुप्त चेचरा मछली की आपूर्ति कर रही है. केवल मधेपुरा व सहरसा के मछली बाजार में हरेक माह नौ हजार किलो से ज्यादा चेचरा मछली की आवक हो रही है. इस मछली में हाई प्रोटीन, ओमेगा थ्री फैटी एसिड व विटामिन-डी प्रचुरता होने की वजह से सेवन करने वालों को हार्ट हेल्थ, स्कैन ग्लो, ब्रेन फंक्शन सेहतमंद रखती है. इस मछली का मिट सॉफ्ट, बोनलेस और माइल्ड फ्लेवर वाली होती है. इसलिए इसे शिशु भी आसानी से सेवन कर लेते हैं. इसकी बनावट स्मूथ, पतली बॉडी व कम फेट वाली होती है. विलिप्त हो रही देसी मछलियों की प्रजातियों में चेचरा भी शामिल देसी मछलियों की विलुप्त प्रजातियों में अब चेचरा ( पलवा व पाबदा ) भी शामिल हो गयी है. करीब एक दशक से मछली बाजार की चट्टियों में देसी व गैरपालित मछली चेचरा देखने को नहीं मिल रही है, लेकिन अब वेस्ट बंगाल के मत्स्य किसान इसका पालन करने लगे हैं. इस वजह से कोसी क्षेत्र के मछली बाजार में यह मछली देखने को मिल रही है. बाजार में पहले जब मछली आयी तो ग्राहकों की खूब जेब काटी गयी. जब ग्राहक समझ गए कि इसका पालन हो रहा है तो कीमत घट गयी. पहले साइज के आधार पर 600 रुपये किलो की बिक्री खुलेआम हुई. अब 400 रुपये किलो पर आसानी से मिल रही है. —— विलुप्त हो रही व मार्केट में कम आवक वाली मछलियों के पालन व संरक्षण के लिए मत्स्य विविधीकरण योजना के तहत मत्स्य किसानों को प्रशासनी सहायता प्रदान की जा रही है. इस योजना अंतर्गत कैटफिश योजना में देसी व विलुप्त हो रही मछलियों के पालन व संरक्षण के लिए 135000 व मैनर कार्प के तहत 94 हजार का ऋण 60 प्रतिशत अनुदान पर किसानों को दिया जा रहा है. जयप्रकाश सिंह, जिला मत्स्य पदाधिकारी, सहरसा
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